सबसे जरूरी काम है जमीन की खतौनी और खसरा नंबर को अच्छे से चेक करना. राजस्व विभाग के ऑनलाइन पोर्टल पर जाकर देखें कि जमीन किसके नाम दर्ज है. कई बार बेचने वाला खुद को इकलौता मालिक बताता है. जबकि कागजों में उसके भाइयों या रिश्तेदारों के नाम भी चढ़े होते हैं. अगर सभी हिस्सेदारों के दस्तखत नहीं हुए तो बाद में दाखिल-खारिज रुक सकता है.

इसके अलावा जमीन पर पुराना बैंक कर्ज या कोई कानूनी विवाद चल रहा तो यह भी पता करें . कई किसान जमीन पर केसीसी यानी किसान क्रेडिट कार्ड या ट्रैक्टर लोन उठाकर रखते हैं. जमीन पर कोई सरकारी रोक या मॉर्टगेज तो नहीं है. यह पता करने के लिए तहसील जाकर नो-ड्यूज और नॉन-एंकरंबरेंस सर्टिफिकेट जरूर निकलवाएं वरना कर्ज चुकाने की बारी आपकी आ जाएगी.

सिर्फ कागजों के नक्शे पर भरोसा करके सौदा कभी फाइनल न करें. खुद मौके पर जाएं और हल्का लेखपाल या कानूनगो को बुलाकर सरकारी जरीब से जमीन की पैमाइश करवाएं. अक्सर कागजों में रकबा ज्यादा दर्ज होता है. लेकिन हकीकत में उसपर और लोगों का कब्जा भी मिल जाता है. मेड़ कैसी है और चौहद्दी साफ होनी चाहिए जिससे कब्जा लेते वक्त गांव में किसी से लाठी-डंडा न चले.

इसके अलावा उस जमीन का कानूनी स्टेटस और रास्ता. चेक करें कि कहीं वह जमीन ग्राम समाज, तालाब, चारागाह या की तो नहीं है. अगर जमीन एससी/एसटी वर्ग के खातेदार की है. तो डीएम की परमिशन जरूरी होती है. इसके साथ ही मौके पर यह जरूर देखें कि आपके खेत तक ट्रैक्टर या गाड़ी ले जाने का पक्का चकरोड और सरकारी रास्ता मौजूद है भी या नहीं.

इलाके के सरकारी सर्किल रेट का पता लगाएं जिससे स्टांप ड्यूटी में कोई हेरफेर न हो. टोकन मनी से लेकर रजिस्ट्री के दिन तक का सारा लेन-देन सिर्फ बैंक चेक या आरटीजीएस से ही करें. कैश में मोटी रकम देने की गलती बिल्कुल न करें. क्योंकि कल को कोई विवाद हुआ तो बैंक स्टेटमेंट आपके काम आएगा.

रजिस्ट्री डीड तैयार करवाते समय किसी भी जल्दबाजी से बचें और ड्राफ्ट को खुद लाइन-टू-लाइन पढ़ें. विक्रेता का नाम, पिता का नाम, आधार नंबर, खाता संख्या और चौहद्दी की एक-एक स्पेलिंग सही होनी चाहिए. रजिस्ट्री में दो ऐसे स्थानीय और निष्पक्ष गवाह रखें जो मौके पर मौजूद रहें और जरूरत पड़ने पर गवाही दे सकें. गवाहों के परिचय पत्र भी डीड के साथ जरूर अटैच करवाएं.

रजिस्ट्री हो जाना ही सब कुछ नहीं होता इसके तुरंत बाद दाखिल-खारिज यानी म्यूटेशन के लिए अप्लाई करें. जब तक सरकारी रिकॉर्ड और खतौनी से पुराने मालिक का नाम कटकर आपका नाम नहीं चढ़ जाता. तब तक मालिकाना हक अधूरा रहता है. दाखिल-खारिज में देरी होने पर कई बार जालसाज उसी जमीन को किसी तीसरे बंदे को दोबारा बेचकर रफूचक्कर हो जाते हैं जिससे बचकर रहें.

कुल मिलाकर कहें तो खेत का सौदा करते वक्त आंख और कान दोनों खुले रखने पड़ते हैं. दलालों की चिकनी-चुपड़ी बातों में आकर कभी भी शॉर्टकट मत अपनाइए. थोड़ी सी भागदौड़ और 5-10 हजार रुपये की कानूनी जांच आपको भविष्य के बड़े नुकसान से बचा लेगी. इसलिए इन बताई गई बातों का ध्यान जरूर रखें.
Published at : 02 Sep 2026 12:57 PM (IST)






