- प्रधानमंत्री मोदी का वीडियो फेसबुक से गायब, सरकार ने गंभीरता से लिया।
- 3 अगस्त को सोशल मीडिया दिग्गज संसद समिति के समक्ष होंगे।
- समिति कंपनियों से डेटा सुरक्षा, जवाबदेही पर सवाल उठाएगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो कुछ समय के लिए फेसबुक से गायब हो गया. मेटा ने इसे तकनीकी गलती बताया, माफी मांगी और वीडियो दोबारा बहाल भी कर दिया, लेकिन मामला अब सिर्फ एक वीडियो तक सीमित नहीं है. केंद्र सरकार ने इस घटना को गंभीरता से लिया है और अब अगले हफ्ते सोमवार (3 अगस्त, 2026) को संसद की संचार और सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी स्थायी समिति के सामने मेटा, गूगल, एक्स और स्नैपचैट के वरिष्ठ अधिकारियों को पेश होना होगा.
उनके साथ इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और गृह मंत्रालय के अधिकारी भी मौजूद रह सकते हैं, यानी अब सवाल सिर्फ एक पोस्ट का नहीं, बल्कि भारत में सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही का है.
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फेसबुक पर देश के युवाओं के नाम एक वीडियो संदेश साझा किया था. वीडियो में उन्होंने पेपर लीक से जुड़ी टास्क फोर्स बनाने का जिक्र किया था, लेकिन कई लोगों ने देखा कि यह वीडियो फेसबुक पर दिखाई नहीं दे रहा. कुछ यूजर्स को संदेश मिला कि यह कंटेंट भारत में उपलब्ध नहीं है. देखते ही देखते इसके स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर वायरल होने लगे और सवाल उठने लगे कि आखिर प्रधानमंत्री की आधिकारिक पोस्ट गायब कैसे हो गई?
मेटा ने क्या सफाई दी?
कुछ ही देर बाद मेटा कंपनी ने इस संबंध में बयान जारी किया. कंपनी के मुताबिक, वीडियो गलती से हट गया था और उसे तुरंत बहाल कर दिया गया. मेटा ने कहा कि यह किसी नियम के उल्लंघन की वजह से नहीं, बल्कि तकनीकी चूक के कारण हुआ, यानी कंपनी का दावा है कि यह कोई जानबूझकर लिया गया फैसला नहीं था.
हालांकि, सरकारी सूत्रों के मुताबिक, केंद्र सरकार ने मेटा के इस स्पष्टीकरण को पर्याप्त नहीं माना. सूत्रों के अनुसार, MeitY ने मेटा के ग्लोबल हेड ऑफ पब्लिक पॉलिसी को तलब किया. हालांकि, मंत्रालय की ओर से इस पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है.
सरकार का सवाल साफ है – अगर यह सिर्फ तकनीकी गलती थी, तो हुई कैसे? क्या सिस्टम में कोई खामी है? क्या किसी कर्मचारी से चूक हुई? और सबसे बड़ा सवाल है कि अगर प्रधानमंत्री की आधिकारिक पोस्ट गायब हो सकती है, तो किसी भी आम नागरिक की पोस्ट कितनी सुरक्षित है?
संसदीय स्थायी समिति की बैठक का विषय क्या?
अब मामला संसद समिति तक पहुंच गया है. अब इस पूरे मामले पर समिति की नजर है. तीन अगस्त को होने वाली संसदीय स्थायी समिति की बैठक का विषय है- ‘सोशल और डिजिटल प्लेटफॉर्म और उनका नियमन.’ इस बैठक में मेटा (Meta), गूगल (Google), एक्स (X) और स्नैपचैट (Snapchat) से कई अहम सवाल पूछे जा सकते हैं.
किन मुद्दों पर मांगे जाएंगे जवाब?
यह अहम बैठक सिर्फ प्रधानमंत्री के वीडियो तक सीमित नहीं रहने वाली है. समिति कई बड़े मुद्दों पर भी जवाब चाहती है, जैसे कि भारतीय यूजर्स का डेटा कितना सुरक्षित है? महिलाओं और बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए क्या इंतजाम हैं? फर्जी अकाउंट कितनी तेजी से हटाए जाते हैं? डीपफेक वीडियो की पहचान कैसे होती है? फेक न्यूज रोकने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है? भारत के कानूनों का पालन कैसे सुनिश्चित किया जाता है? समिति अब इन कंपनियों की पूरी जवाबदेही पर सवाल उठाने जा रही है.
‘पब्लिक ऑर्डर‘ क्यों बना सबसे बड़ा मुद्दा?
इस पूरी चर्चा में एक शब्द ‘पब्लिक ऑर्डर’ बार-बार सामने आ रहा है. सरल भाषा में इसका मतलब है देश में कानून-व्यवस्था बनाए रखना. कोई फर्जी वीडियो वायरल होता है, तो लाखों लोग उसे सच मान लेते हैं. भीड़ जुट जाती है, तनाव बढ़ता है और हिंसा भड़क जाती है. ऐसी स्थिति में सरकार जानना चाहती है कि सोशल मीडिया कंपनियां ऐसे कंटेंट को कितनी तेजी से पहचानती और हटाती हैं.
क्यों अहम है यह मामला?
आज के वक्त में सोशल मीडिया सिर्फ मनोरंजन का प्लेटफॉर्म नहीं रह गया है. यहीं चुनाव प्रचार होता है. यहीं सरकारें जनता तक पहुंचती हैं. यहीं करोड़ों लोग अपनी खबरें देखते हैं और कई बार यहीं से अफवाहें भी पूरे देश में फैल जाती हैं. ऐसे में सवाल सिर्फ एक वीडियो का नहीं, बल्कि उन डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारी का है, जिन पर करोड़ों भारतीय रोज भरोसा करते हैं.
अब संसद समिति यह समझना चाहती है कि ऐसी गलती हुई कैसे? दोबारा न हो, इसके लिए क्या व्यवस्था है और भारत में काम कर रही वैश्विक टेक कंपनियां भारतीय कानूनों और नागरिकों के प्रति कितनी जवाबदेह हैं?
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