नागरिकता का प्रमाण, पहचान और मीडिया से सोशल मीडिया तक बहस…, पासपोर्ट क्यों नहीं मजबूत दस्तावेज?

नागरिकता का प्रमाण, पहचान और मीडिया से सोशल मीडिया तक बहस…, पासपोर्ट क्यों नहीं मजबूत दस्तावेज?


मुद्दा सिर्फ पासपोर्ट का नहीं, बल्कि नागरिकता और पहचान का है. मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक, अदालत से लेकर संसद तक एक नई बहस छिड़ गई है. बहस की वजह विदेश मंत्रालय का वह बयान है, जिसमें कहा गया कि पासपोर्ट भारतीय नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं है. विदेश मंत्रालय के मुताबिक पासपोर्ट एक ट्रैवल डॉक्युमेंट है, जिसे विदेश यात्रा के लिए जारी किया जाता है. इस बयान के सामने आते ही देशभर में सवाल उठने लगे, क्योंकि आम धारणा यही रही है कि पासपोर्ट भारतीय नागरिकता का सबसे मजबूत प्रमाण है.

भारतीय नागरिकता साबित कैसे होगी?

इससे पहले विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़ी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भी आधार कार्ड को नागरिकता का प्रमाण मानने से इनकार किया था. जबकि SIR के लिए मांगे गए दस्तावेजों की सूची में पासपोर्ट सबसे ऊपर रखा गया है. ऐसे में जब आधार और पासपोर्ट दोनों को नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा रहा, तो आम नागरिक के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर भारतीय नागरिकता साबित कैसे होगी.

विपक्ष ने केंद्र सरकार पर उठाए सवाल

विदेश मंत्रालय के बयान के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तेज हो गई हैं. विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार धीरे-धीरे उन दस्तावेजों की वैधता पर सवाल उठा रही है जिन्हें अब तक नागरिकता और पहचान का सबसे मजबूत आधार माना जाता रहा है. पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा कि पासपोर्ट जारी करने से पहले नागरिकता से जुड़े सभी दस्तावेजों की जांच होती है, इसलिए यह समझना मुश्किल है कि सरकार ऐसा बयान क्यों दे रही है. वहीं शिवसेना (यूबीटी) नेता आदित्य ठाकरे ने सवाल उठाया कि अगर पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है तो विदेश यात्रा के दौरान भारतीय नागरिक अपनी पहचान किस आधार पर साबित करेंगे.

पासपोर्ट को लेकर केंद्र का पक्ष

दूसरी तरफ केंद्र सरकार का कहना है कि विदेश मंत्रालय ने केवल कानूनी प्रक्रिया स्पष्ट की है. केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि पासपोर्ट एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है, लेकिन केवल पासपोर्ट होना नागरिकता का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता. नागरिकता साबित करने के लिए अन्य कानूनी प्रक्रियाएं और दस्तावेज भी अहम होते हैं.

भारत में करोड़ों लोगों के पास सरकारी दस्तावेज मौजूद हैं. लगभग 135 करोड़ लोगों के पास आधार कार्ड, 95 करोड़ के पास वोटर आईडी, 78 करोड़ के पास पैन कार्ड, 21 करोड़ के पास राशन कार्ड, 20 करोड़ के पास ड्राइविंग लाइसेंस और करीब 13 करोड़ लोगों के पास पासपोर्ट है. लेकिन कानूनी दृष्टि से इनमें से कोई भी दस्तावेज अकेले नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जाता. ये दस्तावेज पहचान, निवास, मतदान या सरकारी योजनाओं से जुड़ी पात्रता साबित करते हैं, नागरिकता नहीं.

पासपोर्ट को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट की टिप्पणी

दरअसल पासपोर्ट अधिनियम 1967 की धारा 20 के अनुसार केंद्र सरकार जनहित में किसी गैर-भारतीय नागरिक को भी पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज जारी कर सकती है. इसी वजह से कानून पासपोर्ट और नागरिकता को दो अलग-अलग अवधारणाओं के रूप में देखता है. वर्ष 2013 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी अपने एक फैसले में कहा था कि पासपोर्ट को नागरिकता के अंतिम प्रमाण के रूप में नहीं माना जा सकता.

तो फिर भारतीय नागरिकता मिलती कैसे है? नागरिकता अधिनियम 1955 के तहत नागरिकता पांच तरीकों से प्राप्त की जा सकती है- जन्म से, वंश से, पंजीकरण के जरिए, नेचुरलाइजेशन के जरिए और किसी क्षेत्र के भारत में विलय के आधार पर. लेकिन भारत में जन्मे अधिकांश लोगों को अलग से कोई नागरिकता प्रमाणपत्र जारी नहीं किया जाता. नागरिकता से जुड़े विवादों या जांच के मामलों में जन्म प्रमाणपत्र, माता-पिता के दस्तावेज, स्कूल रिकॉर्ड, भूमि रिकॉर्ड और अन्य सरकारी दस्तावेजों के आधार पर नागरिकता साबित करनी पड़ सकती है.

अब पासपोर्ट बनवाना हो गया महंगा

इस पूरे विवाद के बीच पासपोर्ट धारकों के लिए एक और बड़ी खबर सामने आई है. 1 जुलाई से पासपोर्ट बनवाना और उसका नवीनीकरण कराना महंगा हो गया है. 36 पेज वाले सामान्य पासपोर्ट की फीस 1,500 रुपये से बढ़ाकर 2,500 रुपये कर दी गई है, जबकि 60 पेज वाले पासपोर्ट की फीस 2,000 रुपये से बढ़कर 3,500 रुपये हो गई है. खोए या क्षतिग्रस्त पासपोर्ट को दोबारा बनवाने की फीस भी बढ़ा दी गई है. वहीं तत्काल पासपोर्ट, बच्चों के पासपोर्ट और पुलिस क्लियरेंस सर्टिफिकेट के लिए भी अब पहले से अधिक शुल्क देना होगा.

विदेश मंत्रालय के बयान ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है- अगर पासपोर्ट, आधार, वोटर आईडी और पैन कार्ड भी नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं हैं, तो आम नागरिक अपनी भारतीय नागरिकता किस आधार पर साबित करेगा? यही सवाल अब राजनीतिक बहस और जनचर्चा के केंद्र में है.

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