Sea Buckthorn Farming: सी-बकथॉर्न, जिसका वैज्ञनिक नाम Hippohae Rhamnoides है, एक कांटेदार झाड़ी जैसा पौधा होता है जो अपने बेहद स्वादिष्ट फलों के लिए जाना जाता है. इसे सुपरफूड की श्रेणी में रखा जाता है क्योंकि इसमें भरपूर मात्रा में विटामिन, एंटीऑक्सिडेंट और ओमेगा फैटी एसिड होते हैं, जो शरीर के लिए बेहद फायदेमंद होते हैं. हालांकि, इसे कुछ खास जगहों पर ही उगाया जा सकता है, जो इसे और भी दुर्लभ बनाता है.
यह मुख्य रूप से लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के ठंडे हिमालयी क्षेत्रों में उगाई जाती है. इसकी खेती करना काफी मुश्किल होता है, लेकिन इससे मिलने वाले फल और उत्पादों की मांग कई देशों में है. इसी वजह से इसे उगाने वाले किसानों को मेहनत तो करनी पड़ती है, लेकिन मुनाफा भी अच्छा मिलता है.
सिर्फ चुनिंदा जगहों पर ही इसकी खेती क्यों होती है?
सी-बकथॉर्न अत्यधिक ठंडे और शुष्क (Cold Desert) इलाकों का पौधा है. यह -40 डिग्री से लेकर +40 डिग्री तक के तापमान को सहन कर सकता है और खराब मिट्टी में भी उग सकता है. भारत में ऐसे अनुकूल हालात मुख्य रूप से लद्दाख और कुछ अन्य हिमालयी क्षेत्रों में ही मिलते हैं. यह वहां प्राकृतिक रूप से भी बड़े पैमाने पर पाया जाता है. लद्दाख में भारत की लगभग 65 प्रतिशत सी-बकथॉर्न की खेती होती है. इसके लिए 2500 से 3000 मीटर की ऊंचाई अच्छी मानी जाती है. कम वर्षा और ठंडी जलवायु इसके लिए लाभकारी होती है. हालांकि, अब उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के कुछ ऊंचाई वाले क्षेत्रों में इसकी खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है, लेकिन अभी भी लद्दाख इसका प्रमुख केंद्र बना हुआ है.
कैसे करते हैं इसकी खेती?
- सबसे जरूरी है ठंडा हिमालयी वातावरण.
- इसके लिए कम उपजाऊ या रेतीली मिट्टी का भी इस्तेमाल किया जा सकता है.
- इसे बीज या कटिंग, दोनों माध्यम से लगाया जा सकता है. लेकिन फल पाने के लिए मेल और फीमेल दोनों प्रकार के पौधे लगाना जरूरी होता है. आमतौर पर 1 मेल पौधे के साथ 5–6 फीमेल पौधे लगाए जाते हैं.
- इसकी रोपाई मार्च–अप्रैल या हल्की गर्मी में की जाती है और पौधों के बीच करीब 1.5 से 3 मीटर की दूरी रखी जाती है.
- शुरुआत में थोड़ा पानी देना पड़ता है, लेकिन बाद में यह पौधा बिना ज्यादा पानी के भी बढ़ जाता है और इसमें ज्यादा खाद देने की जरूरत नहीं होती.
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उत्पादन और कटाई
सी-बकथॉर्न का पौधा करीब 3 से 4 साल में फल देना शुरू कर देता है. इसके फल छोटे, नारंगी रंग के और काफी खट्टे होते हैं. पौधा कांटेदार होने की वजह से इसकी कटाई थोड़ी मुश्किल होती है. सी-बकथॉर्न की बढ़ती मांग को देखते हुए सरकार, खासकर लद्दाख में इसे तेजी से बढ़ावा दे रही है. प्रोसेसिंग यूनिट लगाई जा रही हैं, ताकि जूस और ऑयल जैसे उत्पाद बनाकर किसानों को ज्यादा कमाई हो सके. ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ के जरिए प्रशिक्षण और नई तकनीक भी दी जा रही है. National Dairy Development Board (NDDB) जैसे संस्थान किसानों को बाजार से जोड़ रहे हैं, जिससे स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के मौके बढ़ रहे हैं.
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