Sita Navami 2026: कैसे एक ब्राह्मणी बनी चांडालिनी? सीता नवमी पर पढ़ें पापों से मुक्ति की कथा?

Sita Navami 2026: कैसे एक ब्राह्मणी बनी चांडालिनी? सीता नवमी पर पढ़ें पापों से मुक्ति की कथा?


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  • वैशाख शुक्ल नवमी को सीता नवमी मनाते हैं, 2026 में 25 अप्रैल को है।
  • माता सीता के जन्मोत्सव पर पूजा-व्रत से राम-हनुमान कृपा मिलती है।
  • लोक कथा: चांडालिनी ने अनजाने में सीता नवमी व्रत पूरा किया।
  • सीता नवमी पर पूजा से सुख, सौभाग्य और दरिद्रता दूर होती है।

Sita Navami 2026 Katha: हर साल वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि के मौके पर सीता नवमी (Sita Navmi) मनाया जाता है. इस साल यह त्योहार 25 अप्रैल 2026 को है. हिंदू धर्म में इस दिन को माता सीता के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है.

माता सीता के अवतरण दिवस यानी सीता नवमी पर जो भी भक्त सच्चे मन से उनकी पूजा और व्रत कथा का पाठ करता है, उस पर मां सीता के साथ भगवान श्रीराम और हनुमान जी की विशेष कृपा प्राप्त होती है. 

सीता नवमी से जुड़ी लोककथा

सीता नवमी से जुड़ी एक लोक-प्रचलित व्रत कथा के अनुसार, मारवाड़ क्षेत्र में एक ब्रह्माण जिसका नाम देवदत्त था , अपनी सुंदर पत्नी शोभना के साथ रहता था. ब्राह्मण देवता जीविका के लिए अपने गांव से किसी और गांव में भिक्षा मांगने के लिए गए हुए थे, इधर ब्राह्मण देवता की पत्नी शोभना कुसंगत में फंसकर गलत आचरण में लिप्त हो गई. 

ब्राह्मणी की इस गलत काम की चर्चाएं पूरे गांव में होने लगी. परंतु उस दुष्ट महिला ने गांव में आग लगवा दी और जब वह मरी तो उसका अगला जन्म चांडाल के घर में हुआ. पति के साथ छल और त्याग करने के कारण वह चांडालिनी बनी, गांव जलाने के कारण वह कुष्ठ रोग और और व्यभिचार करने की वजह से अंधी भी हो गई. 

इस तरह वह अपने पूर्व कर्मों के द्वारा दिनों दिन दारुण दुख भोगते हुए देश-देशांतर में भटकने लगी. एक बार वह दैवयोग से भटकते हुए कौशलपुरी नगरी पहुंची, जहां संयोगवश उस दिन वैशाख मास शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि थी, जो समस्त पापों का नाश करने में समर्थ है.

जानकी नवमी के पावन उत्सव पर वह भूखी-प्यासी व्याकुल होकर प्रार्थना करने लगी- हे सज्जनों! मुझ पर दया कीजिए और कुछ खाने को दे दीजिए. मैं भूख से मरी जा रही हूं, ऐसा कहती हुए वह कनक भवन के समक्ष बने एक हजार पुष्प मंडित स्ंतभों से गुजरती हुई उसमें प्रवेश कर गई. उसने फिर कहा, भैया कोई तो मेरी सहायता करो कुछ खाने को दे दो. 

इतने में एक भक्त ने उससे कहा- देवी आज तो सीता नवमी का दिन है, भोजन में अन्न देने वाले को पाप लगता है, इसलिए आज तो भोजन में अनाज नहीं मिलेगा. कल पारणा के समय आना, ठाकुर जी का प्रसाद जितना खाना चाहो खा लेना, किंतु वह मानी नहीं. ज्यादा कहने पर भक्त ने उसे तुलसी एवं जल दे दिया. वह पापिनी भूख से मर गई. किंतु अनजाने में उससे सीता नवमी का व्रत पूरा हो गया. 

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माता सीता के आशीर्वाद से वह समस्त पापों से मुक्त हो गई. इस व्रत के असर से वह पापिनी निर्मल होकर स्वर्ग में आनंदपूर्वक अनंत सालों तक रही. इसके बाद वह कामरूप देश के महाराज जयसिंह की महारानी कामकला के नाम काफी विख्यात हुई. सीता नवमी से जुड़ी यह व्रत कथा इस पवित्र दिन को और भी अधिक आध्यात्मिक बनाने का काम करती है. 

सीता नवमी के मौके पर जो भी भक्त माता सीता की पूजा सच्चे मन से करता है, उसे समस्त तरह के सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होती है. एक बात जिसपर पता नहीं कितने लोगों ने गौर किया हो गया, भगवान श्रीराम और माता सीता दोनों का जन्म नवमी तिथि को हुआ था, ठीक उसी तरह भगवान श्रीकृष्ण और राधा का जन्म अष्टमी तिथि पर, जो कहीं न कहीं सच्चे प्रेम की दिव्यता को दर्शाता है.

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