Anant Ambani Kamakhya Temple: रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी के बेटे अनंत अंबानी हाल ही में असम के प्रसिद्ध कामाख्या मंदिर पहुंचे, जहां उन्होंने विशेष पूजा-अर्चना की. इस दौरान उन्होंने मंदिर परिसर में कबूतर उड़ाए और बकरे छोड़े.
इसके बाद से कामाख्या मंदिर की एक अनोखी परंपरा, ‘जीवित बलि’, चर्चा का विषय बन गई है. आखिर इस परंपरा के पीछे क्या रहस्य है और इसकी मान्यता क्या है, आइए जानते हैं.
क्या है कामाख्या मंदिर में जीवित बलि की परंपरा?
कामाख्या मंदिर भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक माना जाता है. यह मंदिर तांत्रिक साधना और शक्ति उपासना का महत्वपूर्ण केंद्र है. यहां सदियों से कई धार्मिक और लोक परंपराएं निभाई जाती रही हैं. इन्हीं में से एक परंपरा है जीवित बलि, जिसमें किसी जीव की हत्या नहीं की जाती, बल्कि उसे देवी को समर्पित कर मुक्त कर दिया जाता है.
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जीवित बलि के पीछे क्या है मान्यता?
मान्यता है कि जब किसी भक्त की मनोकामना पूरी हो जाती है या वह कोई विशेष मन्नत मांगता है, तो देवी के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए कबूतर उड़ाता है या बकरा छोड़ता है. इसे देवी को जीवित अर्पण माना जाता है. इस प्रक्रिया में न तो किसी जीव को नुकसान पहुंचाया जाता है और न ही कोई हिंसा होती है.
धार्मिक दृष्टि से यह परंपरा त्याग, समर्पण और कृतज्ञता का प्रतीक मानी जाती है. माना जाता है कि भक्त जिस जीव को छोड़ता है, उसके साथ अपनी नकारात्मक ऊर्जा, बाधाएं और कष्ट भी देवी को समर्पित कर देता है.
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क्या है इसका बड़ा रहस्य?
कामाख्या मंदिर की यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक गहरे प्रतीकवाद से जुड़ी हुई मानी जाती है. तांत्रिक मान्यताओं के अनुसार जीव को मुक्त करना आत्मा की स्वतंत्रता, बंधनों से मुक्ति और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा के प्रवेश का प्रतीक है. यही कारण है कि इसे साधारण दान नहीं, बल्कि आध्यात्मिक समर्पण का रूप माना जाता है.
शास्त्रों में मिलता है उल्लेख?
कबूतर उड़ाने और बकरा छोड़ने की इस परंपरा का स्पष्ट उल्लेख प्रमुख शास्त्रों में नहीं मिलता. हालांकि स्थानीय असमिया संस्कृति, जनजातीय परंपराओं और लोक आस्थाओं के प्रभाव से यह प्रथा समय के साथ मंदिर की धार्मिक परंपराओं का हिस्सा बन गई. आज भी हजारों श्रद्धालु अपनी मन्नत पूरी होने पर इस परंपरा का पालन करते हैं.
कामाख्या मंदिर में दी जाने वाली जीवित बलि हिंसा नहीं, बल्कि आस्था, कृतज्ञता और समर्पण का प्रतीक मानी जाती है. यही वजह है कि तांत्रिक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध इस शक्तिपीठ में आज भी यह अनोखी और अहिंसक परंपरा श्रद्धा के साथ निभाई जाती है.
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