Shani Jayanti 2026 Katha: धार्मिक और ज्योतिष मान्यता में शनि को कर्मफलदाता और दंडाधिकारी माना गया है. शनि ऐसे देव हैं जिनके लिए सभी भक्त एक समान है. जरूर पड़ने पर वे दंड देकर न्याय भी करते हैं और राजा बनाकर कृपा भी बरसाते हैं.
शनि जयंती कब है (Shani Jayanti Date)
शनि जयंती ज्येष्ठ महीने की अमावस्या को शनि जयंती के रूप में मनाया जाता है, जोकि इस वर्ष शनिवार 16 मई को पड़ रही है. मान्यता है कि, इसी तिथि पर शनि देव का जन्म हुआ था. इसलिए इस दिन भक्त शनि देव की पूजा-अर्चना करते हैं. इस बार शनि जयंती शनिवार के दिन पड़ रही है, जिससे इस तिथि का महत्व कई गुणा बढ़ जाएगा. शनि जयंती पर शनि देव के जन्म से जुड़ी पौराणिक कथा सभी को पढ़नी या सुननी चाहिए.
शनि देव को सूर्य पुत्र कहा जाता है. लेकिन ग्रहों के राजा का पुत्र होने के बावजूद शनि को ग्रहों में भृत्य माना जाता है. हालांकि महर्षि कश्यप ने शनि स्त्रोत के एक मंत्र में उन्हें महाबली और ग्रहों का राजा बताया है. मंत्र- ‘सौरिग्रहराजो महाबला:।’ धार्मिक ग्रंथों में ऐसा वर्णन मिलता है कि, शनि देव ने शिवजी की अराधना और तपस्या कर नवग्रहों में सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया. यहां पढ़ें शनि जयंती की संपूर्ण कथा-
शनि देव के जन्म की कथा (Shani Dev Janm Katha )
पौराणिक कथा के अनुसार, राजा दक्ष की कन्या संज्ञा का विवाह सूर्य देव से हुआ. संज्ञा सूर्य के तेज से परेशान रहती थीं और विवाह के बाद से ही वह सूर्य के तेज से बचने का प्रयास करती थी एक बा संज्ञा ने अपनी कठिन तपस्या से अपना की प्रतिरूप तैयार किया, जिसे संवर्णा कहा जाता है. संज्ञा की परछाई होने के कारण इसे छाया भी कहा जाता है. संज्ञा छाया को रखकर स्वयं वन चली गई. लेकिन सूर्य देव को इसकी कोई भनक नहीं थी, उनके साथ संज्ञा नहीं बल्कि छाया रह रही हैं.
मां के अपमान से क्रोधित हुए शनि
इस बीच छाया ने तीन संतानो मनु, शनि देव और भद्रा को जन्म दिया. कहा जाता है कि, शनि देव जब छाया के गर्भ में थे तब भी छाया ने धूप और गर्मी में अन्न-जल का त्याग कर शिव की तपस्या की, जिसका असर छाया के गर्भ में पल रहे शिशु पर पड़ा. सूर्य की तपिश और कठिन तपस्या से शिशु का रंग काला हो गया. जन्म के बाद जब सूर्य देव ने शनि को देखा तो उनका काला रंग देख बहुत क्रोधित हो गए और छाया के चरित्र पर संदेह करते हुए शनि को अपना पुत्र मानने से इंकार कर दिया. इसके बाद से ही शनि और सूर्य के बीच पिता-पुत्र का संबंध होने के बावजूद शत्रुता का भाव है.

शिव ने दिया न्यायाधीश बनने का अधिकार
शनि देव से माता छाया का अपमान सहन नहीं हुआ और उन्होंने शिव जी की कठोर तपस्या की. शनि देव की तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें वरदान मांगने को कहा. शनि ने प्रार्थना करते हुए कहा- हे महादेव! युगों-युगों से मेरी माता छाया पराजय हुई हैं, उन्हें मेरे पिता सूर्य द्वारा भी अपमानित होना पड़ा. आप मुझे मेरे पिता से अधिक शक्तिशाली होने का वरदान प्रदान करें. तब शिवजी ने शनि को वरदान दिया कि, आज से नवग्रहों में तुम्हारा स्थान सर्वश्रेष्ठ रहेगा और तुम पृथ्वीलोक के न्यायाधीश और दंडाधिकारी कहलाओगे. तुमने साधारण मानव ही नहीं बल्कि देवता, असुर, सिद्ध, विद्याधर और नाग भी भय रखेंगे.

शनि की वक्र दृष्टि से नहीं बच पाए सूर्य
शिव से शक्ति पाकर शनि देव ने अपनी वक्र दृष्टि पिता सूर्य पर डाली, जिससे सूर्य देवता काले पड़ गए और उन्हें कुष्ठ रोग हो रहा. घबराकर सूर्य तुरंत शिव की शरण में पहुंचे. तब भगवान शिव ने सूर्य को उनकी गलती का अहसास कराया और उनका असली रूप वापिस किया. सूर्य को छाया और शनि के साथ किए दुर्व्यवहार पर बहुत पश्चाताप हुए. लेकिन इस घटना के बाद से युगों-युगों तक पित्रा-पुत्र से संबंध खराब हो गए.

शनि देव का परिचय
पिता- सूर्य देव, माता- छाया (स्वर्णा), भाई बहन- यमराज, वैवस्वत मनु, यमुना और भद्रा
शनि देव का स्वरूप- इंद्रनीलमणि की तरह चमकती काली छाया, सिर पर स्वर्ण का मुकुट और वाहन में गिद्ध, कौआ और भैंसा. अस्त्र में मुख्य रूप से बाण और त्रिशूल.
शनि देव के अन्य नाम- यमाग्रम यानी यम का बड़ा भाई, छायात्मज यानी छाया पुत्र, पंगु, क्रूर, कुशांग, असिलसौरी.
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