Maa Kali: मां काली का नाम सुनते ही मन में एक ऐसी देवी की छवि उभरती है, जो एक साथ रहस्यमयी भी हैं और अत्यंत शक्तिशाली भी है. उनका स्वरूप सामान्य देवी रूपों से बिल्कुल अलग दिखाई देता है काले वर्ण वाली देवी, खुले बिखरे बाल, हाथों में अस्त्र, गले में नरमुंडों की माला और बाहर निकली हुई जीभ. उनके नाम मात्र से भय, शक्ति, संरक्षण और विनाश चारों भाव एक साथ सामने आ जाते हैं. पहली नजर में उनका यह रूप भय पैदा कर सकता है, लेकिन शास्त्रों में यही स्वरूप बुराई के अंत, समय की शक्ति और धर्म की रक्षा का प्रतीक माना गया है.
जब देवताओं पर मंडराने लगा संकट
पुराणों और शक्ति ग्रंथों में मां काली की उत्पत्ति को लेकर कई कथाएं मिलती हैं, लेकिन सबसे प्रसिद्ध कथा देवी दुर्गा और राक्षस रक्तबीज से जुड़ी हुई मानी जाती है. एक समय ऐसा आया जब असुरों का आतंक पृथ्वी से लेकर स्वर्ग तक फैल गया. देवता बार-बार पराजित हो रहे थे और धर्म कमजोर पड़ता जा रहा था. इन्हीं असुरों में रक्तबीज सबसे अधिक शक्तिशाली असुर था. उसे यह वरदान प्राप्त था कि उसके शरीर से गिरने वाली हर रक्त की बूंद से एक नया राक्षस पैदा हो जाता था.
जितना अधिक उस पर आक्रमण किया जाता, उसकी शक्ति उतनी ही बढ़ती जाती थी. देवताओं के लिए यह युद्ध असंभव होता जा रहा था. तब सभी देवताओं ने आदिशक्ति का स्मरण किया और मां दुर्गा युद्धभूमि में प्रकट हुईं. युद्ध के दौरान जब रक्तबीज का आतंक बढ़ता गया, तब मां दुर्गा के तेज और क्रोध से एक भयंकर शक्ति प्रकट हुई. यही शक्ति आगे चलकर मां काली के नाम से प्रसिद्ध हुई.
उस समय देवी का रूप अत्यंत उग्र हो गया था, उनके हाथों में खड्ग और खप्पर था. खुले बाल, अग्नि जैसी आंखें और विकराल रूप देखकर असुर भयभीत हो उठे. मां काली युद्धभूमि में उतरते ही रक्तबीज पर टूट पड़ीं. मां काली ने रक्तबीज का रक्त धरती पर गिरने ही नहीं दिया. मां काली उसका रक्त स्वयं पीती चली गईं ताकि उससे नया राक्षस उत्पन्न न हो सके. इसी कारण अंततः रक्तबीज का वध संभव हो पाया था.
यह कथा हमें बताती है कि कभी-कभी बुराई का अंत करने के लिए शक्ति को अपने सबसे प्रचंड रूप में आना पड़ता है.
मां काली की जीभ बाहर क्यों दिखाई जाती है?
मां काली की सबसे रहस्यमयी पहचान उनकी बाहर निकली हुई जीभ मानी जाती है. जब मां काली ने असुरों का संहार शुरू किया, तब उनका क्रोध इतना बढ़ गया कि पूरा संसार कांप उठा. उनका रौद्र रूप नियंत्रण से बाहर होने लगा. तब भगवान शिव स्वयं उनके मार्ग में लेट गए.
जैसे ही मां काली का पैर शिवजी के ऊपर पड़ा, उन्हें अपनी स्थिति का एहसास हुआ और लज्जा में उनकी जीभ बाहर निकल गई. शक्ति चाहे कितनी भी प्रबल क्यों न हो, उसे संतुलन और चेतना की आवश्यकता होती है.
मार्कण्डेय पुराण में बताए गए मां काली के रहस्यमयी भेद:
शक्ति ग्रंथों और तांत्रिक परंपरा में मां काली के कई स्वरूपों का उल्लेख मिलता है. मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, मां काली के अनेक रूप और भेद बताए गए हैं, लेकिन प्रमुख रूप से उनके आठ स्वरूप विशेष माने गए हैं.
मां काली के प्रमुख आठ स्वरूप:
- भद्रकाली
- दक्षिण काली
- श्मशान काली
- काल काली
- गुह्य काली
- कामकला काली
- धन काली
- सिद्धि काली
इनके अतिरिक्त महाकाली, चामुंडा काली और भैरवी काली जैसे स्वरूपों का भी वर्णन मिलता है. हर स्वरूप का अपना अलग आध्यात्मिक महत्व और ऊर्जा होती है. शास्त्रों में दक्षिण काली को मां काली का सबसे प्रसिद्ध और पूजनीय स्वरूप बताया गया है.
तांत्रिक साधनाओं में भी इसी रूप की विशेष आराधना की जाती है. दक्षिण काली साधकों को भय, नकारात्मकता और मानसिक बाधाओं से मुक्ति प्रदान करती हैं. कई ग्रंथों में उन्हें आद्याशक्ति और ब्रह्मस्वरूपिणी भी कहा गया है.
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