राम मंदिर के चढ़ावे में चोरी के मामले में अयोध्या के वकीलों ने बड़ा फैसला लिया है. अयोध्या बार एसोसिएशन की बैठक में तय किया गया कि राम मंदिर चढ़ावा मामले में जिन 8 लोगों पर आरोप लगे हैं, उनका केस कोई भी वकील नहीं लड़ेगा. एसोसिएशन ने इस मुद्दे को गंभीर बताते हुए कहा कि यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से भी जुड़ा हुआ है. चेतावनी दी गई कि अगर कोई वकील इन 8 आरोपियों की पैरवी करता है तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी और 5 लाख का जुर्माना ठोका जाएगा. इस मुद्दे पर विश्व हिंदू परिषद (VHP) के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने की प्रतिक्रिया आई है.
आलोक कुमार ने अयोध्या बार एसोसिएशन के फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है. उन्होंने एक्स पर पोस्ट कर कहा, ‘राम जन्मभूमि मंदिर चढ़ावा मामले के आरोपियों का केस न लड़ने का फैसला संविधान और वकीलों की पेशेवर नैतिकता, दोनों के खिलाफ है.’ उनका कहना है कि किसी भी आरोपी को अदालत में अपना पक्ष रखने और कानूनी सहायता पाने का अधिकार है. आलोक कुमार ने सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के 2011 के एक महत्वपूर्ण फैसले का हवाला दिया. यह मामला ए.एस. मोहम्मद रफी केस से जुड़ा था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि बार एसोसिएशन किसी भी आरोपी का बचाव करने से वकीलों को नहीं रोक सकती. कोर्ट ने माना था कि ऐसे प्रस्ताव पूरी तरह गैर-कानूनी हैं और कानून के शासन के खिलाफ हैं.
AYODHYA BAR RESOLUTION VIOLATES CONSTITUTIONAL PRINCIPLES AND PROFESSIONAL ETHICS
o We have seen some reports that the Ayodhya Bar Association has passed a resolution that no Advocate shall appear for the persons accused in the theft of chadava money of Ram Janmbhumi Temple.
o…— Alok Kumar Sr. Advocate (@AlokKumarLIVE) June 30, 2026
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आलोक कुमार ने आर्टिकल 21 का दिया हवाला
आलोक कुमार ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा था कि हर व्यक्ति, चाहे उस पर कितना भी गंभीर आरोप क्यों न हो, उसे निष्पक्ष सुनवाई और कानूनी बचाव का अधिकार है. हर गिरफ्तार व्यक्ति को अपनी पसंद के वकील से सलाह लेने और बचाव करवाने का अधिकार दिया गया है. उन्होंने यह भी कहा कि बार काउंसिल के नियमों के अनुसार भी वकील बिना उचित कारण किसी केस को लेने से इनकार नहीं कर सकता, अगर क्लाइंट फीस देने को तैयार है और वकील उपलब्ध है. ऐसे में किसी बार एसोसिएशन का सामूहिक रूप से यह तय करना कि कोई सदस्य किसी विशेष आरोपी का केस नहीं लड़ेगा, पेशेवर आचरण के नियमों के खिलाफ है.
आरोपियों से कोई सहानुभूति नहीं: आलोक कुमार
आलोक कुमार ने साफ किया कि राम जन्मभूमि मंदिर चढ़ावा मामले के आरोपियों के प्रति उनकी कोई सहानुभूति नहीं है. उन्होंने कहा कि मामले की जांच तेजी से पूरी होनी चाहिए. फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई होनी चाहिए और अगर आरोप साबित होते हैं तो दोषियों को जल्द सजा मिलनी चाहिए, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि गंभीर आरोप होने के बावजूद किसी आरोपी के संवैधानिक अधिकार नहीं छीने जा सकते. उन्होंने उम्मीद जताई कि अयोध्या बार एसोसिएशन अपने फैसले पर दोबारा विचार करेगा. उनका कहना है कि कानून का शासन तभी मजबूत रहेगा जब हर व्यक्ति को निष्पक्ष न्याय और कानूनी प्रतिनिधित्व का अधिकार मिले.
केस न लड़ने को लेकर सुप्रीम कोर्ट क्या कहता है?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारत में बार एसोसिएशन के ऐसे सभी प्रस्ताव अमान्य हैं और अगर सही सोच वाले वकील चाहते हैं कि इस देश में लोकतंत्र और कानून का राज बना रहे तो उन्हें ऐसे प्रस्तावों को नजरअंदाज करना चाहिए और उनका विरोध करना चाहिए. एक वकील का कर्तव्य है कि वह चाहे जो भी नतीजा हो, बचाव करें और जो वकील ऐसा करने से मना करता है तो वह गीता के संदेश का पालन नहीं कर रहा है.
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस कोर्ट की रजिस्ट्री इस फैसले/आदेश की कॉपी भारत के सभी हाई कोर्ट बार एसोसिएशन और स्टेट बार काउंसिल को भेजेगी. हाई कोर्ट बार एसोसिएशन से अनुरोध है कि वे अपने राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के सभी डिस्ट्रिक्ट कोर्ट बार एसोसिएशन को यह फैसला/आदेश भेजें. आलोक कुमार ने उम्मीद जताई कि अयोध्या बार एसोसिएशन अपने फैसले पर दोबारा विचार करेगा. उनका कहना है कि देश में कानून का राज और लोकतंत्र तभी मजबूत रहेगा, जब हर व्यक्ति को निष्पक्ष न्याय और कानूनी मदद का अधिकार मिलेगा.
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