SC/ST आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ का विरोध, SC में दाखिल हलफनामा

SC/ST आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ का विरोध, SC में दाखिल हलफनामा


Centre Opposes Creamy Layer for SC/ST: अनुसूचित जाति/जनजाति (SC/ST) के आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ या आमदनी पर आधारित सब-कोटा लागू करने की मांग का केंद्र सरकार ने विरोध किया है. सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर केंद्र ने कहा है कि आरक्षण व्यवस्था में कोई भी बदलाव संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है. सरकार ने यह भी कहा है कि आरक्षण सिर्फ आर्थिक स्थिति पर आधारित नहीं है. इसका आधार ऐतिहासिक रूप से चला आ रहा सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन है.

केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने यह हलफनामा रमाशंकर प्रजापति की याचिका पर दाखिल किया है. इस याचिका के अलावा इस मसले पर समता आंदोलन समिति, ओ पी शुक्ला, अश्विनी उपाध्याय और ज्ञानेंद्र खरे की याचिकाएं भी लंबित हैं. इन सभी पर सुप्रीम कोर्ट में 18 अगस्त को सुनवाई होने की संभावना है.

क्रीमी लेयर रिजर्वेशन का विरोध 

सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिकाओं में कहा गया है SC/ST आरक्षण की मौजूदा नीति से इस वर्ग के उन लोगों को लाभ नहीं मिल पा रहा है, जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं. ओबीसी आरक्षण में आर्थिक रूप से संपन्न लोगों को ‘क्रीमी लेयर’ में मानते हुए आरक्षण का लाभ नहीं दिया जाता है. वैसी ही व्यवस्था में SC/ST आरक्षण में भी होनी चाहिए.

इन याचिकाओं का जवाब देते हुए केंद्र ने कहा है कि ‘क्रीमी लेयर’ का सिद्धांत मुख्य रूप से OBC आरक्षण के लिए विकसित हुआ था. इसे SC/ST वर्गों पर लागू नहीं किया जा सकता. सरकार ने अपने दावे के समर्थन में इंदिरा साहनी, ईवी चिन्नैया और अशोक कुमार ठाकुर जैसे मामलों में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया है. इन फैसलों में यह कहा गया था कि क्रीमी लेयर व्यवस्था ओबीसी आरक्षण के लिए है. SC/ST के लिए कहा गया था कि आर्थिक स्थिति में सुधार होने भर से सामाजिक पिछड़ापन समाप्त नहीं हो जाता.

केंद्र ने अपने जवाब में संविधान के अनुच्छेद 341, 342 और 342A का ज़िक्र किया है. सरकार ने कहा कि SC/ST सूची में बदलाव की शक्ति राष्ट्रपति और संसद के पास है. हलफनामे में कहा गया है कि संविधान व्यवस्था के अलग-अलग अंगों में ‘शक्ति का स्पष्ट बंटवारा’ करता है. आरक्षण नीति में बदलाव न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है.

सामाजिक नीति लागू नहीं बाध्यकारी

केंद्र ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट संसद को किसी विशेष सामाजिक नीति को लागू करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता. अगर आरक्षण के भीतर आय के आधार पर किसी तरह के बदलाव होना भी है, तो इसका फैसला संसद ही कर सकती है. साथ ही, इस तरह का फैसला लेने के लिए व्यापक सामाजिक-आर्थिक अध्ययन और विश्वसनीय आंकड़ों की जरूरत होगी.

सरकार ने यह भी बताया है कि सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण के अलावा SC/ST और SEBC के लिए चलाई जा रही ज्यादातर कल्याणकारी योजनाओं में ‘मीन्स टेस्ट’ लागू है. यानी आमदनी के आधार पर लाभ दिए जाने का प्रावधान है. केंद्र ने याचिकाओं को ‘भ्रामक और आधारहीन’ बताते हुए सुप्रीम कोर्ट से उन्हें खारिज करने का आग्रह किया है.



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