मानसून ने इस बार जो रौद्र रूप दिखाया है, उसने एक बार फिर साबित कर दिया है कि कुदरत के आगे हमारी करोड़ों-अरबों की इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं कितनी बौनी हैं. पश्चिमी घाट की पहाड़ियां हो या हिमालय की वादियां, हर जगह पानी अपनी ताकत दिखा रहा है. इन हादसों की सबसे बड़ी त्रासदी सिर्फ मौतों का आंकड़ा नहीं है, बल्कि एक सवाल है जो हर साल गूंजता है- क्या हमने वाकई कुछ सीखा है और कैसे सरकारें फेल हो जाती हैं? आइए तबाही के सबसे बड़े केंद्र महाराष्ट्र से होते हुए पूरे देश की तस्वीर देखते हैं…
महाराष्ट्र: जब मिसिंग लिंक बना आफत का सबब
पिछले 3-4 दिनों में महाराष्ट्र में भारी बारिश से अब तक 13 लोगों की मौत हो चुकी है. लेकिन जिस घटना ने सबको झकझोर कर रख दिया, वो है मुंबई-पुणे एक्सप्रेस-वे पर हुआ भूस्खलन. ये वही एक्सप्रेस-वे है जिसे दो महीने पहले ही इंजीनियरिंग का चमत्कार बताया गया था. 6,695 करोड़ रुपए की लागत से बने ‘मिसिंग लिंक’ प्रोजेक्ट का उद्घाटन मई 2026 में हुआ था. अब पहली ही बारिश में इसके सुरंग के पास का पिलर ढह गया.
सोमवार (6 जुलाई) तड़के करीब 100 टन मलबा सड़क पर आ गिरा, जिससे पूरा ट्रैफिक ठप हो गया. इसे साफ करने और यातायात बहाल करने में एजेंसियों को पूरे 18 घंटे लग गए. जिस सड़क को खंडाला घाट के खतरनाक मोड़ों से बचने और रोजाना डेढ़ लाख यात्रियों का आधा घंटा बचाने के लिए बनाया गया था, वो खुद ही एक बड़े खतरे में तब्दील हो गई.
राज्य के मंत्री शिवेंद्रराजे भोसले का कहना है कि यकीन करना मुश्किल है क्योंकि इतना बड़ा मलबा पहले कभी नहीं गिरा. लेकिन यह बयान उस सच्चाई को नहीं छुपा पाता जो पिछले कुछ हफ्तों से सामने आ रही है. जुलाई में ही इसी एक्सप्रेसवे के 13.3 किलोमीटर लंबे हिस्से पर गड्ढे उभर आए थे. अब भूस्खलन ने साफ कर दिया कि इस प्रोजेक्ट की नींव में ही कहीं कोई बड़ी चूक रह गई है.
मौत का सिलसिला: पुणे से मुंबई तक तबाही
अकेले पुणे में ही बारिश से जुड़ी अलग-अलग घटनाओं में चार लोगों की जान चली गई. विसापुर किले का एक हिस्सा तड़के भरभराकर गिर गया और मलबे के नीचे एक मकान दब गया, जिसमें एक ही परिवार के तीन लोग नंदू टिकोने, माउली टिकोने और अनौता नंदू टिकोने की दर्दनाक मौत हो गई.
पिंपरी चिंचवाड़ के निगडी इलाके में दीवार गिरने से एक मजदूर की जान चली गई और आठ लोग घायल हो गए. यह तस्वीर बताती है कि खतरा सिर्फ पहाड़ों से नहीं, बल्कि हमारे आसपास की कमजोर हो चुकी संरचनाओं से भी है. खेड़ तहसील में तो पानी का बहाव इतना तेज था कि मोटरसाइकिल सवार दो लोग बह गए, जिनका अब तक कुछ पता नहीं चल पाया है.

ठप्प पड़ा मुंबई: जब लाइफलाइन बनी मौत का जाल
मुंबई में पिछले चार दिनों से लगातार हो रही मूसलाधार बारिश ने शहर को पूरी तरह ठप कर दिया है. हालात इतने खराब हुए कि विधानसभा की कार्यवाही तक स्थगित करनी पड़ी. स्कूल, कॉलेज और सरकारी दफ्तर दो दिनों के लिए बंद कर दिए गए हैं. लेकिन असली कहानी उन लाखों यात्रियों की है जो मुंबई की लाइफलाइन कही जाने वाली लोकल ट्रेन और राजमार्गों पर फंसे रहे.
लोनावला के पास दो जगह भूस्खलन से रेलवे ट्रैक पर मलबा भर गया, जिससे मुंबई-पुणे के बीच सभी रेल सेवाएं निलंबित करनी पड़ीं. यही हाल मुंबई-अहमदाबाद कॉरिडोर का रहा, जहां जलभराव के चलते पश्चिमी रेलवे की 40 से ज्यादा ट्रेनें प्रभावित हुईं और 10 ट्रेनों को रद्द करना पड़ा. सफर करने का कोई भी जरिया सुरक्षित नहीं बचा. शहर के निचले इलाकों में तो कई फुट पानी भर गया. पुणे के घोरवाड़ी रेलवे स्टेशन के पास एक निजी बस पानी में फंस गई, जिसमें से NDRF की टीम ने बड़ी मुश्किल से 37 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला.
आने वाले दिनों के डर को देखते हुए पूरे महाराष्ट्र में NDRF की 17 टीमें तैनात कर दी गई हैं. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने नासिक और त्र्यंबकेश्वर में बादल फटने की आशंका जताई है, जहां 300 मिमी तक बारिश का अनुमान है. इस अलर्ट ने 2027 में होने वाले सिंहस्थ कुंभ की तैयारियों पर भी संकट खड़ा कर दिया है.

जम्मू-कश्मीर: चिनाब घाटी में बाढ़ का कहर
महाराष्ट्र से निकलकर नजर डालें तो हिमालय की वादियों में भी मानसून ने जमकर तबाही मचाई है. जम्मू-कश्मीर की चिनाब घाटी में अचानक आई बाढ़ ने डोडा और किश्तवाड़ जिलों में भारी नुकसान पहुंचाया है. डोडा-किश्तवाड़ राष्ट्रीय राजमार्ग पर हुए भूस्खलन ने ट्रक, डोजर और कई गाड़ियों को अपनी चपेट में ले लिया, जिससे यहां का संपर्क पूरी तरह कट गया. प्रशासन को मचैल माता यात्रा को अस्थायी रूप से रोकना पड़ा.
सबसे बड़ा झटका किश्तवाड़ की 540 मेगावाट की क्वार पनबिजली परियोजना को लगा है. यहां एक बड़ा भूस्खलन हुआ जिसने परियोजना के बुनियादी ढांचे को बुरी तरह बर्बाद कर दिया. मलबे में कई गाड़ियां और मशीनें दब गईं, जिन्हें निकालने के लिए जेसीबी और भारी मशीनों से काम चल रहा है.

हिमाचल में बादल फटा, तो वहीं ओडिशा डूबा
हिमाचल प्रदेश में भी हालात बेहद गंभीर हैं. शिमला के रामपुर उपमंडल की नरैण पंचायत में रविवार रात बादल फटने से बारांदली खड्ड में अचानक इतनी भीषण बाढ़ आई कि एक पैदल पुल और श्मशान घाट बह गया. खेल का मैदान मलबे से पट गया. चंबा में पहाड़ से पत्थर गिरने से एक किशोरी की दर्दनाक मौत हो गई और पंगोला नाला के उफान ने चंबा-तिस्सा मार्ग को ठप कर दिया.
कुल्लू में लारजी-सैंज मार्ग और पार्वती पावर स्टेशन के जलाशय का उफनना खतरे की घंटी बजा रहा है. मौसम विभाग ने कांगड़ा, कुल्लू, मंडी, शिमला और सोलन के लिए अगले 2-3 दिनों तक भारी बारिश का ऑरेंज अलर्ट जारी किया हुआ है.
इसके अलावा, ओडिशा में भी भारी बारिश ने कई शहरों को जलमग्न कर दिया है और पूरे राज्य में अलर्ट जारी है. हैरानी की बात ये है कि एक तरफ देश का बड़ा हिस्सा पानी में डूबा है, वहीं पंजाब और हरियाणा जैसे उत्तर-पश्चिम के मैदानी राज्य बारिश न होने से भीषण गर्मी और उमस की चपेट में हैं. यह हालात इस बात का सबूत है कि जलवायु परिवर्तन के इस दौर में मौसम का कोई भरोसा नहीं रह गया है.
कुदरत के आगे फेल हमारी तैयारियां
इस पूरी तबाही का सबसे बड़ा सच ये है कि हमारी सरकारें हर साल बजट में करोड़ों-अरबों रुपए आपदा प्रबंधन के लिए रखती हैं, लेकिन जब बारिश आती है, तो पूरा सिस्टम चरमरा जाता है. मुंबई का वो मिसिंग लिंक प्रोजेक्ट, जिसे मास्टरपीस बताया गया, पहली ही बारिश में ढह गया.
हर साल असम और बिहार में बाढ़ आती है, लेकिन न तो नदियों के किनारे पक्के तटबंध बन पाए और न ही लोगों को सुरक्षित ठिकानों पर पहुंचाने की कोई स्थायी व्यवस्था हो पाई. उत्तराखंड और हिमाचल में पर्यटकों की भीड़ बढ़ती है, लेकिन पहाड़ों की नाजुक सेहत का ख्याल रखे बिना सड़कें चौड़ी कर दी जाती हैं, जिसका नतीजा हर साल जानलेवा भूस्खलन के रूप में सामने आता है.
एक्सपर्ट्स कहते हैं कि जब तक हम अपने इंफ्रास्ट्रक्चर की ‘रीढ़’ को मजबूत नहीं करेंगे, तब तक हर साल यही कहानी दोहराई जाएगी. फिर चाहे वो नालों की सफाई हो, नदियों पर बांध हों या पहाड़ों पर निर्माण के नियम. अभी के लिए पूरा देश मौसम विभाग के उस डीप डिप्रेशन के आगे बेदम खड़ा है जो बंगाल की खाड़ी से उठकर उत्तर भारत की ओर तेजी से बढ़ रहा है. आने वाले दिन और भी भारी हो सकते हैं. सवाल वही है कि क्या हमने कुछ सीखा है या फिर अगली बारिश तक ये सबक भी पानी में बह जाएगा?






