क्या एमपी-यूपी के किसान भी कर सकते हैं चाय की खेती? शुरुआत करने से पहले जान लें ये जरूरी बातें

क्या एमपी-यूपी के किसान भी कर सकते हैं चाय की खेती? शुरुआत करने से पहले जान लें ये जरूरी बातें


Tea Cultivation Tips: जब भी चाय की खेती का नाम आता है हमारे दिमाग में तुरंत असम के हरे-भरे बागान या दार्जिलिंग की बर्फीली पहाड़ियां घूमने लगती हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि क्या मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों में भी चाय की पत्तियां उगाईं जा सकती हैं? तो आपको बता दें ऐसा बिल्कुल किया जा सकता है और दोनों राज्यों के कुछ किसान इसके लिए नए एक्सपेरिमेंट भी कर रहे हैं. 

पारंपरिक फसलों जैसे गेहूं, धान और गन्ने में जब लागत के मुकाबले मुनाफा कम होने लगा. तो किसानों का रुझान इस तरह की कमर्शियल खेती की तरफ बढ़ा है. हालांकि मैदानी इलाकों में चाय उगाना किसी चुनौती से कम नहीं है क्योंकि इसके लिए एक खास तरह के माहौल की जरूरत होती है. अगर इसकी खेती के लिए जरूरी चीजों और माहौल तैयार कर लिया जाए तो एमपी-यूपी में उग सकती है चाय.

एमपी-यूपी की मिट्टी में हो सकती है चाय की खेती?

चाय के पौधे को फलने-फूलने के लिए हल्की अम्लीय यानी एसिडिक मिट्टी की जरूरत होती है. जिसका पीएच लेवल 4.5 से 5.5 के बीच होना चाहिए. उत्तर प्रदेश के तराई वाले इलाकों जैसे पीलीभीत या लखीमपुर खीरी और मध्य प्रदेश के अमरकंटक या पचमढ़ी जैसे पहाड़ी और नमी वाले क्षेत्रों में इसके लिए काफी अनुकूल माहौल मिल जाता है. 

पानी बिल्कुल नहीं रुकना चाहिए

सबसे जरूरी बात यह है कि चाय के पौधे की जड़ों में पानी बिल्कुल भी नहीं रुकना चाहिए. नहीं तो जड़ें तुरंत गल जाती हैं. इसलिए ढलान वाली जमीन या बेहतरीन ड्रेनेज सिस्टम वाले खेत इसके लिए सबसे परफेक्ट होते हैं. मैदानी इलाकों में गर्मियों के दौरान पड़ने वाली तेज लू से पौधों को बचाने के लिए खेतों के चारों तरफ ऊंचे छायादार पेड़ लगाना बहुत जरूरी होता है.

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 इन जरूरी बातों का रखें ध्यान

चाय की खेती में कदम रखने से पहले यह जान लेना जरूरी है कि यह कोई एक-दो महीने की फसल नहीं है. बल्कि एक लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टमेंट है. चाय का पौधा लगाने के बाद उसे पहली बार तोड़ने लायक होने में कम से कम 3 से 4 साल का लंबा वक्त लगता है. लेकिन एक बार बागान तैयार हो गया तो यह अगले 40 से 50 साल तक लगातार कमाई देता है. 

ट्रेनिंग लेना जरूरी

इसकी शुरुआत करने के लिए किसानों को केंद्रीय चाय बोर्ड या कृषि विज्ञान केंद्रों से ट्रेनिंग जरूर लेनी चाहिए जिससे पौधों की देखरेख और कटाई का सही तरीका समझ आ सके. इसके अलावा सबसे जरूरी पहलू यह है कि आपके इलाके के आसपास चाय की पत्तियों को प्रोसेस करने वाली यूनिट या कोई मार्केट लिंक होना चाहिए. क्योंकि टूटने के बाद पत्तियां तुरंत प्रोसेसिंग के लिए भेजनी पड़ती हैं.

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