Middle East Tensions: बात खत्म… युद्ध शुरू… अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयान ने एक बार फिर पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है. जिस अमेरिका-ईरान समझौते को मिडिल ईस्ट में तनाव कम करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा था, उसके सिर्फ 22 दिन बाद दोनों देशों के बीच हालात फिर विस्फोटक होते दिखाई दे रहे हैं. ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा कि अब उन्हें ईरान के साथ किसी समझौते पर भरोसा नहीं है. दूसरी तरफ ईरान ने भी स्पष्ट कर दिया कि अगर सम्मानजनक बातचीत नहीं हुई तो वह किसी भी तरह के दबाव के सामने झुकने वाला नहीं है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर 22 दिन पहले हुए समझौते के बाद ऐसा क्या हुआ कि दोनों देश फिर टकराव की राह पर लौट आए.
मिडिल ईस्ट की हवा में एक बार फिर बारूद की गंध महसूस की जा रही है. पिछले कुछ दिनों से शांत दिखाई दे रहे युद्ध क्षेत्र में फिर सैन्य गतिविधियां तेज हो गई हैं. अमेरिकी फाइटर जेट, नौसेना और सैन्य संसाधनों की सक्रियता हॉर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ गई है. इसी बीच दक्षिणी ईरान के बंदर अब्बास, बुशहर, केशम और सिरिक द्वीपों पर अमेरिकी हमलों की खबरों ने पूरे क्षेत्र में तनाव को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया. बंदर अब्बास के शाहिद हक्कानी बंदरगाह पर हमलों के बाद उठता धुआं और आग की लपटें इस बढ़ते टकराव की तस्वीर बन गईं.
पश्चिम एशिया में फिर भड़की चंगारी
ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई का दावा किया. ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) के अनुसार बहरीन और कुवैत में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया. इसके बाद सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा हो गया कि क्या अमेरिका और ईरान के बीच हुआ सीज़फायर अब खत्म हो चुका है और क्या मिडिल ईस्ट एक बार फिर खुले युद्ध की तरफ बढ़ रहा है.
तनाव के इस माहौल के बीच ट्रंप का बयान आग में घी डालने वाला साबित हुआ. नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान उन्होंने कहा कि उनके हिसाब से ईरान के साथ समझौता अब खत्म हो चुका है. ट्रंप ने ईरानी नेतृत्व पर भरोसा न करने का आरोप लगाया और कहा कि बातचीत के दौरान कुछ और कहा जाता है जबकि दुनिया के सामने कुछ और बयान दिए जाते हैं. उनका दावा है कि अमेरिका परमाणु हथियारों के मुद्दे पर स्पष्ट समझौता चाहता था, लेकिन ईरान हर बार अपने रुख से पीछे हट जाता है.
असल में अमेरिका और ईरान के बीच दो बड़े मुद्दों पर गतिरोध बना हुआ है. पहला ईरान का परमाणु कार्यक्रम और दूसरा हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर उसका प्रभाव. ट्रंप लगातार दावा करते रहे हैं कि ईरान परमाणु हथियार नहीं बनाएगा, जबकि तेहरान इस दावे को बार-बार खारिज करता रहा है. इसी तरह हॉर्मुज के रणनीतिक महत्व को लेकर भी दोनों देशों के बीच सहमति नहीं बन सकी. ट्रंप चाहते थे कि बातचीत पूरी तरह अमेरिकी शर्तों पर आगे बढ़े, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इसके बाद उन्होंने आर्थिक और सैन्य दोनों स्तरों पर दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया.
अमेरिका ने ईरान को तेल बेचने की अनुमति देने वाला अस्थायी लाइसेंस भी रद्द कर दिया. इसके साथ ही अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि ईरान ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहे तीन व्यावसायिक जहाजों पर हमला किया, जिन्हें ओमान के रास्ते गुजरना था. अमेरिकी प्रशासन ने इसे समझौते का उल्लंघन माना और जवाबी सैन्य कार्रवाई को इसी का परिणाम बताया.
अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि हालिया अभियान में ईरान के एयर डिफेंस सिस्टम, कमांड एवं कंट्रोल नेटवर्क, तटीय रडार स्टेशनों, एंटी-शिप मिसाइल क्षमताओं और हॉर्मुज के आसपास तैनात IRGC की नौसैनिक क्षमताओं को निशाना बनाया गया. दूसरी तरफ ईरान का कहना है कि अमेरिका समझौते की आड़ में लगातार दबाव बनाने की नीति पर चल रहा है और उसकी संप्रभुता का उल्लंघन कर रहा है.
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने ट्रंप के आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि धमकी, दबाव और धोखाधड़ी अमेरिकी नीति का हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन ईरान अपने अधिकारों से पीछे नहीं हटेगा. वहीं ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने अमेरिका पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाया और कहा कि प्रतिबंध, धमकी और सैन्य कार्रवाई से ईरान को झुकाया नहीं जा सकता.
युद्ध के लिए अमादा यूएस-ईरान
तनाव यहीं नहीं रुका. ईरान ने बहरीन और कुवैत में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने का दावा किया और चेतावनी दी कि यदि क्षेत्रीय देशों ने अमेरिका का साथ दिया तो उनके सैन्य और ऊर्जा ढांचे भी निशाने पर आ सकते हैं. इससे पूरा खाड़ी क्षेत्र एक बार फिर अस्थिरता की चपेट में आता दिखाई दे रहा है.
इसी बीच एक और चर्चा ने जोर पकड़ लिया है. ईरान में सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में उमड़ी भारी भीड़ और दुनिया के कई देशों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी को लेकर भी राजनीतिक विश्लेषण शुरू हो गया है. ईरान का आरोप है कि अमेरिका ने इस दौरान सैन्य कार्रवाई कर अंतरराष्ट्रीय ध्यान अंतिम संस्कार से हटाने की कोशिश की. हालांकि अमेरिका ने इस दावे पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है.
ईरान में खामेनेई की अंतिम यात्रा के दौरान अमेरिका विरोधी नारे गूंजते रहे और बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरे. वहीं ट्रंप ने ईरानी नेतृत्व को “खतरनाक” बताते हुए कहा कि अमेरिका किसी भी चुनौती का जवाब देने के लिए तैयार है. दोनों पक्षों के बयानों से साफ है कि कूटनीतिक दूरी पहले से कहीं ज्यादा बढ़ चुकी है.
इस बढ़ते तनाव का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देने लगा है. कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया और ब्रेंट क्रूड करीब 78 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया. भारतीय शेयर बाजार पर भी इसका असर पड़ा. सेंसेक्स में बड़ी गिरावट दर्ज हुई जबकि निफ्टी भी भारी दबाव में बंद हुआ. निवेशकों की चिंता इस बात को लेकर है कि यदि हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव और बढ़ा तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिसका असर दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ेगा.
कुल मिलाकर 22 दिन पहले जिस समझौते से उम्मीद बंधी थी, वह अब गंभीर संकट में दिखाई दे रहा है. दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है. अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि क्या बातचीत का कोई नया रास्ता निकलेगा या फिर मिडिल ईस्ट एक बार फिर लंबे और खतरनाक संघर्ष की ओर बढ़ जाएगा.
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