आज से करीब 16 साल पहले ट्यूनीशिया के एक फल बेचने वाले ने खुद को आग लगा ली थी. इस चिंगारी ने पूरे मिडिल ईस्ट और नॉर्थ अफ्रीका को जला दिया. तानाशाह एक-एक करके गिरते चले गए और दुनिया ने इसे कहा- ‘अरब स्प्रिंग’. 2024 में बांग्लादेश में भी कुछ ऐसा ही हुआ. छात्र सड़कों पर उतरे, शेख हसीना की 15 साल की सत्ता खत्म हुई और देश ने नया रास्ता पकड़ा. लेकिन क्या इस तूफान ने सब उजाड़ कर बसा दिया या हालत और बदतर कर दिए…
2026 में हम अरब स्प्रिंग की बात कर रहे हैं, क्योंकि 15 अक्टूबर 2026 को सैम पित्रोदा ने भारत के युवा आंदोलन की तुलना सीधे अरब स्प्रिंग से कर दी…
सबसे पहले जानिए अरब स्प्रिंग था क्या?
अरब स्प्रिंग 2010-2011 के दौरान मिडिल ईस्ट और नॉर्थ अफ्रीका में शुरू हुआ जन आंदोलन था. इसकी शुरुआत ट्यूनीशिया से हुई थी, जब बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार और तानाशाही शासन से त्रस्त लोगों ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन शुरू किया.
सबसे पहले 17 दिसंबर 2010 को मोहम्मद बूअजीजी नाम के फल बेचने वाले ने मिडिल ट्यूनीशिया के सिदी बूजिद शहर में खुद को आग लगा ली. वो स्थानीय पुलिस की धमकी और भ्रष्टाचार से तंग आ चुका था. एक आम आदमी की ये चिंगारी पूरे इलाके में आग बन गई.
देखते ही देखते ये आंदोलन मिस्र, लीबिया, सीरिया, यमन, बहरीन और अन्य देशों तक फैल गया. इन आंदोलनों का मकसद लोकतांत्रिक सुधार, अभिव्यक्ति की आजादी, सामाजिक न्याय और तानाशाही शासन का अंत था.
अरब स्प्रिंग में मिडिल ईस्ट और नॉर्थ अफ्रीका में सरकारें गिरना शुरू हो गईं…
- ट्यूनीशिया: राष्ट्रपति जिने अल-आबिदीन बेन अली को इस्तीफा देना पड़ा. 1987 से चली आ रही उनकी सत्ता खत्म हुई.
- मिस्र: काहिरा के तहरीर स्क्वायर में 10 लाख से ज्यादा लोगों ने कब्जा जमा लिया. 30 साल से सत्ता में बैठे होस्नी मुबारक को 11 फरवरी 2011 को पद छोड़ना पड़ा.
- लीबिया: मुअम्मर गद्दाफी की सत्ता का अंत हुआ.
- यमन: अली अब्दुल्ला सालेह को सत्ता छोड़नी पड़ी.
- सीरिया: बशर अल-असद के खिलाफ विद्रोह शुरू हुआ, जो 13 साल चला.

सबसे बड़ा नुकसान क्या हुआ?
अरब स्प्रिंग के बाद जो खाली जगह बनी, उसमें सलाफी और जिहादी मिलिशिया मजबूत हो गए. 2014 में IS ने यजीदियों के खिलाफ नरसंहार किया, जिसमें 5,000 से ज्यादा लोग मारे गए और लगभग 7,000 लोगों को अगवा किया गया.
नौजवानों का हाल तो आज भी बुरा है. ट्यूनीशिया में युवा बेरोजगारी दर 37% है. मिस्र में दो-तिहाई बेरोजगार 15 से 29 साल के युवा हैं. यानी अरब स्प्रिंग ने तानाशाह तो गिराए, लेकिन उनकी जगह जो आया, वो भी लोकतंत्र नहीं था. कहीं सेना, कहीं इस्लामिक कट्टरपंथी और कहीं गृहयुद्ध.
अब बांग्लादेश की कहानी क्या कहती है?
बांग्लादेश में जून 2024 में एक छात्र आंदोलन शुरू हुआ, जो सरकारी नौकरियों में आरक्षण प्रणाली के खिलाफ था. इसमें 56% नौकरियां अलग-अलग श्रेणियों के लिए आरक्षित थीं.
- 5 जून 2024: बांग्लादेश की हाईकोर्ट डिवीजन ने 2018 की आरक्षण अधिसूचना को अमान्य करार दिया. छात्र सड़कों पर उतर आए.
- 1 जुलाई 2024: 24 दिन के ब्रेक के बाद छात्रों ने फिर प्रदर्शन शुरू किया, नई कार्यकारी अधिसूचना की मांग की. 4 जुलाई की डेडलाइन दी.
- 16 जुलाई 2024: हिंसा भड़की. रंगपुर में बेगम रोकिया विश्वविद्यालय के छात्र अबू सईद को गोली मार दी गई. ये आंदोलन का एक बड़ा मोड़ बन गया.
- 18 जुलाई 2024: आम जनता भी सड़कों पर उतर आई. छात्र आंदोलन अब जन आंदोलन बन गया.
- 4 अगस्त 2024: बांग्लादेश के छात्र आंदोलन का सबसे खूनी दिन. सैकड़ों लोग मारे गए.
- 5 अगस्त 2024: शेख हसीना ने इस्तीफा देकर देश छोड़ दिया. सेना प्रमुख जनरल वाकेर-उज़-जमान ने अंतरिम सरकार का ऐलान किया.
शेख हसीना के इस्तीफे के तीन दिन बाद, नोबेल विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी. 84 साल के यूनुस को माइक्रोक्रेडिट का जनक माना जाता है.

बांग्लादेश का रिजीम चेंज कैसे हुआ?
बांग्लादेश में जो हुआ, वो दो हिस्सों में बंटा था:
- छात्रों का आंदोलन: ये 5 जून से शुरू हुआ. शुरुआत में ये सिर्फ आरक्षण के खिलाफ था. लेकिन सरकार की क्रूरता गोलीबारी, इंटरनेट बंद और सोशल मीडिया पर रोक ने इसे जन आंदोलन में बदल दिया.
- सेना का फैसला: 5 अगस्त को जब लाखों लोग ढाका मार्च में शामिल होने के लिए सड़कों पर थे, तब सेना प्रमुख ने हसीना को इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया. दोपहर 3:15 बजे सेना प्रमुख ने ऐलान किया कि प्रधानमंत्री ने इस्तीफा देकर देश छोड़ दिया है.
यानी रिजीम चेंज सिर्फ सड़कों पर नहीं हुआ. सेना ने हसीना का साथ छोड़ दिया और वो अकेली पड़ गईं.
बांग्लादेश का राजनीतिक नक्शा 2026 में कहां है?
शेख हसीना के पतन के बाद अंतरिम सरकार ने 18 महीने तक शासन किया. फिर फरवरी 2026 में चुनाव हुए. बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने 212 सीटें जीतीं, जबकि जमात-ए-इस्लामी गठबंधन को 77 सीटें मिलीं.
BNP प्रमुख और खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान ने 17 साल के निर्वासन के बाद दिसंबर में बांग्लादेश लौटकर चुनाव जीता. वो देश के नए प्रधानमंत्री बने. शेख हसीना की आवामी लीग को चुनाव लड़ने से रोक दिया गया. हसीना, जिन्हें अनुपस्थिति में मानवता के खिलाफ अपराधों के लिए मौत की सजा सुनाई गई है, भारत में रह रही हैं और उन्होंने चुनाव को ‘अवैध’ करार दिया.

अरब स्प्रिंग और बांग्लादेश का क्या कनेक्शन है?
दोनों में एक बात कॉमन है कि दोनों जगह तानाशाही के खिलाफ जनता सड़कों पर उतरी. लेकिन एक बड़ा फर्क भी है:
- अरब स्प्रिंग में ज्यादातर देशों में लोकतंत्र नहीं आया. मिस्र में सेना, लीबिया में गृहयुद्ध, सीरिया में युद्ध और यमन में भी युद्ध है.
- बांग्लादेश में छात्र आंदोलन के बाद चुनाव हुए और नई सरकार बनी. हालांकि, अभी भी स्थिति पूरी तरह स्थिर नहीं है.
एक और बात: अरब स्प्रिंग का सबक ये है कि सिर्फ तानाशाह को गिरा देना काफी नहीं होता. उसकी जगह क्या आएगा, ये भी उतना ही जरूरी है. बांग्लादेश में भी अब यही सवाल है कि क्या BNP सरकार स्थिरता और लोकतंत्र दोनों दे पाएगी?
तो निचोड़ क्या निकलता है?
अरब स्प्रिंग ने दिखाया कि जनता की ताकत कितनी बड़ी होती है, लेकिन ये भी दिखाया कि लोकतंत्र सिर्फ सड़कों पर नारे लगाने से नहीं आता. इसके लिए संस्थाएं चाहिए, नेतृत्व चाहिए और सबसे बड़ी बात- सब्र चाहिए.
कुल मिलाकर तानाशाह को हटाना आसान है, लेकिन लोकतंत्र बनाना मुश्किल है. चाहे ट्यूनीशिया हो या ढाका, जनता जब एकजुट होती है, तो सत्ता को झुकना पड़ता है. जनता को ये भी समझना होगा कि आंदोलन के बाद का रास्ता आंदोलन से भी ज्यादा कठिन होता है.





