गर्भावस्था से जुड़ी कई बातें परिवारों और समाज में लंबे समय से कही जात रही हैं. इन्हीं में एक आम धारणा है कि अगर गर्भवती महिला खूबसूरत या प्यारे बच्चों की तस्वीरें देखे, तो उसका होने वाला बच्चा भी उतना ही क्यूट पैदा होगा. कई लोग तो यह भी मानते हैं कि गर्भावस्था के दौरान मां जिस तरह की तस्वीरें देखती है या जिन चीजों के बारे में सोचती है, उनका असर बच्चे के चेहरे पर उसी प्रकार पड़ता है. लेकिन क्या वाकई ऐसा होता है? आइए जानते हैं इसके पीछे की सच्चाई.
माता-पिता के जीन करते हैं असर
वैज्ञानिक दृष्टि से ऐसा कोई मजबूत प्रमाण नहीं है कि गर्भावस्था के दौरान बच्चों की तस्वीरे देखने से नवजात के चेहरे की बनावट या सुंदरता बदल जाती है. बच्चे की शारीरिक विशेषताएं मुख्य रूप से माता-पिता के जीन और आनुवंशिक संरचना से निर्धारित होती हैं. आंखों का आकार, नाक की बनावट, चेहरे का आकार, बालों की प्रकृति और त्वचा से जुड़े कई गुण माता-पिता से मिलने वाले आनुवंशिक कारकों से प्रभावित होते हैं. इसलिए केवल किसी तस्वीर को देखने से बच्चे के चेहरे की विशेषताओं में बदलाव होने की बात वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं है.
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पारंपरिक मान्यताएं
इस तरह की बातें अलग-अलग संस्कृतियों और परिवारों में पीढ़ियों से सुनने को मिलती रही हैं. गर्भावस्था को लेकर कई पारंपरिक मान्यताएं हैं, जिनमें मां के विचारों, पसंद और आसपास के वातावरण को बच्चे के व्यक्तित्व या रूप-रंग से जोड़ा जाता है. हालांकि इन मान्यताओं का सांस्कृतिक या भावनात्मक महत्व हो सकता है, लेकिन इन्हें वैज्ञानिक तथ्य नहीं माना जा सकता. किसी बच्चे के चेहरे की बनावट को केवल मां के देखे हुए चित्रों या उसकी कल्पनाओं से जोड़ना सही नहीं है.
बच्चे की “क्यूटनेस” किस पर निर्भर करती है?
किसी नवजात को क्यूट या प्यारा लगना केवल उसके चेहरे की बनावट पर निर्भर नहीं करता. नवजात बच्चों में बड़ी आंखें, गोल चेहरा, छोटी नाक और नरम त्वचा जैसी विशेषताएं अक्सर लोगों में स्वाभाविक रूप से स्नेह की भावना पैदा करती हैं. इसके अलावा बच्चे के चेहरे की विशेषताओं पर आनुवंशिकता के साथ-साथ विकास और जन्म के बाद होने वाले प्राकृतिक बदलावों का भी प्रभाव पड़ता है. कई नवजातों के चेहरे जन्म के तुरंत बाद थोड़े सूजे हुए दिखाई दे सकत हैं, जो समय के साथ सामान्य हो जाते हैं.
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