जहां घास नहीं उगती थी, वहां उगाई कश्मीरी केसर और स्पेनिश जैतून, देखें 75 साल के बुजुर्ग का कमाल

जहां घास नहीं उगती थी, वहां उगाई कश्मीरी केसर और स्पेनिश जैतून, देखें 75 साल के बुजुर्ग का कमाल


Saffron and Olives Farming on Barren Hill : मध्य प्रदेश के महू के रहने वाले 75 साल के पूर्व कॉलेज प्रिंसिपल एस.एल. गर्ग ने कुछ ऐसा कर दिखाया, जिसे सुनकर हर कोई हैरान है और उनकी तारीफ कर रहा है. जिस पहाड़ी पर कभी घास का एक तिनका तक नहीं उगता था, जहां चारों तरफ सिर्फ पत्थर और सूखी जमीन दिखाई देती थी, आज उसी जगह 75 साल के एस.एल. गर्ग की मेहनत और कमाल से हजारों पेड़ हैं. इतना ही नहीं, वहां कश्मीरी केसर, स्पेनिश जैतून, ड्रैगन फ्रूट और कई विदेशी पौधों की सफल खेती भी हो रही है. गर्ग ने अपनी मेहनत और लगन से एक बंजर पहाड़ी को हरे-भरे जंगल और कृषि अनुसंधान केंद्र में बदल दिया है. तो आइए जानते हैं कि जहां घास नहीं उगती थी, वहां 75 साल के बुजुर्ग ने कश्मीरी केसर और स्पेनिश जैतून कैसे उगाएं.

साल 2015 में खरीदी थी पहाड़ी

साल 2015 में एस.एल. गर्ग की नजर महू के जामली गांव की एक सूखी और पथरीली पहाड़ी पर पड़ी. यह लगभग 22 एकड़ क्षेत्र में फैली हुई थी. यहां न पानी था, न हरियाली और न ही खेती की कोई संभावना दिखाई देती थी. स्थानीय किसानों और गांव वालों ने गर्ग को समझाया कि इस जमीन पर पैसा लगाना बेकार है. उनका कहना था कि यहां कुछ भी नहीं उग सकता है, लेकिन गर्ग ने लोगों की बातों पर ध्यान नहीं दिया. उन्होंने अपनी बचत और अमेरिका में रहने वाले अपने बेटे की आर्थिक मदद से करीब 70 लाख रुपये में इस जमीन को खरीद लिया. जब गर्ग ने इस बंजर पहाड़ी पर पौधे लगाने की योजना शुरू की, तब आसपास के लोग उन्हें पागल समझने लगे. कई लोगों ने कहा कि इतनी पथरीली जमीन पर पेड़ लगाना सिर्फ पैसे और समय की बर्बादी है, लेकिन गर्ग इस पहाड़ी को एक ऐसी जगह बनाना चाहते थे जहां प्रकृति, खेती और पर्यावरण संरक्षण सब एक साथ दिखाई दे.  

पानी के बिना कैसे गर्ग ने करी खेती?

इस पहाड़ी पर सबसे बड़ी चुनौती पानी की थी. पहाड़ी पर पानी का कोई प्राकृतिक स्रोत नहीं था. ऐसे में पौधों को जीवित रखना बेहद मुश्किल था. ऐसे में गर्ग ने गांव वालों से टैंकरों के जरिए पानी खरीदना शुरू किया. कई सालों तक वह हर महीने लगभग 50 हजार रुपये सिर्फ पानी पर खर्च करते रहे. इस पानी से पौधों को सींचा गया और धीरे-धीरे सूखी जमीन पर हरियाली नजर आने लगी. 

2019 की आग ने मिटा दी कई साल की मेहनत

जब पहाड़ी पर लगाए गए पौधे धीरे-धीरे बड़े हो रहे थे और हरियाली लौटने लगी थी, तभी साल 2019 में एक बड़ी दुर्घटना हो गई. भीषण आग लगने से लगभग 1,000 पेड़ जलकर राख हो गए. सालों की मेहनत कुछ घंटों में खत्म होती दिखाई दी. यह किसी भी व्यक्ति के लिए बहुत बड़ा झटका था, लेकिन गर्ग ने हार नहीं मानी. उन्होंने फिर पहले से ज्यादा पौधे लगाए और पूरे प्रोजेक्ट को नई एनर्जी के साथ आगे बढ़ाया. 

75 साल के बुजुर्ग ने कश्मीरी केसर और स्पेनिश जैतून कैसे उगाए?

गर्ग ने महू क्षेत्र की काली कपास वाली मिट्टी को हटाकर वहां लाल मिट्टी बिछाई. इसके बाद कश्मीर एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों की मदद ली गई. यहां करीब 1,000 केसर कॉर्म्स लगाए गए. कड़ी मेहनत और सही तकनीक के कारण वह प्रयोग सफल रहा. आज उस पहाड़ी पर कश्मीरी केसर की खेती हो रही है, जो आमतौर पर कश्मीर जैसे ठंडे इलाकों में ही होती है. 

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दुनिया भर के पौधों का बना घर

आज यह पहाड़ी सिर्फ केसर की खेती तक सीमित नहीं है. यहां देश और विदेश के 600 से ज्यादा प्रकार के पौधे उगाए जा रहे हैं. इनमें स्पेन के जैतून, थाईलैंड के ड्रैगन फ्रूट, मैक्सिको के खजूर और भारत की कई औषधीय प्रजातियां शामिल हैं. यहां अब अलग-अलग जलवायु वाले पौधों पर काम किया जा रहा है. 

जल संरक्षण से बदल गई पूरी जमीन

गर्ग ने केवल पौधे लगाने पर ही ध्यान नहीं दिया, बल्कि पानी बचाने के लिए भी बड़े स्तर पर काम किया. उन्होंने रेन वाटर हार्वेस्टिंग की व्यवस्था बनाई, आर्टिफिशियल झील तैयार की और कई छोटे-छोटे जल स्रोत बनाए. साथ ही ड्रिप इरिगेशन तकनीक का यूज करके पानी की बर्बादी को भी रोका गया. इन प्रयोग का परिणाम यह हुआ कि पहाड़ी की मिट्टी में नमी बढ़ने लगी और आसपास का ग्राउंडवाटर लेवल भी ऊपर आने लगा. आज इस पहाड़ी पर लगभग 50 हजार पेड़ मौजूद हैं.

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