- FPO से जुड़कर किसान सीधा बेचें, अपनी आय बढ़ाएं।
खेती में अब ज्यादा मुनाफे के लिए फसलों की कुछ अलग वैरायटी को उगाना जरूरी हो गया है. भारत में धान की खेती काफी की जाती है. पारंपरिक धान उगाकर किसानों को मंडी के भाव पर निर्भर रहना पड़ता है. वहीं इसके बजाय अगर किसान अब औषधीय और खास गुणों वाली किस्में उगा सकते हैं.. लाइचा, महाराजी जैसी धान की पारंपरिक देसी किस्में आज कमाई का एक बेहतरीन जरिया बन सकती हैं. इन किस्मों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इनकी मांग सिर्फ खान-पान तक सीमित नहीं है.
बल्कि फार्मा और हेल्थकेयर सेक्टर में इनकी काफी ज्यादा डिमांड देखने को मिल रही है. वैज्ञानिक रिसर्च ने साबित कर दिया है कि इन देसी किस्मों में कई गंभीर बीमारियों से लड़ने वाले पोषक तत्व और औषधीय गुण भरपूर मात्रा में मौजूद हैं. अगर किसान धान की खेती में इन किस्मों के अपनाते हैं तो उनकी इनकम में कई गुना इजाफा होना बिल्कुल लाजमी है.
क्यों इन किस्मों की मेडिकल सेक्टर में भारी मांग?
धान की यह किस्में अपने जबरदस्त न्यूट्रिशनल और औषधीय गुणों के चलते मेडिकल इंडस्ट्री की पहली पसंद बन रही हैं. कृषि वैज्ञानिकों की रिसर्च में यह बात सामने आई है कि लाइचा किस्म में ऐसे प्राकृतिक तत्व मौजूद हैं जो स्किन कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की रोकथाम में काफी असरदार साबित होते हैं. इसी तरह महाराजी किस्म का उपयोग शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और कमजोरी दूर करने वाली दवाओं और सप्लीमेंट्स में किया जाता है.
वहीं गठवन नाम की वैरायटी गठिया और जोड़ों के दर्द से राहत दिलाने में बेहद मददगार मानी जाती है. मेडिकल और वेलनेस सेक्टर में केमिकल-फ्री और प्राकृतिक सोर्स की तलाश लगातार बढ़ रही है. यही वजह है कि दवा कंपनियां, न्यूट्रास्युटिकल ब्रांड्स और आयुर्वेदिक रिसर्च लैब्स इन किस्मों के चावल को भारी डिमांड के साथ अच्छे दामों पर खरीदने के लिए तैयार रहती हैं.
दूसरी किस्मों से कहीं ज्यादा मुनाफा
पारंपरिक धान की खेती में जहां लागत निकालने के बाद कम बचत होती है. वहीं इन औषधीय किस्मों की खेती प्रति एकड़ शानदार मुनाफा देती है. बाजार में सामान्य चावल जहां 30 से 40 रुपये किलो बिकता है. वहीं लाइचा और महाराजी का चावल 150 से 300 रुपये प्रति किलो तक आसानी से बिक जाता है. जो भी किसान इसकी शुरुआत करना चाहते हैं. वह नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क करके इनके प्रमाणित बीज हासिल कर सकते हैं.
इन किस्मों को पूरी तरह जैविक यानी ऑर्गेनिक तरीके से उगाना सबसे ज्यादा फायदेमंद रहता है. क्योंकि बिना केमिकल वाली फसल की मेडिकल कंपनियों में दोगुनी कीमत मिलती है. थोड़ी सी जमीन से शुरुआत करके और सही पैकेजिंग अपनाकर किसान सीधे हेल्थकेयर कंपनियों के साथ सप्लाई टाई-अप कर सकते हैं और हर सीजन में बंपर कमाई कर सकते हैं.

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किसानों को कैसे होगा फायदा?
औषधीय धान की इन किस्मों को सिर्फ फसल के तौर पर बेचने के बजाय इसे एग्री-बिजनेस मॉडल के तौर पर देखा जाना चाहिए. अगर किसान फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशन यानी एफपीओ के जरिए इनकी खेती करते हैं. तो वे खुद इनकी प्रोसेसिंग और पैकेजिंग भी आसानी से कर सकते हैं. लोकल लेवल पर तैयार किए गए इन चावलों को अगर अच्छी ब्रांडिंग की जाए और फिर उन्हें बड़े शहरों, सुपरमार्केट्स और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स तक पहुंचाया जाए तो ज्यादा फायदा होगा.
क्योंकि इससे बाजार में बिचौलियों की जरूरत पूरी तरह खत्म हो जाएगी और फसल पूरी कीमत सीधे किसानों की जेब में आएगी. इस तरीके को अपनाकर किसान न सिर्फ अपनी फसल का सही दाम हासिल कर सकते हैं. बल्कि मेडिकल और हेल्थ सेक्टर की बढ़ती जरूरतों से जुड़कर बढ़िया बिजनेस नेटवर्क भी डेवलप कर सकते हैं. जो आगे लंबे वक्त तक उन्हें फायदा पहुंचाता रहेगा.
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