Devshayani Ekadashi: देवशयनी एकादशी के बाद मांगलिक कार्यों पर लगेगा ‘ब्रेक’, शादी के लिए 4 महीन

Devshayani Ekadashi: देवशयनी एकादशी के बाद मांगलिक कार्यों पर लगेगा ‘ब्रेक’, शादी के लिए 4 महीन


Chaturmas 2026: वाराणसी (काशी). यदि आप इस साल अपने घर में शहनाई बजाने या बच्चों के उपनयन (जनेऊ) संस्कार की योजना बना रहे हैं, तो यह खबर आपके लिए बेहद महत्वपूर्ण है. काशी की ज्योतिषीय गणना के अनुसार, आगामी 12 जुलाई के बाद विवाह और उपनयन संस्कार जैसे सभी मांगलिक कार्यों पर एक लंबा विराम लगने जा रहा है. इसके बाद शुभ मुहूर्त के लिए लोगों को महीनों का इंतजार करना होगा.

दरअसल, हिंदू शास्त्रों के अनुसार 12 जुलाई को देवशयनी एकादशी है, जिसके बाद सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु चार महीनों के लिए योग निद्रा में चले जाएंगे. इसी के साथ चातुर्मास की शुरुआत हो जाएगी. इस अवधि के दौरान गुरु और शुक्र ग्रह के अस्त रहने के कारण कोई भी शुभ या मांगलिक कार्य नहीं किया जाता है.

विवाह के लिए करना होगा 4 महीने का लंबा इंतजार

श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के पूर्व अध्यक्ष और काशी की परंपराओं के प्रकांड विद्वान प्रो. नागेंद्र पांडे के अनुसार, 12 जुलाई के बाद एक लंबी अवधि तक विवाह का कोई भी शुभ मुहूर्त उपलब्ध नहीं है. ऐसे में देवउठनी एकादशी के बाद ही शहनाइयों की गूंज दोबारा सुनाई देगी.

विवाह योग्य लड़के-लड़कियों और उनके परिवारों को अब 22 नवंबर तक का इंतजार करना पड़ेगा. हालांकि, अच्छी बात यह है कि 22 नवंबर से लेकर अगले साल 7 जुलाई तक शादियों के लिए कुल 63 शुभ मुहूर्त उपलब्ध रहेंगे.

इस साल (नवंबर और दिसंबर) में विवाह की शुभ तिथियां:

  • नवंबर: 22, 25, 26 और 30 तारीख.
  • दिसंबर: 4, 6, 9, 10, 11 और 14 तारीख.

उपनयन संस्कार के लिए सीधे अगले साल का मुहूर्त

विवाह के लिए तो फिर भी 4 महीने बाद नवंबर में मुहूर्त मिल रहे हैं, लेकिन बच्चों के उपनयन (जनेऊ) संस्कार के लिए माता-पिता को सीधे अगले साल तक का इंतजार करना पड़ेगा. ज्योतिष गणना के मुताबिक, 12 जुलाई के बाद इस पूरे वर्ष उपनयन संस्कार का कोई मुहूर्त नहीं है.

उपनयन संस्कार के लिए अब अगले साल 9 फरवरी से शुभ मुहूर्त की शुरुआत होगी. इसके बाद मार्च, अप्रैल, मई से लेकर जुलाई तक लगातार अच्छे और श्रेष्ठ मुहूर्त बनते दिखाई देंगे.

चातुर्मास में क्यों थम जाते हैं मांगलिक कार्य?

वैदिक मान्यताओं के अनुसार, देवशयनी एकादशी से लेकर देवउठनी एकादशी तक के चार महीनों (चातुर्मास) में भगवान विष्णु क्षीर सागर में शयन करते हैं. इस दौरान ब्रह्मांडीय ऊर्जा और शुभ ग्रहों (जैसे गुरु और शुक्र) का प्रभाव कम हो जाता है. सनातन धर्म में गुरु को ज्ञान व संतान और शुक्र को दांपत्य सुख का कारक माना गया है. इन दोनों ग्रहों के अस्त होने या शुभ स्थिति में न होने के कारण इस अवधि में किए गए मांगलिक कार्यों का पूर्ण फल नहीं मिलता.

ऐसे में यदि आप भी कोई बड़ा मांगलिक आयोजन करने जा रहे हैं, तो ज्योतिषीय गणना के अनुसार अपनी तारीखों को नवंबर या अगले साल के लिए री-शेड्यूल करना ही समझदारी होगी.

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Input By : निशांत चतुर्वेदी



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