बड़े होने पर क्यों सामने आ रहा है ऑटिज्म का सच? डॉक्टर से जानें इसके लक्षण

बड़े होने पर क्यों सामने आ रहा है ऑटिज्म का सच? डॉक्टर से जानें इसके लक्षण


Why Autism Is Diagnosed Late In Adults: आज पहले के मुकाबले ज्यादा वयस्कों में ऑटिज्म की पहचान हो रही है. लंबे समय तक कई लोग एक सवाल के साथ जीते रहे क्यों जिंदगी हमेशा थोड़ी अलग, थोड़ी असामान्य महसूस होती है? अब जाकर बहुतों को इसका जवाब मिल रहा है. जिसे कभी सिर्फ बचपन की स्थिति माना जाता था, वह अब बड़े लोगों में भी तेजी से पहचाना जा रहा है. यह अचानक बढ़ोतरी नहीं है, बल्कि समझ और जागरूकता में आए बदलाव का असर है. डॉ. सोनाली चतुर्वेदी, कंसल्टेंट साइकोलॉजिस्ट, अरीते हॉस्पिटल्स बताती हैं कि “पिछले कुछ सालों में वयस्कों में ऑटिज्म की पहचान तेजी से बढ़ी है, क्योंकि अब लोग इसे बेहतर समझने लगे हैं.”

पहले ऑटिज्म की अलग पहचान थी

पहले ऑटिज्म की एक तय छवि थी कि एक छोटा बच्चा जिसे बोलने या सामाजिक व्यवहार में दिक्कत हो. जो लोग इस दायरे में फिट नहीं बैठते थे, वे अक्सर नजरअंदाज हो जाते थे. शांत स्वभाव, ज्यादा सोचने की आदत या अकेले रहना, इन्हें सामान्य व्यवहार मान लिया जाता था, जबकि ये संकेत हो सकते थे.  कई लोग बचपन से ही खुद को ढालना सीख लेते हैं. दूसरों को देखकर व्यवहार अपनाना, बातचीत के तरीके याद करना. इसे मास्किंग कहा जाता है. यह बाहर से सब सामान्य दिखाता है, लेकिन अंदर से थकान और बेचैनी बढ़ती रहती है.  डॉ. चतुर्वेदी ने TOI को बताया कि “मास्किंग के कारण पहचान में देर हो जाती है, यहां तक कि खुद व्यक्ति को भी समझ नहीं आता.” 

इलाज के दौरान क्या रखें ध्यान?

अक्सर सही पहचान से पहले लोग दूसरी समस्याओं के लिए इलाज कराते रहते हैं कि जैसे चिंता, अवसाद या व्यक्तित्व से जुड़ी दिक्कतें.  कुछ राहत मिलती है, लेकिन पूरी तस्वीर साफ नहीं होती. डॉ. चतुर्वेदी के अनुसार कि कई लोग बार-बार इलाज लेते हैं, फिर भी उन्हें लगता है कि कुछ अधूरा है, जब तक असली कारण सामने नहीं आता.”  एक अहम पहलू यह भी है कि महिलाओं में यह पहचान और भी देर से होती है. पहले ज्यादातर रिसर्च पुरुषों पर आधारित थी, इसलिए महिलाओं में दिखने वाले संकेत नजरअंदाज हो गए. उन्हें अक्सर ज्यादा भावुक या ज्यादा सोचने वाला कहकर टाल दिया गया.

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बातचीत ने समझ बढ़ाई

अब हालात बदल रहे हैं. सोशल मीडिया, लोगों के अनुभव और खुली बातचीत ने समझ बढ़ाई है. कई बार किसी और की कहानी सुनकर लोग खुद को पहचान पाते हैं. डॉ. चतुर्वेदी कहती हैं कि “कई वयस्कों के लिए यह पल तब आता है, जब वे किसी और के अनुभव में खुद को देखते हैं.” जिन्हें बाद में पहचान मिलती है, उनके लिए यह बदलाव डर नहीं बल्कि राहत लेकर आता है. यह उनकी पहचान नहीं बदलता, बल्कि यह समझ देता है कि वे हमेशा ऐसे ही थे. बचपन की यादें, रिश्ते और कामकाजी जीवन, सब कुछ एक नई नजर से समझ आने लगता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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