वाटर एप्पल मुख्य रूप से थाईलैंड और बांग्लादेश जैसे गर्म देशों का फल है. यह दिखने में नाशपाती जैसा और रंग में बिल्कुल सेब की तरह लाल, हरा या सफेद होता है. गर्मियों में इसमें 93% तक पानी होता है. जो सेहत के लिए वरदान है. यही वजह है कि मार्केट में इसकी डिमांड बहुत ज्यादा है.

पहले माना जाता था कि यह फल सिर्फ साउथ इंडिया या विदेशों में ही हो सकता है. लेकिन अब यह साबित हो चुका है कि हमारे यहां की गर्म जलवायु में भी इसे आसानी से उगाया जा सकता है. यहां की मिट्टी और गर्मियों का तापमान इस विदेशी फल के पौधों के लिए पूरी तरह से अनुकूल साबित हो रहे हैं.

वाटर एप्पल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पूरी तरह से एक लो-मेंटेनेंस फसल है. इसकी बागवानी शुरू करने में बस एक बार ही बड़ा खर्च करना पड़ता. इसके बाद इसमें न तो बहुत ज्यादा पानी की जरूरत होती है और न ही महंगे रासायनिक खादों और कीटनाशकों का कोई बड़ा झंझट रहता है.

इसके पौधे लगाने के महज एक साल के अंदर ही इसमें फल आने शुरू हो जाते हैं. शुरुआत में थोड़ा कम उत्पादन मिलता है. लेकिन दो से ढाई साल का पौधा होने पर यह फुल मैच्योर हो जाता है. तब एक अकेले पेड़ से आसानी से 50 किलो से लेकर एक क्विंटल तक फल मिल जाता है.

मई और जून के कड़कड़ाती गर्मी वाले महीनों में जब यह फल पककर तैयार होता है. तो मार्केट में इसकी कीमत आसमान छूती है. थोक बाजार में यह फल आराम से 150 से 300 रुपये प्रति किलो तक बिक जाता है. बड़े शहरों के मॉल्स और फ्रूट मार्केट्स में तो इसके और भी ज्यादा दाम मिलते हैं.

अगर एक एकड़ में हाई-डेंसिटी फार्मिंग के तहत इसके पौधे लगाए जाएं. तो साल भर में आराम से लाखों का नेट प्रॉफिट निकाला जा सकता है. कम लागत, कम पानी और छप्परफाड़ मुनाफे के चलते वाटर एप्पल की बागवानी आज के समय में अच्छा मुनाफा दे रही है.
Published at : 12 Jul 2026 01:16 PM (IST)






