पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 206 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया है. यह पहला मौका होगा जब बीजेपी राज्य में सरकार बनाएगी. भाजपा को दो तिहाई बहुमत मिला है. वहीं, टीएमसी 80 सीटों पर सिमट गई. आखिर क्या वजह है कि 15 वर्षों से बंगाल की सत्ता पर काबिज तृणमूल कांग्रेस को चुनाव में करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा. खुद ममता बनर्जी भी भवानीपुर से चुनाव हार गईं. आइए जानते हैं ममता बनर्जी के सत्ता गंवाने के 5 बड़े फैक्टर क्या हैं.
एंटी-इंकम्बेंसी
2011 में ममता बनर्जी की अगुवाई वाली टीएमसी लेफ्ट का किला ध्वस्त कर सत्ता पर काबिज हुई थी. ममता बनर्जी लगातार तीन चुनाव जीतकर 15 साल से बंगाल के सीएम की कुर्सी पर बैठी हैं. सत्ता विरोध लहर की भी टीएमसी की हार में बड़ी वजह है. करप्शन, हिंसा, भ्रष्टाचार और लॉ एंड ऑर्डर का मुद्दा बीजेपी ने जोर शोर से उठाया. चुनाव परिणाम में बीजेपो को इसका फायदा मिला.
हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि ममता बनर्जी के 15 साल से लगातार बंगाल की सत्ता पर काबिज रहने के पीछे राज्य के मुस्लिम वोटर्स का एकजुट समर्थन है. बंगाल में करीब 30 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं, जो ज्यादातर टीएमसी को समर्थन देते हैं, लेकिन इस चुनाव में हिंदू वोटर्स का ध्रुवीकरण देखने को मिला, जिसने बीजेपी को फायदा पहुंचाया. यही वजह है कि मालदा और मुर्शिदाबदा जैसे मुस्लिम बहुल जिलों में भी बीजेपी का बेहतर प्रदर्शन देखने को मिला.
महिला वोट बैंक में लगी सेंध
बीजेपी ने इस चुनाव में टीएमसी के महिला वोट बैंक में सेधमारी की है. बीते चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि ममता बनर्जी को महिलाओं को बड़े स्तर पर समर्थन मिलता रहा है, लेकिन इस चुनाव में तस्वीर बदली हुई दिखी. बीजेपी ने संदेशखली आरजी कर जैसी घटनाओं को लेकर ममता बनर्जी सरकार पर निशाना साधा. साथ ही आरजी कर पीड़िता की मांग को चुनाव लड़ाया था, जो चुनाव जीतने में कामयाब रहीं.
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SIR का प्रभाव
बंगाल चुनाव में एसआईआर का मुद्दा भी छाया रहा. बीजेपी ने राज्य से कथित अवैध घुसपैठियों को बाहर निकालने के लिए इसे जरूरी बताया तो टीएमसी ने इसे मतदाताओं के अधिकार पर हमला करार दिया. बंगाल में एसआईआर के दौरान 90 लाख से ज्यादा के नाम वोटर लिस्ट से काटे गए थे. टीएमसी सुप्रीमो ने आरोप लगाया कि यह तृणमूल कांग्रेस के प्रभाव वाली सीटों पर SIR के जरिए सबसे ज्यादा वोटर्स के नाम हटाए गए. चुनाव के रिजल्ट से साफ होता है कि SIR का असर टीएमसी पर पड़ा है.
भ्रष्टाचार-घोटाले और बेरोजगारी का मुद्दा
बीजेपी ने इस चुनाव में बढ़ती बेरोजगारी, भर्ती घोटाले, सिस्टम में कथित भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को लेकर ममता सरकार को खूब घेरा. शिक्षक भर्ती घोटाले से जुड़ी 26 हजार भर्ती रद्द होने से युवाओं में नाराजगी बढ़ी थी. इसे भी भाजपा ने जोर-शोर से उठाया. सरकारी कर्मचारियों की नाराजगी भी टीएमसी की हार की बड़ी वजह मानी जाती है. राज्य के कर्मचारी लंबे समय से सातवें वेतन आयोग को लागू करने की मांग कर रहे हैं. कर्मचारियों को अभी छठे वेतन आयोग के हिसाब से वेतन मिल रहा है.






