- बारिश में बेल फसलों को सड़न से बचाएगी मचान विधि.
- खेत में पानी न रुके इस बात का करें इतंजाम.
- कीट, रोगों से बचाव को नीम तेल इस्तेमाल करें.
मानसून की बारिश जहां एक तरफ सूखते खेतों में जान फूंक देती है. वहीं दूसरी तरफ सब्जी उगाने वाले किसानों के लिए यह सीजन बहुत मुश्किलों भरा होता है खासकर लौकी, खीरा, तोरई और करेले जैसी बेल वाली फसलों के लिए लगातार होने वाली बारिश भारी परेशानी का सबब बन जाती है. जमीन पर फैली बेलों के नीचे जब पानी जमा होता है. तो फंगस, सड़न और कीड़े पूरी फसल को देखते ही देखते बर्बाद कर देते हैं.
कई बार तो किसानों की पूरी मेहनत और लागत पर एक झटके में पानी फिर जाता है. लेकिन अगर आप पुरानी पुराने तरीकों को छोड़कर थोड़ी सी मॉडर्न तकनीक का सहारा लेते हैं तो भारी बारिश के बीच भी आपकी एक भी बेल खराब नहीं होगी. कृषि वैज्ञानिकों के बताए गए इन तरीकों को अपनाकर आप न सिर्फ अपनी फसल को सुरक्षित रख सकते हैं. बल्कि इस सीजन इन फसलों से अच्छा मुनाफा भी कमा सकते हैं. जान लीजिए क्या हैं यह तरीके.
मचान और ट्रेलिस सिस्टम अपनाएं
बरसात के दिनों में बेल वाली सब्जियों को सबसे बड़ा खतरा जमीन में मौजूद जरूरत से ज्यादा नमी और कीचड़ से होता है. जब लौकी या खीरे की बेलें गीली मिट्टी पर सीधे लेटती हैं. तो उनके फूल और फल गलने लगते हैं. इससे बचने का सबसे बढ़िया तरीका है मचान और ट्रेलिस सिस्टम. बांस, लोहे के पतले खंभों और नायलॉन की मजबूत जाली के सहारे बेलों को जमीन से 5-6 फीट ऊपर चढ़ा दीजिए.
हवा में लटकने की वजह से पौधों को भरपूर धूप और ताजी हवा मिलती है. जिससे फंगल इन्फेक्शन का खतरा 90% तक घट जाता है. इसके अलावा फलों का सीधा संपर्क मिट्टी और पानी से नहीं होता. जिससे उनका शेप एकदम सीधा, चमकदार और साफ-सुथरा रहता है. ऐसे फ्रेश और बेदाग फल जब आप मंडी लेकर पहुंचेंगे तो व्यापारियों से आपको आम दिनों के मुकाबले कहीं ज्यादा भाव मिलेंगे.
ध्यान रहे खेत में पानी न रुके
बारिश के मौसम में सब्जियों की खेती की सबसे पहली शर्त है बढ़िया ड्रेनेज सिस्टम. खेत में अगर 24 से 48 घंटे भी पानी रुका रह गया. तो जड़ों का दम घुटने लगेगा और पौधे पीले पड़कर सूख जाएंगे. इसलिए हमेशा फ्लैट जमीन के बजाय ऊंची मेड़ों पर ही बुवाई करें. दो क्यारियों के बीच गहरी और साफ नालियां बनाएं जिससे तेज बारिश का सारा एक्स्ट्रा पानी बिना रुके सीधे खेत से बाहर निकल जाए.
इसके साथ ही मेड़ों पर प्लास्टिक मल्चिंग शीट बिछाना भी बहुत ही फायदेमंद साबित होता है. मल्चिंग शीट बारिश की सीधी मार से मिट्टी को कटने से बचाती है, अनचाहे खरपतवार को उगने नहीं देती और जड़ों के पास केवल जरूरत भर की नमी ही मेंटेन रखती है. इससे पौधों की जड़ें एकदम हेल्दी रहती हैं और पौधे तूफानी बारिश में भी तेजी से ग्रोथ करते हैं.

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नीम का तेल आएगा काम
मानसून के उमस भरे मौसम में पाउडरी मिल्ड्यू, डाउनी मिल्ड्यू और फल मक्खी जैसे खतरनाक कीड़े बेलों पर तेजी से हमला बोलते हैं. इनसे बचने के लिए बीमारी आने का इंतजार न करें बल्कि पहले से ही प्रिवेंटिव केयर शुरू कर दें. हर 10 से 12 दिन में नीम का तेल का हल्का छिड़काव जरूर करें. जो पूरी तरह से ऑर्गेनिक और सेफ ढाल की तरह काम करता है.
पोषण का रखें इंतजाम
बारिश के दिनों में यूरिया जैसी नाइट्रोजन वाली खादों का ज्यादा इस्तेमाल बिल्कुल न करें क्योंकि इससे पौधे बहुत ज्यादा नाजुक हो जाते हैं और कीड़ों का अटैक बढ़ जाता है. इसके बजाय पोटाश, फास्फोरस और माइक्रो-न्यूट्रिएंट्स का संतुलित स्प्रे दें. जो तनों को मजबूती देते हैं और नए फूलों को झड़ने से रोकते हैं. अगर किसी पत्ते या फल पर सड़न दिखे. तो उसे तुरंत काटकर दूर फेंक दें ताकि बीमारी बाकी पौधों में न फैले.
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