…तो जंग की वजह सिर्फ तेल और होर्मुज नहीं! ईरानी जमीन के नीचे दबा कौन सा ‘खजाना’ चाहते ट्रंप?

…तो जंग की वजह सिर्फ तेल और होर्मुज नहीं! ईरानी जमीन के नीचे दबा कौन सा ‘खजाना’ चाहते ट्रंप?


ईरान और अमेरिका के बीच जब भी तनाव बढ़ता है, तो दुनिया की निगाहें सबसे पहले तेल की कीमतों और होर्मुज स्ट्रेट पर टिक जाती हैं. यह समझना भी गलत नहीं है क्योंकि दुनिया के कुल कच्चे तेल का 20 फीसदी हिस्सा होर्मुज से होकर गुजरता है और ईरान के पास दुनिया के 12 फीसदी तेल भंडार हैं. लेकिन क्या ईरान के पास सिर्फ तेल ही है? बिल्कुल नहीं. ईरान की धरती के नीचे दुर्लभ खनिजों का खजाना दबा है…

ईरान के पास कितना बड़ा खनिज भंडार है?

तेहरान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक:

  • ईरान दुनिया के कुल खनिज भंडार का 15 फीसदी हिस्सा रखता है.
  • ईरान दुनिया के कुल खनिज उत्पादन के मूल्य का 3 फीसदी हिस्सा रखता है.
  • ईरान के पास 68 से ज्यादा तरह के खनिज पाए जाते हैं.
  • ईरान नेचुरल रिसोर्सेज के मामले में दुनिया में 5वें स्थान पर है. इसका कुल मूल्य करीब 27.5 ट्रिलियन डॉलर आंका गया है.

लेड और जिंक: ईरान का सबसे बड़ा हथियार

ईरान के पास लेड (सीसा) और जिंक (जस्ता) के विशाल भंडार हैं:

  • ईरान के पास दुनिया के कुल लेड और जिंक भंडार का 3 फीसदी हिस्सा है.
  • लेड और जिंक मिलाकर ईरान के पास 220 मिलियन टन से ज्यादा का प्रमाणित भंडार है.
  • चीन, कजाकिस्तान और भारत के बाद ईरान एशिया में लेड और जिंक का चौथा सबसे बड़ा उत्पादक है.
  • ईरान के पास दुनिया का सबसे बड़ा जिंक भंडार है. कुछ रिपोर्ट्स में अनुमानों के मुताबिक ईरान के पास करीब 300 मिलियन टन जिंक का भंडार है.
  • लेड के मामले में ईरान दुनिया में 11वें स्थान पर है.
  • ईरान एशिया में छठा सबसे बड़ा जिंक उत्पादक और पांचवां सबसे बड़ा लेड उत्पादक है.
  • ईरान के लेड और जिंक सेक्टर का सालाना निर्यात पोटेंशियल करीब 2 बिलियन डॉलर का है.
  • इस सेक्टर का करीब 80 फीसदी उत्पादन 15 देशों को निर्यात किया जाता है.

सबसे दिलचस्प बात यह है कि ईरान ने अभी तक डीप अंडरग्राउंड माइनिंग की खोज भी नहीं की है. यह सतही खनन की तुलना में कम पर्यावरणीय प्रभाव डालता है. यानी ईरान के पास और भी ज्यादा खनिज हो सकते हैं, जो अभी तक खोजे ही नहीं गए हैं.

सिर्फ लेड-जिंक ही नहीं, ईरान के पास और भी बहुत कुछ

ईरान के खनिज खजाने में कई और स्ट्रैटेजिक मिनरल्स (रणनीतिक खनिज) शामिल हैं:

  • तांबा: ईरान के पास करीब 2.6 बिलियन मीट्रिक टन तांबे के भंडार हैं, जो दुनिया के कुल तांबे के भंडार का 5 फीसदी है. तांबे के मामले में ईरान दुनिया में 7वें स्थान पर है.
  • यूरेनियम: ईरान के पास यूरेनियम के भंडार भी हैं.
  • लिथियम: हाल ही में ईरान में 86 लाख टन लिथियम का भंडार मिला है. लिथियम इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी के लिए सबसे जरूरी खनिज है.
  • लौह अयस्क (Iron Ore): ईरान दुनिया में 7वां सबसे बड़ा लौह अयस्क भंडार वाला देश है, जिसमें दुनिया के 7.1 फीसदी भंडार हैं. आयरन ओर के मामले में ईरान 9वें स्थान पर है.
  • रेयर अर्थ एलीमेंट्स: ईरान के पास टाइटेनियम जैसे दुर्लभ पृथ्वी तत्वों के भंडार भी हैं.

यह खनिज क्यों हैं इतने अहम?  

ये खनिज सिर्फ ‘पत्थर’ नहीं हैं, बल्कि ये भविष्य की तकनीक की रीढ़ हैं:

  • जिंक का इस्तेमाल स्टील बनाने, बैटरी और इलेक्ट्रिक वाहनों में होता है.
  • लेड का इस्तेमाल बैटरी, रक्षा उपकरणों और रेडिएशन से सुरक्षा में होता है.
  • तांबा इलेक्ट्रिक वायरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स और रिनुएबल एनर्जी के लिए जरूरी है.
  • लिथियम इलेक्ट्रिक वाहनों और मोबाइल बैटरी की रीढ़ है.

सेंटर फॉर स्ट्रैटजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS) की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के खनिज संसाधन उसे उभरती हुई ‘क्रिटिकल मिनरल्स’ की दौड़ में अहम खिलाड़ी बनाते हैं. स्वच्छ ऊर्जा, इलेक्ट्रिक गाड़ियों और आधुनिक रक्षा प्रणालियों में इन खनिजों की मांग इतनी बढ़ गई है कि इन्हें ‘रणनीतिक वस्तुओं’ का दर्जा मिल गया है.

प्रतिबंधों के बावजूद ईरान की खनिज ताकत

सवाल यह है कि अगर ईरान के पास इतना बड़ा खनिज भंडार है, तो वह इसका पूरा फायदा क्यों नहीं उठा पा रहा? इसके पीछे अमेरिकी प्रतिबंध सबसे बड़ी वजह हैं. प्रतिबंधों की वजह से ईरान को पश्चिमी देशों से मशीनरी और तकनीक नहीं मिल पाती, जिससे खनन क्षेत्र पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाता.

इसके बावजूद ईरान ने एशियाई बाजारों खासकर चीन के साथ अपने खनिज व्यापार को मजबूत किया है. ईरान अपने तांबे और जिंक का बड़ा हिस्सा चीन को निर्यात करता है. 2023-2024 में ईरान का जिंक कॉन्संट्रेट का लगभग पूरा निर्यात चीन को ही गया.

तो यह लड़ाई सिर्फ की तेल तक सीमित नहीं?

फ्रांस की भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण एजेंसी (BRGM) ने चेतावनी दी है कि मिडिल ईस्ट में चल रहा संकट सिर्फ तेल-गैस बाजारों को ही नहीं, बल्कि दुनिया के सभी खनिज संसाधनों के बाजारों को हिला रहा है. एल्युमिनियम, सल्फर और हीलियम जैसे खनिजों का उत्पादन भी प्रभावित हो रहा है, जिनके लिए प्राकृतिक गैस की जरूरत होती है.

अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली और जापान जैसे G7 देश पहले ही यह तय कर चुके हैं कि 2030 तक किसी एक देश से उनके ‘दुर्लभ पृथ्वी तत्वों’ के आयात का 60 फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए. इसका मतलब है कि G7 चीन पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है और इस कोशिश में ईरान एक विकल्प के रूप में उभर सकता है.



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