FCRA बिल क्या बला है, जो भारत की मस्जिद-चर्च से लेकर US तक हलचल?

FCRA बिल क्या बला है, जो भारत की मस्जिद-चर्च से लेकर US तक हलचल?


विदेशी फंडिंग को लेकर भारत सरकार एक बड़ा कानूनी बदलाव करने जा रही है यानी FCRA में संशोधन. इस बिल को लेकर देश में विपक्ष से लेकर धार्मिक संगठनों तक नाराजगी है. अब अमेरिका तक ने इस पर ऐतराज जताया है. 12 अगस्त 2026 को बिल पर संसद में चर्चा होने से पहले सवाल यही हैं कि FCRA आखिर है क्या, मस्जिद-चर्च पर संकट क्यों और सरकार इसमें क्या बदलाव चाहती है…

सबसे पहले जान लें कि FCRA बिल है क्या?

फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट यानी FCRA, एक विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम है. इसे 1976 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी के दौरान बनाया था. इसका मकसद था भारतीय NGO में विदेशी ताकतों की फंडिंग रोकना, ताकि भारत के NGO, इंस्टीट्यूट्स और ट्रस्टों को पैसा देकर भारत के अंदरूनी मामलों को प्रभावित न कर सकें.

FCRA तीन काम करता है:

1. यह तय करता है कि कौन विदेशी चंदा ले सकता है और किन शर्तों पर.
2. यह बताता है कि वह पैसा कैसे लिया जाए और हिसाब कैसे रखा जाए.
3. यह उन विदेशी फंडेड गतिविधियों पर रोक लगाता है जो भारत की संप्रभुता, सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचा सकती हैं.

2010 में मनमोहन सिंह सरकार ने और 2020 में मोदी सरकार ने इसे सख्त किया. 2020 में हुए बड़े बदलावों में शामिल थे:

  • NGOs अब सिर्फ 20% विदेशी पैसा प्रशासनिक खर्च में लगा सकते हैं, पहले 50% की लिमिट थी.
  • सारा विदेशी पैसा दिल्ली की SBI ब्रांच के एक तय खाते में ही आ सकता है.
  • सब-ग्रांट पर रोक लगेगी यानी बड़े NGO छोटे NGOs को फंड नहीं दे सकते.

FCRA बिल में अब क्या बदलाव चाहती है सरकार?

यह बिल 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था, लेकिन विपक्ष के हंगामे की वजह से पास नहीं हो पाया था. अब इसे 12 अगस्त 2026 को संसद में चर्चा और पास करने के लिए रखा जा सकता है. केंद्र सरकार इसमें तीन बड़े बदलाव करना चाहती है:

  • काम और इलाका साफ बताना होगा: संस्थाओं को अब रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट पर साफ लिखना होगा कि विदेशी पैसा किस काम के लिए और किस राज्य/UT में इस्तेमाल होगा. पहले ‘सामाजिक’ और ‘धार्मिक’ जैसी ब्रॉड कैटेगरी चलती थी.
  • ‘डिजाइनेटेड अथॉरिटी’ का गठन: सरकार एक नई अथॉरिटी बनाएगी जो उन NGOs के विदेशी फंड से बनी संपत्तियों को जब्त, मैनेज या बेच सकती है, जिनका FCRA रजिस्ट्रेशन रद्द, सरेंडर या समाप्त हो जाता है.
  • ‘सीजेशन’ (समाप्ति) का प्रावधान: अगर कोई संस्था 5 साल की अवधि के बाद अपना FCRA रजिस्ट्रेशन रिन्यू नहीं करती, तो उसका सर्टिफिकेट अपने-आप समाप्त माना जाएगा. उसकी सारी विदेशी फंड से बनी संपत्ति डिजाइनेटेड अथॉरिटी के पास चली जाएगी.
  • न्यूनतम खर्च की शर्त: NGOs को अपना FCRA लाइसेंस बचाए रखने के लिए हर साल अपने विदेशी फंड अकाउंट से कम से कम 10 लाख रुपए खर्च करने होंगे.
  • सजा की अवधि घटी: FCRA नियम तोड़ने पर अधिकतम सजा 5 साल से घटाकर 1 साल कर दी गई है.
    धार्मिक स्थलों का स्वरूप बरकरार: अगर जब्त की गई संपत्ति कोई पूजा स्थल है, तो उसका धार्मिक स्वरूप नहीं बदला जा सकता, यानी मंदिर मंदिर ही रहेगा, चर्च चर्च ही रहेगा.

‘संपत्ति जब्ती’ के प्रावधान पर विवाद क्यों?

सबसे ज्यादा विरोध सेक्शन 14B और 16A को लेकर है. इसके तहत अगर किसी NGO का FCRA रजिस्ट्रेशन रिन्यू नहीं होता (चाहे वह भूल से हो या किसी तकनीकी वजह से), तो उसकी सारी विदेशी फंड से बनी संपत्ति सरकार के कब्जे में चली जाएगी. फिर चाहे वो स्कूल, हॉस्पिटल, चर्च, मस्जिद या वेलफेयर इंस्टीट्यूशन ही क्यों न हो.

इसके लिए डिजाइनेटेड अथॉरिटी को सिविल कोर्ट की ताकत दी गई है. वह NGOs की संपत्ति को सरकार या किसी और को ट्रांसफर या बेच सकती है. सबसे बड़ी चिंता यही है कि अथॉरिटी बिना किसी कोर्ट के आदेश के यह काम कर सकती है.

ईसाई संगठनों को क्यों डर है?

केरल, मिजोरम, नॉर्थईस्ट में ईसाई मिशनरी संस्थाएं दशकों से विदेशी फंड पर चल रही हैं. उनके पास बड़े स्कूल, कॉलेज, हॉस्पिटल और चर्च हैं. अगर उनका FCRA रजिस्ट्रेशन किसी कारणवश रिन्यू नहीं हुआ, तो सारी संपत्ति जब्त हो सकती है.

कांग्रेस सांसद शशि थरूर के मुताबिक, पहले से लागू सख्त प्रावधानों की वजह से विदेशी फंडिंग में पहले ही 87% तक गिरावट आ चुकी है और हजारों संस्थान बंद हो चुके हैं. फिलहाल FCRA के तहत करीब 16 हजार संस्थाएं रजिस्टर्ड हैं, जिन्हें हर साल लगभग 22 हजार करोड़ रुपए की विदेशी फंडिंग मिलती है. स्कूल, अस्पताल और सामाजिक सेवाओं का बड़ा हिस्सा इसी पैसे पर टिका है. NGOs को डर है कि नए नियमों से यह पूरा ढांचा कमजोर पड़ सकता है.

इस बिल पर अमेरिका ने क्यों किया ऐतराज?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के सदस्य रिले मूर ने इस बिल की जमकर आलोचना की. उन्होंने X पर पोस्ट कर कहा, ‘ईसाई भारत में सेंट थॉमस के समय से हैं. इस लंबे इतिहास के बावजूद, भारत की संसद FCRA में संशोधन कर चर्चों और धार्मिक चैरिटी का सरकारी अधिग्रहण करने जा रही है. यह ईसाइयों पर सीधा हमला है. अगर यह बिल ऐसे ही आगे बढ़ा, तो यह भारत-अमेरिका संबंधों में बड़ी चिंता का विषय होगा.’

एक्सपर्ट्स ने यह सवाल उठाया है कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो खुद कह चुके हैं कि विदेशी सहायता को सरकारों को बायपास नहीं करना चाहिए, तो फिर अमेरिका भारत के FCRA कानून का विरोध क्यों कर रहा है?

मोदी सरकार ने बिल पर क्या कहा?

गृह मंत्री अमित शाह ने 6 अगस्त 2026 को ईसाई संगठनों के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की और आश्वासन दिया कि:

  • FCRA बिल ‘धर्म-निरपेक्ष’ है. यह किसी खास धर्म को निशाना नहीं बना रहा.
  • सरकार का ईसाई समुदाय को परेशान करने का कोई इरादा नहीं है.
  • बिल पूर्वव्यापी नहीं लागू होगा.
  • धार्मिक स्थलों का धार्मिक स्वरूप बरकरार रहेगा.

प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) ने भी सफाई देते हुए कहा, ‘डिजाइनेटेड अथॉरिटी सिर्फ विदेशी फंड से बनी संपत्तियों का प्रबंधन करती है, सिर्फ तब जब किसी संस्था का रजिस्ट्रेशन कानूनी तौर पर समाप्त हो चुका हो. वेस्टिंग शुरू में प्रोविजनल होती है कि अगर रजिस्ट्रेशन रिन्यू हो जाता है तो संपत्ति वापस मिल जाती है.’

मिजोरम CM लालदुहोमा ने शाह से मुलाकात की और कहा कि उन्हें आश्वासन मिला है कि बिल पूर्वव्यापी नहीं होगा और 12 अगस्त को इस पर चर्चा होगी.

तो क्या सदन में बिल पास हो जाएगा?

मानसून सत्र 2026 में यह बिल अभी तक पेश नहीं हुआ, तो पास होने का सवाल ही हनीं. लेकिन:

  • 12 अगस्त 2026 को इस पर लोकसभा में चर्चा होने की संभावना है.
  • कांग्रेस और DMK जैसी विपक्षी पार्टियां इसे ‘तानाशाही’ और ‘खतरनाक’ करार दे रही हैं.
  • ईसाई नेताओं ने या तो बिल वापस लेने या संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को भेजने की मांग की है.
  • पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने कहा, ‘FCRA बिल अभी तक टेबल नहीं हुआ है और शायद बिल्कुल नहीं टेबल हो.’ 
  • बीजेपी सरकार चाहती है कि बिल पर बहस हो और हंगामे के बीच पास न कराया जाए.

FCRA संशोधन बिल एक सामान्य विधेयक है. इसे पास कराने के लिए सदन में मौजूद और वोट करने वाले सदस्यों का सिर्फ साधारण बहुमत, यानी 50%+1 की जरूरत है. लोकसभा में 543 सदस्य हैं और 3 सीटें खाली हैं. अगर सभी सदस्य मौजूद रहते हैं, तो बहुमत के लिए 271 वोट चाहिए. NDA के पास अभी 318 सीटें हैं. राज्यसभा में 245 सदस्य हैं और बहुमत के लिए 123 वोट चाहिए. NDA के पास 152 है. यानी दोनों सदनों में बिल पारित कराने के लिए सरकार के पास पर्याप्त संख्याबल है.

इस बिल का आम भारतीय पर क्या असर?

एक्सपर्ट्स का मानना है कि आम नागरिकों पर सीधा कोई असर नहीं होगा, क्योंकि FCRA सिर्फ विदेशी फंड लेने वाली संस्थाओं पर लागू होता है. NGOs, ट्रस्ट या संस्थाओं पर ही बड़ा असर दिखेगा. वो भी तब जब रजिस्ट्रेशन रिन्यू न करने पर संपत्ति जब्त हो जाए. मस्जिद और चर्च जैसे धार्मिक स्थल विदेशी फंडिंग से बनते हैं तो जब्ती के बाद भी उनका धार्मिक स्वरूप बरकरार रहेगा. 

यह बिल अभी कानून नहीं बना है. 12 अगस्त को संसद में इस पर बहस होगी और फिर देखना होगा कि सरकार विपक्ष और धार्मिक संगठनों के विरोध के बीच इसे पास करा पाती है या नहीं. फिलहाल एक बात तय है कि यह बिल भारत में विदेशी फंडिंग के पूरे इकोसिस्टम को बदल सकता है. इस वजह से इस पर देश नहीं, पूरी दुनिया की नजर है.



Source link