क्या वेंस, रूबियो और कुश्नर के लिए मुसीबत बनेगी मिडटर्म में हार? ट्रंप के उत्तराधिकार पर संकट

क्या वेंस, रूबियो और कुश्नर के लिए मुसीबत बनेगी मिडटर्म में हार? ट्रंप के उत्तराधिकार पर संकट


अमेरिका के 2026 मिडटर्म इलेक्शनों में रिपब्लिकन पार्टी की करारी हार ने सिर्फ ट्रंप के राष्ट्रपति कार्यकाल को ही नहीं, बल्कि 2028 के राष्ट्रपति चुनाव के पूरे समीकरण को हिला कर रख दिया है. यह हार खासतौर पर ट्रंप के राजनीतिक वारिस उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, विदेश मंत्री मार्को रूबियो और ट्रंप के दामाद जेरेज कुश्नर के लिए बड़ी चुनौती बन गई है. हालांकि, इसके लिए अमेरिकी राजनीति के ऐतिहासिक रुझान को समझना होगा.

तो क्या डेमोक्रेट्स की जीत इनके रास्ते में रोड़ा बनेगी और राष्ट्रपति चुनाव 2028 पर कितना असर पड़ेगा?

जेडी वेंस: सबसे बड़ा सियासी नुकसान?

इस चुनाव नतीजे का सबसे सीधा और गहरा असर जेडी वेंस पर पड़ा है. मिडटर्म इलेक्शन से पहले वेंस को 2028 के लिए रिपब्लिकन पार्टी का सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा था. पूरे चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने खुद को ट्रंप के साथ पूरी तरह से जोड़ लिया था. अब यही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गया है.

हार के बाद वेंस ने तुरंत खुद को ट्रंप से दूर करने की कोशिश शुरू कर दी. वेंस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक लंबी पोस्ट में हार का ठीकरा ईरान के साथ चल रहे युद्ध पर फोड़ दिया.

एक्सपर्ट्स का मानना है कि वोटर्स उनकी इस कोशिश को नकार हैं. यह समस्या अमेरिकी उपराष्ट्रपतियों के लिए नई नहीं है. 2024 में कमला हैरिस को भी जो बाइडन से खुद को अलग दिखाने में यही दिक्कत आई थी. अमेरिकी इतिहास में उपराष्ट्रपति पद से सीधे राष्ट्रपति बनने के रास्ते में एक बड़ी अड़चन रही है.

काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और अमेरिकी विदेश नीति के एक्सपर्ट जेम्स लिंडसे के मुताबिक, ‘उपराष्ट्रपतियों के लिए अच्छी खबर यह है कि उन्हें पार्टी का टिकट मिलने की शुरुआती बढ़त होती है, लेकिन बुरी खबर है कि वे शायद ही कभी चुनाव जीतते हैं.’

पिछले 190 सालों में सिर्फ जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश ही उपराष्ट्रपति से सीधे राष्ट्रपति बन पाए हैं. हालांकि, सर्वेक्षणों में वह अब भी रिपब्लिकन मतदाताओं के बीच एक प्रमुख दावेदार बने हुए हैं, लेकिन मिडटर्म की हार ने उनकी ‘अजेय’ वाली छवि को चोट पहुंचाई है.

मार्को रूबियो: कम नुकसान, लेकिन चुनौती बरकरार

मार्को रूबियो ने इस पूरे संकट में खुद को कुछ हद तक बचा लिया है. रूबियो ने मिडटर्म कैंपेन के दौरान काफी कम प्रोफाइल बनाए रखी और सुर्खियों से दूर रहे. यही वजह है कि पार्टी के भीतर कुछ लोग उन्हें एक ‘साफ’ विकल्प के रूप में देख रहे हैं.

रूबियो की एक बड़ी समस्या है कि वह भी ट्रंप प्रशासन का हिस्सा हैं. एक्सपर्ट्स का तर्क है कि ईरान युद्ध समेत सरकार की सभी नीतियों की जिम्मेदारी से वह पूरी तरह से आजाद नहीं हो सकते. दूसरी ओर अगर वेंस 2028 की दौड़ से हटते हैं या कमजोर पड़ते हैं, तो रूबियो के लिए रास्ता खुल सकता है. सर्वेक्षणों में वेंस और रूबियो के बीच कांटे की टक्कर देखी गई थी. यानी रूबियो पार्टी के भीतर मजबूत दावेदार बने हुए हैं.

जेरेड कुश्नर: सबसे असमंजस स्थिति

जेरेड कुश्नर का नाम इस चर्चा में सबसे कम सुनाई देता है, लेकिन उनकी स्थिति सबसे जटिल है. वह ट्रंप के दामाद हैं और पहले प्रशासन में एक वरिष्ठ सलाहकार की भूमिका निभा चुके हैं. हालांकि, इस बार के मिडटर्म इलेक्शन में उनकी कोई सक्रिय या दिखने वाली भूमिका सामने नहीं आई. ऐसे में यह कहना मुश्किल है कि इस हार का उन पर सीधा कितना असर पड़ेगा.

एक बात साफ है कि ट्रंप के करीबी होने का फायदा तो उन्हें मिल सकता है, लेकिन ट्रंप की बढ़ती अलोकप्रियता का नुकसान भी उनसे जुड़ा रहेगा. अभी तक के राष्ट्रीय सर्वेक्षणों में उनका नाम प्रमुख रिपब्लिकन दावेदारों में नहीं दिख रहा है, जिससे पता चलता है कि पार्टी के भीतर उनकी स्थिति अभी उतनी मजबूत नहीं है.

क्या डेमोक्रेट्स के लिए रास्ता आसान हुआ है?

इस चुनाव ने डेमोक्रेटिक पार्टी को न सिर्फ सत्ता के दोनों सदनों में बहुमत दिया है, बल्कि कई ऐसे नेताओं को सामने ला दिया है जो 2028 में राष्ट्रपति पद की मजबूत दावेदार बन सकते हैं. इनमें जॉन ओसॉफ (जॉर्जिया से सीनेटर), गेविन न्यूजॉम (कैलिफोर्निया के गवर्नर), जोश शापिरो (पेंसिल्वेनिया के गवर्नर) और पीट बुटिजेज जैसे नाम शामिल हैं. खासकर जॉन ओसॉफ को लेकर काफी चर्चा है, जिनकी तुलना बराक ओबामा से की जा रही है.

एक्सपर्ट्स कहते हैं कि डेमोक्रेट्स के लिए रास्ता आसान जरूर हुआ है, लेकिन ‘तय’ नहीं हुआ है. अभी पार्टी के भीतर खुद कई दावेदारों के बीच कॉम्पिटीश बाकी है. यह तय नहीं है कि पार्टी किसे आगे करेगी.

ऐतिहासिक रुझान क्या कहता है?

अगर आप सिर्फ मिडटर्म इलेक्शनों के नतीजों को देखकर 2028 का नतीजा भांपने की कोशिश करेंगे, तो इतिहास कहता है कि यह भविष्यवाणी भरोसेमंद नहीं है. अमेरिकी राजनीति में मिडटर्म इलेक्शन आम तौर पर सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ होते हैं. 1946 से 2022 तक हुए 20 मिडटर्म इलेक्शनों में से 18 बार राष्ट्रपति की पार्टी को सीटें गंवानी पड़ी हैं.

यह जरूरी नहीं कि यही हार राष्ट्रपति चुनाव में भी दोहराई जाए. इसके दो बड़े उदाहरण हैं:

  • 2010 में बराक ओबामा की डेमोक्रेटिक पार्टी को भारी हार मिली थी और 64 हाउस सीटें गंवाई थीं, लेकिन 2012 में ओबामा फिर से राष्ट्रपति चुने गए.
  • 1994 में बिल क्लिंटन की पार्टी को बड़ा झटका लगा था, लेकिन 1996 में क्लिंटन दोबारा जीते थे.

यानी मिडटर्म की हार का मतलब यह नहीं है कि अगला राष्ट्रपति चुनाव भी हार ही जाएगा.

इसका उल्टा भी सच है. मिडटर्म इलेक्शन में चमकने वाले कई नेता राष्ट्रपति की दौड़ में वह चमक बरकरार नहीं रख पाते. उदाहरण के लिए, 1994 में न्यूट गिंग्रिच को मिडटर्म इलेक्शन के बाद राष्ट्रपति पद का प्रबल दावेदार माना गया था, लेकिन वे कभी राष्ट्रपति नहीं बन पाए. यही वजह है कि राजनीतिक जानकार मिडटर्म इलेक्शन को भविष्य का पक्का संकेत मानने के बजाय एक ‘शुरुआती परीक्षा’ कहते हैं.



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