कम पानी में सरसों की खेती: सरसों की फसल को गेहूं के मुकाबले कम पानी की जरूरत होती है. इसलिए जिन किसानों के पास सिंचाई की सीमित सुविधा है, वे सरसों की खेती से अच्छी कमाई की कोशिश कर सकते हैं.

खाद्य तेल की मांग से बढ़ेगी खेती की अहमियत: भारत में हर साल करीब 25 मिलियन टन खाद्य तेल की खपत होती है, जबकि घरेलू उत्पादन लगभग 11 मिलियन टन है. ऐसे में सरसों की खेती बढ़ाकर देश में तेल उत्पादन बढ़ाने में मदद मिल सकती है.

सरसों की कई हाइब्रिड किस्में उपलब्ध: किसान पायनियर की 45S46 और 45S42, श्रीराम की 106, एडवांटा की 414 और क्रिस्टल की 5222 जैसी हाइब्रिड किस्मों पर विचार कर सकते हैं. बीज खरीदने से पहले अपने इलाके के हिसाब से उनकी उपयुक्तता जरूर जांचें.

कम बीज में हो सकती है बुआई: हाइब्रिड सरसों की खेती में बीज की मात्रा अपेक्षाकृत कम लगती है. हालांकि, बीज की सही मात्रा किस्म और बुआई के तरीके के अनुसार तय करनी चाहिए.

बिरसा भाभा-1 भी है विकल्प: हाइब्रिड किस्मों के अलावा किसान बिरसा भाभा-1 की खेती भी कर सकते हैं. यह करीब 115 से 120 दिनों में तैयार होती है और इसकी पैदावार लगभग 15 से 16 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बताई जाती है.

सही समय और देखभाल से बढ़ेगी पैदावार: सरसों की बुआई के लिए अक्टूबर का समय आमतौर पर अनुकूल माना जाता है. सही दूरी पर बुआई, संतुलित खाद, खेत में पर्याप्त नमी और जरूरत के अनुसार सिंचाई से अच्छी पैदावार पाने में मदद मिल सकती है.
Published at : 13 Oct 2026 06:01 PM (IST)
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