इज़राइल में हुए आम चुनावों के नतीजे आने के बाद देश की राजनीति एक बेहद दिलचस्प और जटिल मोड़ पर आ खड़ी हुई है. मतदान के दो दिन बाद सामने आए शुरुआती रुझानों और आंशिक परिणामों ने यह साफ कर दिया है कि इज़राइल की चुनावी तस्वीर में उथल-पुथल मची हुई है. देश के लंबे समय से प्रधानमंत्री रहे बेंजामिन नेतन्याहू के दक्षिणपंथी गुट और पूर्व सैन्य प्रमुख गादी ईसेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्ष दोनों में से किसी के पास भी शासन करने के लिए आवश्यक जादुई आंकड़े यानी 61 सीटों का बहुमत नहीं है.
इस राजनीतिक गतिरोध ने इज़राइल की दो प्रमुख अरब-बहुमत पार्टियों ‘ज्वाइंट लिस्ट’ (संयुक्त सूची) और ‘राअम’ (यूनाइटेड अरब लिस्ट) को पूरी कहानी के केंद्र में ला खड़ा किया है. 120 सदस्यीय नेसेट (इज़रायली संसद) में इन दोनों पार्टियों ने रिकॉर्ड संयुक्त रूप से 19 सीटें हासिल की हैं. निवर्तमान संसद में उनके पास कुल 10 सीटें थीं, जिससे इस बार उनकी ताकत लगभग दोगुनी हो गई है. यह संख्यागणित उन्हें इज़रायली राजनीति का नया ‘किंगमेकर’ बनाता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत और अब तक का राजनीतिक इतिहास यह गवाही देता है कि राह इतनी आसान नहीं है.
सीटों का वर्तमान गणित और वोटों की पहेली
बुधवार तक लगभग 86 से 90 प्रतिशत मतपत्रों की गिनती पूरी हो चुकी थी. केंद्रीय चुनाव समिति के आंशिक परिणामों के अनुसार, नेतन्याहू के गुट को 53 सीटें और ईसेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गुट को 48 सीटें मिलती दिख रही हैं. वहीं, अरब नेतृत्व वाली दोनों पार्टियों के खाते में 19 सीटें जाती दिख रही हैं, जिसमें ‘संयुक्त सूची’ के लिए 12 और ‘राअम’ के लिए 7 सीटें शामिल हैं.
इस चुनाव में नेतन्याहू के खेमे को बड़ा झटका लगा है. निवर्तमान नेसेट में उनके पास 68 सीटें थीं, यानी उन्हें करीब 15 सीटों का सीधा नुकसान हुआ है. हालांकि, नेतन्याहू की ‘लिकुद’ पार्टी लगभग 26 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है, लेकिन यह बहुमत के लिए काफी नहीं है.
यह गिनती अभी अंतिम नहीं है. सैनिकों, पुलिस अधिकारियों, कैदियों, राजनयिकों और अन्य लोगों द्वारा डाले गए लगभग 4.3 से 4.8 लाख ‘डबल-एनवेलप’ (दोहरे लिफाफे वाले) मतों की गिनती अभी बाकी है. केंद्रीय चुनाव समिति का अनुमान है कि इन मतों से लगभग 12 नेसेट सीटें तय होंगी. हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इन विशेष मतों का पारंपरिक झुकाव नेतन्याहू के खेमे की ओर रहा है, फिर भी इससे सत्ता के मूल संतुलन में कोई बहुत बड़ा क्रांतिकारी बदलाव आने की उम्मीद कम है.
अगर ज़ायोनी विपक्ष की 48 सीटों और अरब पार्टियों की 19 सीटों को आपस में मिला दिया जाए, तो नेतन्याहू-विरोधी खेमे के पास लगभग 60 सीटें हो जाती हैं. स्पष्ट है कि अरब पार्टियों के बिना न तो विपक्ष 61 के जादुई आंकड़े तक पहुंच सकता है और न ही नेतन्याहू बहुमत का जुगाड़ कर सकते हैं.
अरब पार्टियों को अचानक रिकॉर्ड सीटें कैसे मिलीं?
अरब पार्टियों की सीटों में आया यह अभूतपूर्व उछाल मुख्य रूप से अरब मतदाताओं की रिकॉर्ड भागीदारी की वजह से है. सेंट्रल इलेक्शन कमेटी के आंकड़ों के मुताबिक, इस बार कुल मतदान लगभग 77.7 प्रतिशत रहा, जो 1999 के बाद से नेसेट चुनावों में सबसे अधिक है. इज़रायली चैनल 12 की रिपोर्ट के अनुसार, अकेले अरब समुदाय में मतदान का यह आंकड़ा लगभग 80 प्रतिशत तक पहुंच गया. तुलनात्मक रूप से देखें तो 2022 के चुनावों में अरब और ड्रूज़ मतदाताओं के बीच मतदान महज़ 53 प्रतिशत था.
अरब बहुल इलाकों में इस राजनीतिक सक्रियता के पीछे मुख्य वजह निवर्तमान सरकार और उसके दक्षिणपंथी मंत्रियों—विशेषकर राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-गवीर और वित्त मंत्री बेज़ालेल स्मोट्रिच—की नीतियों के प्रति गहरा गुस्सा था. इज़राइल की कुल आबादी का लगभग पांचवां हिस्सा अरब नागरिकों का है, जो इन दिनों संगठित अपराध की एक भयानक लहर का सामना कर रहे हैं. वर्ष 2025 में 252 अरब नागरिकों की हत्याएं हुईं, जो अब तक का सबसे घातक वर्ष साबित हुआ.
दूसरी ओर, नेतन्याहू ने अपने समर्थकों को अरब मतदाताओं की भारी भागीदारी के खिलाफ बार-बार आगाह किया था और चुनाव प्रचार को “दक्षिणपंथी बनाम फ़िलिस्तीन” के रूप में पेश किया था. इसके बावजूद, अरब मतदाताओं ने अपनी ताक़त का अहसास कराने के लिए पोलिंग बूथों का रुख किया.
इज़राइल की दोनों मुख्य अरब पार्टियां क्या चाहती हैं?
नई संसद में मौजूद दोनों अरब पार्टियों की विचारधारा और रणनीतियां एक-दूसरे से काफी अलग हैं:
-
द ज्वाइंट लिस्ट (संयुक्त सूची): यह तीन पार्टियों—कम्युनिस्ट ‘हदाश’, अरब राष्ट्रवादी ‘ता’अल’ और फ़िलिस्तीनी राष्ट्रवादी ‘बालाद’ का गठबंधन है. यूसुफ जबरीन इसके अध्यक्ष हैं. इस गठबंधन ने ऐतिहासिक रूप से ज़ायोनी-नेतृत्व वाली सरकारों में सीधे शामिल होने से हमेशा परहेज किया है. इस बार इनका प्रस्ताव है कि वे गठबंधन के बाहर से एक वैकल्पिक सरकार का समर्थन करेंगे और अपनी ताकत का इस्तेमाल नेतन्याहू, बेन ग्विर और स्मोट्रिच को सत्ता से बाहर करने के लिए करेंगे.
-
राअम (यूनाइटेड अरब लिस्ट): मंसूर अब्बास के नेतृत्व वाली यह पार्टी सामाजिक रूप से रूढ़िवादी और इस्लामवादी विचारधारा से जुड़ी है. 2021 में बेनेट-लापिड सरकार के हिस्से के रूप में यह इज़राइल की सत्ताधारी गठबंधन में शामिल होने वाली पहली स्वतंत्र अरब पार्टी बनी थी. अब्बास ने संकेत दिया है कि यदि विपक्षी गठबंधन व्यावहारिक और उनकी शर्तों पर खरा उतरता है, तो वे समर्थन देने या शामिल होने पर विचार कर सकते हैं.
दोनों ही पार्टियां अरब समुदायों के लिए संगठित अपराध के खात्मे, आवास की कमी दूर करने, भेदभाव समाप्त करने और बुनियादी ढांचे में निवेश जैसे मुद्दों पर ठोस वादे चाहती हैं. इसके अलावा, वे नई संसद के गठन के बाद नेसेट स्पीकर पद से लिकुड के अमीर ओहाना को हटाकर विधायी नियंत्रण अपने हाथ में लेना चाहती हैं, ताकि 7 अक्टूबर 2023 के हमलों की आधिकारिक सरकारी जांच शुरू की जा सके.
विपक्ष की दुविधा और ‘राजनीतिक वीटो’
भले ही अरब पार्टियों के पास 19 सीटें हैं, लेकिन उनके सामने एक बहुत बड़ा अवरोध है—जिसे ‘राजनीतिक वीटो’ कहा जाता है. इज़राइल के यहूदी नेतृत्व वाले प्रमुख विपक्षी दल खुलकर इन अरब पार्टियों पर पूरी तरह निर्भर होने से बचते हैं.
विपक्ष के भीतर भी इसको लेकर खींचतान है. ‘डेमोक्रेट्स’ पार्टी के नेता यायर गोलान ने खुलकर अरब पार्टियों के साथ मिलकर काम करने की वकालत की है और नेतन्याहू के विभाजनकारी बयानों को नकारा है. इसके विपरीत, पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट और ‘यिसरायल बेतेनु’ पार्टी के प्रमुख एविग्डोर लिबरमैन जैसे नेता, जो पिछली बार मिली-जुली सरकार का हिस्सा थे, इस बार अरब पार्टियों के साथ बैठने से साफ इंकार कर चुके हैं.
यदि विपक्ष के नेता गादी ईसेनकोट को राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग के सामने बहुमत साबित करना है, तो उन्हें अपनी पार्टी के दक्षिणपंथी और धार्मिक सांसदों के तीखे विरोध का सामना करना पड़ेगा.
नेतन्याहू खेमे की प्रतिक्रिया और राजनीतिक पैंतरेबाज़ी
दूसरी ओर, बेंजामिन नेतन्याहू ने अरब पार्टियों पर निर्भर किसी भी सरकार के गठन को “शर्म और अपमान” करार दिया है. लिकुड पार्टी ने चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि अरब पार्टियों ने धोखाधड़ी और धमकियों का सहारा लिया है, हालांकि चुनाव अधिकारियों ने बड़े पैमाने पर चुनावी धांधली के इन दावों को खारिज कर दिया है.
दिलचस्प बात यह है कि राजनीतिक मजबूरियां अजीब रंग दिखाती हैं. जहां एक तरफ नेतन्याहू सार्वजनिक रूप से अरब पार्टियों को अछूत मानते हैं, वहीं अंदरखाने पर्दे के पीछे से संपर्क साधने की खबरें भी सामने आई हैं. इसके अलावा, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के प्रभाव और मध्यस्थता से इज़राइल में एक ‘यूनिटी गवर्नमेंट’ (राष्ट्रीय एकता सरकार) बनाने के विकल्पों पर भी विचार किया जा रहा है.
यह साफ है कि इज़राइल की राजनीति में अरब दल आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़े हैं. वे अकेले दम पर किसी को सिंहासन पर नहीं बैठा सकते, लेकिन वे यह तय करने की पूरी ताकत रखते हैं कि नेतन्याहू सत्ता से बेदखल होंगे या नहीं. इज़राइल का यह राजनीतिक ड्रामा आने वाले हफ्तों में और अधिक नाटकीय मोड़ ले सकता है, क्योंकि हर दल अपने राजनीतिक अस्तित्व और देश के भविष्य के बीच संतुलन बिठाने की जद्दोजहद में जुटा है.





