केरल में चुनाव नतीजों की समीक्षा के लिए शुक्रवार को बुलाई गई पार्टी की राज्य सचिवालय बैठक के दौरान CPM के कुछ नेताओं ने तीखी आलोचना की. कई सदस्यों ने कहा कि अब चुप रहना कोई विकल्प नहीं है और पार्टी को अब ‘बोलना, सुनना और सुधार करना’ चाहिए.
कुछ नेताओं ने सुझाव दिया कि पार्टी सदस्यों का मन भी LDF के पक्ष में नहीं था. उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी का संगठनात्मक ढांचा ऐसा हो गया है, जहां अब अंदरूनी मामलों पर खुलकर बात नहीं की जा सकती और उन्होंने कहा कि यह पहली समस्या है, जिसे ठीक करने की जरूरत है.
सबकी सुनी जाए- नेताओं का इस बात पर रहा जोर
चर्चा के दौरान नेताओं ने इस बात पर जोर दिया कि हर किसी की बात खुले मन से सुनी जानी चाहिए और सदस्यों को यह महसूस होना चाहिए कि उन्हें अपनी बात कहने की पूरी आजादी है. उन्होंने कहा कि अगर ऐसा नहीं हुआ, तो सुधार की कोई भी कोशिश असल सुधार नहीं बन पाएगी.
13 घंटे तक चली बैठक
यह बैठक जो शुरू में शाम 4 बजे से पहले खत्म होने वाली थी, 13 घंटे तक चली क्योंकि नेताओं ने कथित तौर पर इसे जल्दबाजी में खत्म करने पर आपत्ति जताई थी. उनकी इस मांग को मान लिया गया कि हर किसी को बिना किसी समय सीमा के बोलने का मौका दिया जाना चाहिए.
यह भी पढ़ें: तमिलनाडु में नई सरकार पर सस्पेंस बरकार! VCK ने TVK के समर्थन के लिए विजय के सामने रखी ये शर्त
यह भी पढ़ें: विजय के शपथ पर ग्रहण, VCK डिप्ट CM पर अड़ी, गवर्नर बोले- सिर्फ 116 MLAs की आयी लिस्ट
विजयन और गोविंदन की हुई आलोचना
सूत्रों की माने तो, मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन और राज्य सचिव एम.वी. गोविंदन को बैठक के दौरान आलोचना का सामना करना पड़ा. नेताओं ने कहा कि असहिष्णु व्यवहार खत्म होना चाहिए. एम.वी. गोविंदन पर की गई आलोचना में ऐसे संकेत भी मिले कि शायद उनके लिए पार्टी सचिव के पद से हट जाना ही उचित होगा. पिनाराई विजयन, जो आमतौर पर ऐसी बैठकों में सख्त रवैया अपनाते हैं, इस सत्र के दौरान रात 9 बजे तक रुके रहे, जबकि बैठक रात 11 बजे तक चली.
उम्मीदवारों के चयन से जुड़े मुद्दों पर भी हुई चर्चा
उम्मीदवारों के चयन से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा हुई. के.के. शैलजा ने दूसरे निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए अपना क्षेत्र बदले जाने पर अपनी नाराजगी जाहिर की. सूत्रों के मुताबिक, राज्य सचिवालय की बैठक में मुख्यमंत्री की सीधे तौर पर आलोचना करने का चलन कुछ समय से देखने को नहीं मिला था. इससे पहले हल्की-फुल्की आलोचना तब सामने आई थी, जब विश्वविद्यालय के मुद्दे पर पार्टी की जानकारी के बिना ही राज्यपाल के साथ एक समझौता कर लिया गया था.






