हिमालय में मिला दुर्लभ पौधा, भारत में पहली बार हुआ रिकॉर्ड

हिमालय में मिला दुर्लभ पौधा, भारत में पहली बार हुआ रिकॉर्ड


पूर्वी हिमालय के घने जंगलों में वैज्ञानिकों को एक ऐसा पौधा मिला है, जो भारत में पहले कभी दर्ज नहीं किया गया था. यह खोज अरुणाचल प्रदेश के वेस्ट कामेंग जिले में हुई है, जहां शोधकर्ताओं ने ओफियोपोगोन जैपोनिकस नाम की एक घास जैसी जड़ी-बूटी को खोज निकाला है. इस पौधे का इस्तेमाल पूर्वी एशिया में सदियों से पारंपरिक चिकित्सा में होता आया है, लेकिन भारत की धरती पर इसका मिलना वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है.

कहां और कैसे हुई यह खोज?

यह खोज वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया WII और पश्चिम बंगाल की उलुबेरिया बॉटैनिकल इंस्टीट्यूट हर्बेरियम के शोधकर्ताओं ने मिलकर की है. मई 2025 में एक फ्लोरिस्टिक सर्वे के दौरान यह पौधा नम और छायादार जंगल की जमीन पर, समुद्र तल से करीब 2,185 मीटर की ऊंचाई पर मिला. यह पौधा वेस्ट कामेंग जिले में शेरगांव और ग्युतो मठ के बीच सड़क किनारे उगी वनस्पति के बीच पाया गया. इस खोज की अगुवाई डॉ. अयान कुमार नस्कर ने की, और इससे जुड़े शोध निष्कर्ष स्प्रिंगर नेचर के एक जर्नल में प्रकाशित हुए हैं.

पौधे की पहचान और खासियत

ओफियोपोगोन जैपोनिकस को आम बोलचाल में ड्वार्फ लिलीटर्फ या मोंडो ग्रास के नाम से जाना जाता है. यह एक सदाबहार बारहमासी पौधा है, जो घने गुच्छों में उगता है. इसकी पत्तियां घास जैसी, पतली और लंबी होती हैं. इसमें हल्के सफेद से लेकर हल्के बैंगनी रंग के छोटे-छोटे फूल आते हैं, और बाद में इस पर नीले रंग के बेरी जैसे फल लगते हैं, जो इसे बाकी घासों से अलग बनाते हैं.

दुनिया में कहां-कहां मिलता है यह पौधा?

यह पौधा मूल रूप से पूर्वी एशिया का है और चीन, जापान, कोरिया व नेपाल जैसे देशों में आमतौर पर पाया जाता है. यह समुद्र तल से 200 से 2,800 मीटर तक की ऊंचाई पर उग सकता है. इसकी जड़ों में गांठनुमा कंद बनते हैं, जिन्हें चीनी भाषा में माइदोंग कहा जाता है. यह जड़ें चीन की परंपरागत चिकित्सा पद्धति में लंबे समय से इस्तेमाल होती आई हैं.

भारत में पहले से दर्ज प्रजातियां

इस खोज से पहले भारत में ओफियोपोगोन प्रजाति की सिर्फ सात किस्में ही आधिकारिक तौर पर दर्ज थीं, जिनमें ओ. क्लार्की, ओ. ड्रैकेनोइड्स और ओ. इंटरमीडियस जैसी प्रजातियां शामिल हैं. ओफियोपोगोन जिनस असल में एस्पैरेगेसी परिवार का हिस्सा है, और दुनियाभर में इसकी करीब 85 प्रजातियां पाई जाती हैं। नई खोजी गई प्रजाति अब भारत की वनस्पति सूची में आठवें नंबर पर जुड़ गई है.

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इतिहास से जुड़ा एक दिलचस्प सुराग

दिलचस्प बात यह है कि इस पौधे का एक ऐतिहासिक जिक्र पहले भी मिलता है. उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र से आर. ब्लिंकवर्थ नाम के व्यक्ति द्वारा जुटाए गए एक पुराने संग्रह का हवाला द वालिच कैटलॉग में मिलता है. लेकिन उस समय इस प्रजाति को वैज्ञानिक तौर पर वर्गीकृत करके भारत की आधिकारिक वानस्पतिक सूची में शामिल नहीं किया गया था.

आगे किन चुनौतियों का सामना करना होगा?

शोधकर्ताओं ने बताया है कि यह पौधा सड़क किनारे की जगह पर पाया गया है, इसलिए सड़क निर्माण और भूस्खलन जैसी गतिविधियों से इसे स्थानीय स्तर पर खतरा हो सकता है. इसी वजह से टीम ने अरुणाचल प्रदेश में इस प्रजाति की और गहराई से फील्ड स्टडी और लंबे समय तक निगरानी करने की सिफारिश की है. साथ ही उन्होंने पूर्वोत्तर भारत के अन्य हिस्सों में भी व्यवस्थित वानस्पतिक सर्वेक्षण की जरूरत बताई है, ताकि इस तरह की अनदेखी रह गई और भी प्रजातियों की पहचान की जा सके.

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