बंजर जमीन को सुधारने से पहले सबसे जरूरी काम है मिट्टी की जांच करवाना. मिट्टी की जांच से यह पता चलता है कि जमीन में किन पोषक तत्वों की कमी है, जैसे नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम, जिंक, बोरोन, आयरन या कॉपर. इस जांच के बाद ही यह तय किया जा सकता है कि जमीन में कौन सी खाद डालनी है और कौन सी फसल सबसे पहले लगानी चाहिए. बिना जांच के अंदाजे से खेती करने पर मेहनत और पैसा दोनों बर्बाद हो सकते हैं.

बहुत सी बंजर जमीन में मिट्टी के ऊपर नमक की परत जम जाती है, जिसकी वजह से पौधे ठीक से नहीं उग पाते. इस नमक को हटाने के लिए किसान खेत की सतह को हल्का खुरचकर उस नमक वाली मिट्टी को खेत से बाहर किसी गड्ढे में डाल देते हैं या नाले में बहा देते हैं. इसके साथ ही खेत में छोटी-छोटी मेड़ें बनाई जाती हैं, ताकि बारिश का पानी खेत में ही रुके और धीरे-धीरे जमीन के अंदर मौजूद नमक भी पानी के साथ नीचे चला जाए.

बंजर जमीन को उपजाऊ बनाने के लिए ढैंचा एक बहुत अच्छी फसल मानी जाती है. यह हरी खाद के रूप में इस्तेमाल होने वाली फसल है, जिसे बरसात के मौसम में खाली पड़े खेत में बोया जाता है. ढैंचा की जड़ों में नाइट्रोजन जमा करने की खास क्षमता होती है, जिससे मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ जाती है. बुवाई के करीब 30 से 35 दिन बाद इस फसल की जुताई कर दी जाती है, जिससे यह मिट्टी में मिलकर खाद का काम करती है और जमीन की उपजाऊ क्षमता बढ़ जाती है.

ढेंचा की तरह ही सनई यानी सनहेम्प की फसल भी बंजर जमीन के लिए बहुत फायदेमंद मानी जाती है. इसे भी जून के महीने में खाली खेत में बोया जाता है. सनई की फसल तेजी से बढ़ती है और करीब एक महीने में तैयार हो जाती है. इसके बाद रोटावेटर की मदद से इसे मिट्टी में जोत दिया जाता है और हल्की सिंचाई कर दी जाती है. इससे मिट्टी में जैविक तत्वों की मात्रा बढ़ती है और मिट्टी धीरे-धीरे नरम और उपजाऊ बनने लगती है.

बहुत से किसान फसल कटाई के बाद खेत में बचे हुए अवशेष, जैसे पौधों के डंठल या पत्तियां, खेत में ही जला देते हैं. ऐसा करना मिट्टी के लिए बहुत नुकसानदायक होता है, क्योंकि इससे मिट्टी में मौजूद फायदेमंद जीवाणु भी नष्ट हो जाते हैं और जमीन की उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है. इसकी जगह किसानों को चाहिए कि वे इन अवशेषों को खेत में ही मिट्टी में मिला दें, जिससे यह सड़कर प्राकृतिक खाद का काम करते हैं और मिट्टी को पोषण मिलता है.

बंजर जमीन को हमेशा के लिए उपजाऊ बनाए रखने के लिए सिर्फ एक बार की मेहनत काफी नहीं होती. किसानों को समय-समय पर गोबर की खाद, कंपोस्ट खाद और जरूरत के मुताबिक हरी खाद वाली फसलों का इस्तेमाल करते रहना चाहिए. साथ ही मिट्टी की जांच भी हर एक-दो साल में करवाते रहना चाहिए, ताकि यह पता चलता रहे कि जमीन में किन पोषक तत्वों की जरूरत है.
Published at : 10 Aug 2026 10:03 PM (IST)






