Navgrah Surya Dev Katha 1: एक समय स्वर्गलोक के सत्ता सिंहासन पर आसीन इन्द्रदेव ने सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु से अनुरोध किया कि आप लोग क्रमशः अपने मुख से अपना-अपना शुभ, अशुभ, आकृति-प्रकृति, व्यक्तित्व, प्रभाव, शक्ति, पराक्रम और गरिमा का वर्णन करें. तब नव ग्रहों में सबसे पहले सूर्य ने अपने गुणों का गुणगान करते हुए कहा-
सर्वप्रथम सूर्यदेव ने कहा-
हे राजन! मैं पृथ्वी से तेरह लाख गुना बड़ा हूं. मेरा रंग पीलेपन लिए हुए लाल है. मैं सौरमंडल का स्वामी हूं. प्रत्येक जड़-चेतन प्राणियों की आत्मा मैं ही हूं. मेरे प्रकाश से ही सब प्रकाशित होते हैं. मैं अंधकार और अज्ञान का शत्रु हूं. मेरे द्वारा ही धातुओं और रत्नों में रंग एवं चमक आती है. सभी ग्रह-नक्षत्र मेरी ही आकर्षण शक्ति से अपनी-अपनी कक्षा में स्थित और गतिमान हैं. समस्त इंद्रधनुषी रंगों का स्रोत मैं ही हूं. मेरी असंख्य किरणें समस्त लोकों को आलोकित करती हैं, इसलिए मैं सहस्रांशु कहलाता हूं.
यह सातों रंग ही मेरे सात घोड़े हैं, जो मेरे प्रखर एवं दिव्य रथ को खींचते हैं. मैं समस्त ग्रहों का राजा हूं. चंद्रमा मेरा मंत्री है. शनि मेरा पुत्र है. बृहस्पति और मंगल मेरे अभिन्न मित्र हैं. मैं क्षत्रिय वर्ण हूं और अग्नि तत्व प्रधान हूं.
मैं ही पृथ्वी पर जल की वर्षा करके जीव-जंतुओं और वनस्पतियों को अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित एवं फलित करता हूं. मानव के हृदय, आंखों और स्नायु आदि पर मेरा ही प्रभाव रहता है. मेरा शुभ प्रभाव होने पर साधारण व्यक्ति भी राजा, मंत्री या राष्ट्राध्यक्ष बन जाता है. शारीरिक, मानसिक रोग, दुःख, उदासीनता, अपमान, मंदाग्नि, उदर की क्षीणता और रोगों का आगमन मेरे प्रतिकूल प्रभाव के कारण ही होता है.
जो मेरे दिन यानी रविवार को व्रत रखते हैं, नमक नहीं खाते, उन्हें मैं रोगमुक्त रखता हूं। जो लोग उपरोक्त वस्तुएं न खाते और न छूते हुए मेरे दिन व्रत-उपवास रखते हैं तथा उगते समय मेरे स्वरूप को अर्घ्य देकर विधिवत पूजन करते हैं, उन पर मैं प्रसन्न होकर उन्हें धन-धान्य से परिपूर्ण करके जीवन में सफलता देता हूं.
मैं परम प्रतापी और समस्त जगत की आत्मा हूं, अतः ब्रह्मस्वरूप हूं. मेरे दिन यानी रविवार को जन्म लेने वाला व्यक्ति तेजस्वी, चतुर, स्वाभिमानी और दानी होता है. उदार प्रकृति वाला ऐसा व्यक्ति कुलभूषण होता है. उसे 21वें तथा 22वें वर्ष में मेरी कृपा प्राप्त होती है. मैं प्रसन्न रहूं तो उसका भाग्योदय करा देता हूं. यदि रुष्ट रहूं तो इन्हीं वर्षों में कष्ट देता हूं. ऐसे व्यक्ति की उम्र 60 वर्ष से अधिक नहीं होती, यदि अनुकूल हूं तो 99 वर्ष तक का जीवन देता हूं.
मेरे रविवार के दिन संगीत, शिक्षा-दीक्षा, औषधि सेवन करना, पशुपालन करना, नौकरी का प्रारंभ करना, हवन-यज्ञ करना तथा मंत्र-उपदेश को ग्रहण करना शुभ होता है. मैं अन्न-शस्य खरीदने-बेचने, सीखने और वाद-विवाद में सफलता दिलाता हूं. मेरे वार में पुष्य नक्षत्र हो तो महायोग बनता है. इस रवि-पुष्य योग में की गई हर साधना शीघ्र सिद्धिदायक होती है. साधक, तांत्रिक और ज्योतिषी रवि-पुष्य की शुभ घड़ियों में अपना तांत्रिक प्रयोग या साधना करने को उत्सुक रहते हैं.
मेरे दिन गाय का घी खाना बल, वीर्य एवं स्वास्थ्यवर्धक है, किंतु गुड़, तेल और शहद खाना हानिकारक है. मेरे उदय-अस्त से पृथ्वी के हर चराचर प्रभावित होते हैं तथा उदय पर जागते और क्रियाशील होते हैं. अस्त होने पर क्रियाहीन होकर सोते हैं, यदि नहीं सोते तो पाचन तंत्र बिगड़ जाता है.
पृथ्वी के जिस भाग पर मेरी किरणें नहीं पड़तीं, वह भाग भूतों, प्रेतों, राक्षसों और निशाचरों का डेरा बन जाता है. चोर-चांडालों का भय मेरे प्रकाश के बिना प्राणियों को सताता रहता है. जन्मकुंडली में 3, 6, 10, 11वें स्थान पर मैं शुभ प्रभाव देता हूं. मेरी स्वराशि सिंह, उच्च राशि मेष तथा नीच राशि तुला है.
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