सोलर लाइट के ऊपर लगा फोटोवोल्टिक (PV) पैनल सूरज की रोशनी को डायरेक्ट करंट (DC) बिजली में बदलता है. इसमें मौजूद सेमीकंडक्टर सेल पर जब रोशनी पड़ती है, तो इलेक्ट्रिक चार्ज की स्पीड से बिजली पैदा होती है, हालांकि बिजली बनने की मात्रा धूप, पैनल के तापमान, उसकी दिशा और उस पर पड़ने वाली छाया पर निर्भर करती है.

पैनल से बनी बिजली सीधे बैटरी में भेजने के बजाय कंट्रोलर के जरिए कंट्रोल की जाती है. यह बैटरी को जरूरत से ज्यादा चार्ज होने से बचाता है और एनर्जी के यूज को मैनेज करता है. कुछ सिस्टम में यही कंट्रोलर लाइट की ब्राइटनेस और जलने का समय भी तय करता है.

दिन में पैदा हुई बिजली रिचार्जेबल बैटरी में स्टोर होती है, जिससे रात में उसका यूज किया जा सके. छोटी गार्डन लाइट्स में बैटरी आमतौर पर डिवाइस के अंदर लगी होती है, जबकि बड़े सोलर सिस्टम में अलग बैटरी लगाई जा सकती है. बैटरी की क्षमता तय करती है कि लाइट कितनी देर तक जल पाएगी.

सोलर लाइट में लगा सेंसर आसपास की रोशनी या पैनल के वोल्टेज में बदलाव के आधार पर दिन और रात का पता लगा सकता है. अंधेरा होने पर कंट्रोलर लाइट चालू कर देता है और सुबह रोशनी बढ़ने पर उसे बंद कर देता है. कुछ सिस्टम में टाइमर या मोशन सेंसर भी यूज होते हैं.

रात में बैटरी से मिलने वाली बिजली LED को जलाती है. LED कम एनर्जी में रोशनी देने के लिए यूज की जाती है, जिससे सीमित बैटरी का यूज लंबे समय तक किया जा सके, हालांकि रोशनी कितनी देर चलेगी, यह बैटरी की चार्जिंग, LED की बिजली खपत और ब्राइटनेस सेटिंग पर निर्भर करता है.

सोलर पैनल बादलों वाले दिन भी उपलब्ध रोशनी से बिजली बना सकता है, लेकिन एनर्जी प्रोडक्शन कम हो सकता है. लगातार कम धूप मिलने पर बैटरी पूरी तरह चार्ज नहीं हो पाती है, जिससे रात में लाइट जल्दी बंद हो सकती है. पैनल पर धूल या छाया पड़ना भी चार्जिंग को प्रभावित करता है.
Published at : 17 Oct 2026 10:22 AM (IST)






