45 Minute Class Rule: आमतौर पर स्कूलों में क्लास शुरू होते ही बच्चों का पहला सवाल यही होता है कि पीरियड कब खत्म होगा. कभी 45 मिनट का पीरियड पलक झपकते गुजर जाता है, तो कभी वहीं समय काफी लंबा लगने लगता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ज्यादातर स्कूलों में एक पीरियड 40 से 45 मिनट का ही क्यों होता है. आखिर 60 मिनट के घंटे को तोड़कर 45 मिनट की क्लास का नियम कब बना और उसके पीछे क्या वजह थी. चलिए तो आज हम आपको बताते हैं कि स्कूलों में एक पीरियड 40 से 45 मिनट ही क्यों होता है और यह कैसे और कब तय हुआ था.
पहले 60 मिनट तक चलती थी एक क्लास
19वीं और 20वीं सदी की शुरुआत तक स्कूलों में एक पीरियड आमतौर पर 60 मिनट का होता था. उस दौर में पढ़ाई सिर्फ सुबह ही नहीं, बल्कि दोपहर बाद भी होती थी. बच्चों को बीच में लगभग तीन घंटे का ब्रेक मिलता था, जिसमें वह घर जाकर खाना खाते थे और फिर दोबारा स्कूल लौटते थे. हालांकि दोपहर की कक्षाएं छात्रों और शिक्षकों दोनों को पसंद नहीं थी. माना जाता था कि खाना खाने के बाद बच्चों की एकाग्रता कम हो जाती है और गर्मी में पढ़ाई करना भी मुश्किल हो जाता था. इस वजह से एजुकेशन एक्सपर्ट्स ने बच्चों की मानसिक थकान और सीखने की क्षमता पर अध्ययन शुरू किया.
वैज्ञानिकों की रिसर्च के बाद आया बदलाव
20वीं सदी की शुरुआत में मनोवैज्ञानिक और एजुकेशन एक्सपर्ट्स ने कई प्रयोग किए. इन रिचर्स में पाया गया कि लगातार 60 मिनट तक पढ़ाई करना बच्चों के लिए थकावट भरा हो सकता है, इससे सीखने की क्षमता प्रभावित होती है. वहीं एक्सपर्ट्स ने सुझाव दिया था कि बच्चों के लिए 30 मिनट और बड़ों छात्रों के लिए 45 से 50 की कक्षाएं प्रभावी होंगी. उनका मानना था कि कम समय की क्लास में ज्यादा अच्छे से ध्यान केंद्रित कर सकते हैं और पढ़ाई का असर बेहतर होता है.
1911 में पहली बार लागू हुआ 45 मिनट का नियम
22 अगस्त 1911 को तत्कालीन प्रशिया के संस्कृति मंत्री ऑगस्ट वॉन ट्रॉट जू सोल्ज ने आदेश जारी किया कि हायर एजुकेशनल इंस्टीट्यूट में एक पीरियड की अवधि 45 मिनट होगी. यह फैसला उस समय एजुकेशन एक्सपर्ट्स की सिफारिश के आधार पर लिया गया था. 45 मिनट के पीरियड लागू होने के बाद साप्ताहिक पढ़ाई का पूरा शेड्यूल सिर्फ सुबह के समय में समेटा जा सका. इससे दोपहर की कक्षाएं में खत्म कर दी गई और छात्रों को दोपहर बाद का समय मिलने लगा. हालांकि इस बदलाव का सभी ने स्वागत नहीं किया. कई शिक्षकों को मानना था कि 45 मिनट का समय पढ़ाई के लिए पर्याप्त नहीं है, उनका कहना था कि इतने कम समय में किसी विषय को विस्तार से समझाना मुश्किल हो जाएगा और पढ़ाई सिर्फ जल्दी-जल्दी पढ़ाई खत्म करने तक सीमित रह जाएगी. कुछ शिक्षकों ने यह भी कहा कि छोटे पीरियड के कारण पढ़ाई में जल्दबाजी बढ़ेगी और छात्रों की सोचने की क्षमता प्रभावित होगी.
धीरे-धीरे पूरी दुनिया में लोकप्रिय हुआ मॉडल
विरोध के बावजूद 45 मिनट वाला मॉडल सफल साबित हुआ और धीरे-धीरे जर्मनी के दूसरे हिस्सों में भी लागू होने लगा. बाद में कई देशों ने इस व्यवस्था को अपनाया. आज भी जर्मनी, इंग्लैंड, ब्रिटेन और पोलैंड जैसे देशों में 45 मिनट के आसपास की कक्षाएं नॉर्मल है. हालांकि कुछ देशों में 50 मिनट या 60 मिनट के पीरियड चलते हैं. वहीं पिछले कुछ समय में कई स्कूलों में 60 और 90 मिनट के लंबे पीरियड वाले मॉडल पर भी प्रयोग शुरू किए गए, ताकि छात्रों को किसी सब्जेक्ट को समझने के लिए ज्यादा समय मिल सके.
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