इंडो-गंगेटिक प्लेन का धुआं बढ़ा रहा टेंशन, पहाड़ों और हिमालय पर मंडरा रहा बड़ा खतरा

इंडो-गंगेटिक प्लेन का धुआं बढ़ा रहा टेंशन, पहाड़ों और हिमालय पर मंडरा रहा बड़ा खतरा


How Pollution Is Rising Across Indo-Gangetic Plain: इंडो-गंगेटिक प्लेन में बढ़ता प्रदूषण अब सिर्फ बड़े शहरों की समस्या नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर हिमालय तक पहुंचने लगा है. एक नई सैटेलाइट आधारित स्टडी में खुलासा हुआ है कि पिछले 25 वर्षों में इस क्षेत्र में पार्टिकुलेट मैटर यानी पीएम प्रदूषण तेजी से बढ़ा है और इसका खतरा लोगों पर मंडरा रहा है. सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में बिहार और पश्चिम बंगाल शामिल हैं. 

2000-2009 की तुलना में 20 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ोतरी

‘एटमॉस्फेरिक एनवायरनमेंट’ जर्नल में प्रकाशित यह रिसर्च कोलकाता के बोस इंस्टीट्यूट ने की है. स्टडी में 2000 से 2024 तक इंडो-गंगेटिक प्लेन, हिमालयी क्षेत्र और नॉर्थ- ईस्ट भारत के प्रदूषण स्तर का एनालिसिस किया गया. रिसर्च के अनुसार, 2010 से 2019 के दौरान पीएम प्रदूषण में 2000-2009 की तुलना में 20 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज की गई. 

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अब हिमालय तक पहुंच रहा प्रदूषण

स्टडी में सबसे चिंताजनक बात यह सामने आई कि इंडो-गंगेटिक प्लेन से निकलने वाला प्रदूषण अब हिमालय तक पहुंच रहा है. रिसर्च के मुताबिक पंजाब, हरियाणा और दिल्ली से निकलने वाला प्रदूषण पश्चिमी और मध्य हिमालय को प्रभावित कर रहा है, जबकि बिहार और पश्चिम बंगाल का प्रदूषण पूर्वी हिमालय तक पहुंच रहा है. बोस इंस्टीट्यूट के प्रमुख रिसर्चर  सौमेन राउल ने कहा कि हिमालय अब इंडो-गंगेटिक प्लेन के प्रदूषण से सुरक्षित नहीं रह गया है. उन्होंने बताया कि पंजाब या बिहार में निकलने वाला प्रदूषण वहीं नहीं रुकता, बल्कि हवा के जरिए पहाड़ों तक पहुंच जाता है. उनके मुताबिक हिमालय पारिस्थितिक और जलवायु की दृष्टि से बेहद संवेदनशील क्षेत्र है, लेकिन फिलहाल भारत के किसी संगठित क्लीन एयर प्रोग्राम में इसे गंभीरता से शामिल नहीं किया गया है.

क्यों स्थिति हो रही है गंभीर?

रिसर्च में भारत के नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम का भी एनालिसिस किया गया. स्टडी के अनुसार, शहरों में पीएम प्रदूषण कम करने में इस योजना का कुछ असर जरूर दिखा है, लेकिन बायोमास बर्निंग यानी लकड़ी, फसल अवशेष और दूसरे जैविक ईंधन जलाने से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने में कार्यक्रम ज्यादा सफल नहीं रहा. बोस इंस्टीट्यूट में रिसर्च का नेतृत्व करने वाले अभिजीत चटर्जी ने कहा कि नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम  मुख्य रूप से शहरों पर केंद्रित योजना है, जबकि ग्रामीण इलाकों में भी प्रदूषण की स्थिति काफी गंभीर है. उन्होंने कहा कि खाना पकाने, खेती और गर्मी के लिए बायोमास जलाना लगातार बढ़ रहा है, लेकिन मौजूदा क्लीन एयर मिशन में इसे पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा.

बिहार और नॉर्थ- ईस्ट में बढ़ा प्रभाव

स्टडी में यह भी सामने आया कि 2000-2009 के दौरान जो कार्बन प्रदूषण बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तरी पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा और बांग्लादेश के कुछ हिस्सों तक सीमित था, वह 2020-2024 तक पश्चिम बंगाल, बिहार और पूर्वोत्तर के बड़े हिस्सों में फैल चुका है. रिसर्च के मुताबिक इसकी सबसे बड़ी वजह ग्रामीण इलाकों में बायोमास जलाना और शहरी ठोस कचरे को जलाना है. हालांकि उत्तर प्रदेश में हाल के वर्षों में कार्बन प्रदूषण में कुछ कमी दर्ज की गई है.

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