भारत में सबसे ज्यादा कहां होती है सोना मसूरी चावल की खेती, इसकी बुवाई कैसे करें किसान? 

भारत में सबसे ज्यादा कहां होती है सोना मसूरी चावल की खेती, इसकी बुवाई कैसे करें किसान? 


Sona Masoori Rice: भारत में चावल सबसे ज्यादा खाए जाने वाली खाद्य फसलों में से एक हैं और देश की बड़ी आबादी का मुख्य भोजन भी माना जाता है. इसी वजह से देश में अलग-अलग किस्म के चावल की खेती की जाती है. इनमें से एक लोकप्रिय किस्म में सोना मसूरी चावल है, जिसकी मांग भारत के साथ-साथ विदेश में भी तेजी से बढ़ रही है. हल्का, टेस्टी और आसानी से पचने वाला यह चावल दक्षिण भारत में सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है.

हाल के वर्षों में इसकी खेती और निर्यात दोनों में भी बढ़ोतरी देखने को मिली है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि भारत में सबसे ज्यादा सोना मसूरी चावल की खेती कहां पर होती है और किसान इसकी बुवाई कैसे करें. 

किन राज्यों में सबसे ज्यादा होती है खेती? 

देश में सोना मसूरी चावल का सबसे बड़ा उत्पादन आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में होता है. कर्नाटक भी इसके प्रमुख उत्पादक राज्यों में शामिल है. इन क्षेत्रों में बारिश, गर्म मौसम और उपजाऊ मिट्टी होने के कारण इसकी खेती बेहतर मानी जाती है. कृषि विशेषज्ञ के अनुसार यह फसल गर्मी और आर्द्र जलवायु में अच्छी पैदावार देती है. 

कब होती है सोना मसूरी चावल की बुवाई? 

सोना मसूरी चावल खरीफ सीजन की फसल मानी जाती है इसकी नर्सरी तैयार करने का काम में जून से शुरू होता है जबकि रोपाई जून जुलाई के दौरान की जाती है फसल के वृद्धि जुलाई से सितंबर के बीच में होती है और कटाई सितंबर से अक्टूबर के दौरान की जाती है दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में सिंचाई की सुविधा होने के कारण रवि सीजन में भी इसकी खेती की जाती है. 

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सोना मसूरी चावल के लिए मिट्टी और मौसम

इस चावल की खेती के लिए गर्म तापमान और भरपूर पानी जरूरी होता है. फसल के लिए 20 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त माना जाता है. इसके अलावा अच्छी जलधारण वाली क्षमता वाली दोमट या चिकनी मिट्टी को बेहतर माना जाता है. खेत में पर्याप्त नमी और सिंचाई व्यवस्था होने पर इसकी पैदावार बढ़ सकती है. 

किसान कैसे करें बुवाई?

सोना मसूरी चावल की खेती पारंपरिक धान की खेती की तरह ही की जाती है. पहले नर्सरी से पौधे तैयार किए जाते हैं और करीब 25 से 30 दिन बाद खेत में रोपाई की जाती है. खेत की अच्छी तरह जुताई कर पानी भरकर कीचड़ तैयार किया जाता है, ताकि पौधों की पकड़ मजबूत रहे. कई किसान अब डायरेक्ट सीडेड राइस या तकनीक का भी इस्तेमाल करने लगे हैं, जिससे पानी और मजदूरी दोनों की बचत होती है.

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