इस मौसम में बछड़ों को सबसे बड़ा खतरा निमोनिया और डायरिया जैसी घातक बीमारियों से होता है. बरसात की ठंडी हवाएं और गीला फर्श बछड़ों के फेफड़ों पर सीधा असर डालते हैं. इसके अलावा गंदगी की वजह से पेट का इन्फेक्शन बहुत आम हो जाता है जिससे उनकी जान पर बन आती है.

बचाव का सबसे पहला और आसान तरीका यह है कि बछड़ों के रहने की जगह को हमेशा सूखा और साफ रखें. उनके बाड़े में पानी का जमाव बिल्कुल नहीं होना चाहिए और फर्श पर सूखी घास या चूने का छिड़काव करना चाहिए. सूखा माहौल बैक्टीरिया को बढ़ने से रोकता है और बछड़े इन्फेक्शन से बचे रहते हैं.

बरसात के दिनों में बछड़ों को सीधे ठंडी हवा के झोंकों और बौछारों से बचाना बेहद जरूरी है. रात के समय उनके बाड़े को तिरपाल या टाट के बोरों से ढक दें ताकि अंदर का तापमान मेंटेन रहे. बछड़ों के शरीर को गर्माहट मिलने से उन्हें निमोनिया जैसी सांस की बीमारियों का खतरा नहीं रहता.

खान-पान के मामले में इस मौसम में सबसे ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत होती है. बछड़ों को हमेशा साफ, ताजा और गुनगुना पानी ही पीने को दें, क्योंकि गंदा पानी पेट की बीमारियों की सबसे बड़ी जड़ है. साथ ही, उनके खाने के बर्तनों को रोज अच्छी तरह सैनिटाइज करना बिल्कुल न भूलें.

नवजात बछड़ों को बीमारियों से बचाने के लिए उनके जन्म के तुरंत बाद मां का पहला गाढ़ा दूध यानी खींच जरूर पिलाएं. यह दूध बछड़ों के अंदर एक नेचुरल ढाल की तरह काम करता है और उनकी इम्यूनिटी को इतना मजबूत कर देता है कि मानसून के बैक्टीरिया उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाते.

आखिरी और सबसे जरूरी बात यह है कि बछड़ों का वैक्सीनेशन और डीवॉर्मिंग यानी पेट के कीड़े मारने की दवा का शेड्यूल समय पर पूरा करें. अगर कोई बछड़ा सुस्त दिखे, दूध पीना छोड़ दे या उसे दस्त हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें. शुरुआती स्टेज में सही इलाज मिलने से वे जल्दी फिट हो जाते हैं.
Published at : 04 Jul 2026 01:28 PM (IST)






