Sandhi Puja: अष्टमी-नवमी के बीच 48 मिनट की पूजा क्यों होती है?

Sandhi Puja: अष्टमी-नवमी के बीच 48 मिनट की पूजा क्यों होती है?


Sandhi Puja 2026: दुर्गा पूजा में अष्टमी की पूजा पूरी होने के बाद भी एक खास अनुष्ठान का इंतजार रहता है, संधि पूजा. इसकी तैयारी पहले से की जाती है, क्योंकि पूजा का समय पूरे दिन में अपनी सुविधा से नहीं चुना जा सकता.

अष्टमी के आखिरी 24 मिनट और नवमी के शुरुआती 24 मिनट मिलकर संधि पूजा के 48 मिनट बनाते हैं. इसी दौरान देवी के चामुंडा स्वरूप की आराधना होती है. लेकिन दो तिथियों के इस मिलन को इतना महत्वपूर्ण क्यों माना गया है? इसका संबंध देवी के एक विशेष युद्ध प्रसंग से है.

संधि पूजा के लिए यही 48 मिनट क्यों?

‘संधि’ का अर्थ है दो अवस्थाओं का मिलन. यहां यह मिलन अष्टमी और नवमी तिथि का है. संधि पूजा की अवधि दो घटी मानी जाती है. एक घटी लगभग 24 मिनट की होती है, इसलिए दो घटी का समय 48 मिनट होता है.

इसे एक उदाहरण से समझिए. यदि किसी पंचांग में अष्टमी तिथि सुबह 11 बजे समाप्त हो रही हो, तो संधि पूजा का समय सुबह 10:36 से 11:24 बजे तक बनेगा. यह केवल गणना समझाने का उदाहरण है, किसी वर्ष का वास्तविक मुहूर्त नहीं.

संधि पूजा और संध्या पूजा में भी फर्क है. नाम सुनकर इसे शाम की पूजा समझना सही नहीं होगा. अष्टमी से नवमी में प्रवेश जिस समय होगा, संधि पूजा उसी के आसपास होगी, चाहे सुबह हो, दोपहर या रात.

देवी के चामुंडा स्वरूप से क्या संबंध है?

दुर्गा सप्तशती के सातवें अध्याय में चंड और मुंड नाम के असुरों के वध का वर्णन मिलता है. कथा के अनुसार, देवी अंबिका के क्रोध से उनके ललाट से काली प्रकट होती हैं. युद्ध में काली चंड और मुंड का वध करती हैं. इसके बाद देवी चंडिका उन्हें ‘चामुंडा’ नाम देती हैं. सातवें अध्याय के श्लोक 27 में इस नामकरण का उल्लेख है.

संधि पूजा की परंपरा इसी चामुंडा स्वरूप की आराधना से जुड़ी है. बेलूर मठ के आधिकारिक विवरण में भी इस अवसर पर दुर्गा की चामुंडा रूप में पूजा का उल्लेख है.

यहां कथा और अनुष्ठान का अंतर समझना जरूरी है. सप्तशती का सातवां अध्याय चंड-मुंड वध का प्रसंग बताता है; संधि पूजा की परंपरा उस प्रसंग को अष्टमी-नवमी के मिलन काल से जोड़ती है. दोनों बातों को एक ही श्लोक का कथन बताकर पेश करना ठीक नहीं होगा.

इन 48 मिनटों में क्या खास माना जाता है?

संधि पूजा में देवी के उस स्वरूप का स्मरण होता है जो अन्याय और अत्याचार का सामना करता है. भक्तों के लिए यह मां से रक्षा और साहस की प्रार्थना का अवसर है.

दुर्गा पूजा में इसका स्थान कितना महत्वपूर्ण है, इसका अंदाजा बेलूर मठ के विवरण से मिलता है. वहां संधि पूजा को पूरे दुर्गा पूजा आयोजन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अनुष्ठान बताया गया है. इसलिए इसकी तैयारियां पहले पूरी की जाती हैं, ताकि निर्धारित अवधि में पूजा संपन्न हो सके.

क्या हर जगह पूजा की विधि एक जैसी होती है?

संधि काल का आधार एक है, लेकिन अनुष्ठान में स्थानीय और संस्थागत परंपराओं का फर्क हो सकता है. उदाहरण के लिए, बेलूर मठ में पशुबलि नहीं होती. उसके आधिकारिक विवरण के अनुसार, संधि पूजा में केले की प्रतीकात्मक बलि दी जाती है. इसलिए किसी एक स्थान की प्रथा को सभी दुर्गा पूजा आयोजनों का अनिवार्य नियम समझना सही नहीं है.

पूजा में शामिल होने से पहले क्या जान लें?

संधि पूजा में जाना चाहते हैं तो संबंधित मंदिर या पंडाल से उसका निर्धारित समय पहले पता कर लें. केवल अष्टमी की तारीख जानना पर्याप्त नहीं है; जरूरी है अष्टमी तिथि समाप्त होने का सही समय जानना.

इन 48 मिनटों की विशेषता उनकी छोटी अवधि भर नहीं है. दुर्गा पूजा की परंपरा में यह देवी के चामुंडा स्वरूप को याद करने का निश्चित अवसर है, जब आराधना में मां की ममता के साथ उनकी रक्षा करने वाली शक्ति भी केंद्र में आती है.

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.



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