2,500 साल पुराना थ्यूसीडाइड्स ट्रैप क्या है? US-चीन की हर मुलाकात में क्यों गूंजता यह खौफनाक शब

2,500 साल पुराना थ्यूसीडाइड्स ट्रैप क्या है? US-चीन की हर मुलाकात में क्यों गूंजता यह खौफनाक शब


जब भी चीन और अमेरिका के बीच कोई बड़ी मीटिंग होती है, तो एक टर्म बार-बार उछलता है- ‘थ्यूसीडाइड्स ट्रैप’. ये कोई नया खेल का नियम नहीं है, बल्कि 2,500 साल पुराना इतिहास का एक ऐसा कड़वा सच है, जो आज भी दुनिया की दो सबसे बड़ी ताकतों के बीच तनाव को बयान करता है. आइए इसे बिना किसी लाग-लपेट के समझते हैं…

थ्यूसीडाइड्स नाम आया कहां से?

ये पूरा आइडिया ग्रीस के एक पुराने इतिहासकार थ्यूसीडाइड्स की किताब से आता है. उन्होंने करीब 400 ईसा पूर्व में एथेंस और स्पार्टा के बीच हुए ‘पेलोपोनेसियन युद्ध’ की बहुत बारीकी से स्टडी की थी. उस वक्त एथेंस तेजी से उभर रहा था और उसकी बढ़ती ताकत ने पुरानी सुपरपावर स्पार्टा के मन में डर पैदा कर दिया. थ्यूसीडाइड्स ने तब एक लाइन लिखी जो आज भी बिल्कुल फिट बैठती है, ‘यह युद्ध इसलिए जरूरी हो गया क्योंकि एथेंस की बढ़ती हुई ताकत ने स्पार्टा में डर पैदा कर दिया था.’

सीधे शब्दों में कहें तो, जब भी कोई उभरती हुई ताकत (जैसे आज चीन) किसी मौजूदा सत्ताधारी ताकत (जैसे अमेरिका) को चुनौती देने लगती है, तो उनके बीच टकराव होने का खतरा बहुत ज्यादा बढ़ जाता है. यही थ्यूसीडाइड्स ट्रैप है. ये कोई कानून नहीं है, बल्कि इतिहास का एक बार-बार दोहराया जाने वाला खतरनाक पैटर्न है.

12 केस में सीधा युद्ध छिड़ा

इस मामले के सबसे बड़े जानकार हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ग्राहम एलीसन ने बीते 500 सालों के इतिहास की गहराई से स्टडी की. उन्होंने पिछले 500 सालों में ऐसे कुल 16 केस स्टडी किए जहां एक उभरती शक्ति ने एक स्थापित शक्ति को सीधी टक्कर दी. एलीसन की किताब ‘डेस्टिन्ड फॉर वॉर: कैन अमेरिका एंड चाइना एस्केप थ्यूसीडाइड्स ट्रैप’ में चौंकाने वाली बात ये है कि उन 16 में से 12 मामलों में तो सीधा युद्ध छिड़ गया. यानी टकराव की संभावना 75 प्रतिशत तक रही. सिर्फ 4 मामले ऐसे थे जहां खून-खराबा नहीं हुआ और वो भी इसलिए क्योंकि उन देशों ने बहुत सूझबूझ और कूटनीति से काम लिया.

अमेरिका और चीन पर क्यों हो रही है इसे लेकर चर्चा?

आज की तारीख में देखें तो अमेरिका दुनिया की नंबर वन इकोनॉमी है, लेकिन चीन की रफ्तार उसे सांसत में डाल रही है. चीन दुनिया की फैक्ट्री बनकर उभरा है. 1990 में उसकी GDP सिर्फ 361 बिलियन डॉलर थी, जो 2025 तक 20 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा हो गई. PPP के आधार पर चीन पहले से ही दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. अमेरिका अभी भी नाममात्र GDP में आगे है, लेकिन चीन तेजी से पकड़ रहा है.

2023 में अमेरिका की GDP करीब 27.36 ट्रिलियन डॉलर थी, जबकि चीन की GDP लगभग 17.79 ट्रिलियन डॉलर रही. इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड यानी IMF के मुताबिक, चीन की अर्थव्यवस्था 2030 के आसपास अमेरिका को पीछे छोड़ सकती है. बस यही आंकड़ा स्पार्टा वाले डर की असली जड़ है. अमेरिका को लगता है कि सिर्फ अर्थव्यवस्था ही नहीं, 5G और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी टेक्नोलॉजी में, और दक्षिण चीन सागर में सैन्य ताकत के मामले में भी चीन उसे कड़ी चुनौती दे रहा है. यही वजहें है कि दोनों देशों के नेताओं की हर मुलाकात में ये ‘ट्रैप’ याद दिलाया जाता है कि कहीं आगे निकलने का ये जुनून दुनिया को किसी बड़ी जंग की तरफ तो नहीं धकेल रहा.

2026 में अमेरिका का रक्षा बजट लगभग 831-954 बिलियन डॉलर है, जो दुनिया के अगले 6-7 देशों के कुल से ज्यादा है. चीन का आधिकारिक बजट करीब 277-336 बिलियन डॉलर (7% बढ़ोतरी के साथ), लेकिन PPP और वास्तविक खर्च के अनुमान 500 बिलियन डॉलर से ऊपर जाते हैं. चीन की नौसेना अब जहाजों की संख्या में दुनिया की सबसे बड़ी है. ताइवान, दक्षिण चीन सागर और इंडो-पैसिफिक में तनाव बढ़ रहा है.

तो क्या लड़ाई तय है?

बिल्कुल नहीं. प्रोफेसर एलीसन खुद कहते हैं कि ट्रैप अनिवार्य नहीं है, बशर्ते लीडरशिप समझदारी दिखाए. जिस तरह शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ ने सीधी लड़ाई से बचने के लिए कूटनीति और संवाद के रास्ते खोल रखे थे, ठीक वैसे ही आज की स्थिति में लगातार बातचीत ही इकलौता रास्ता है. यही वजह है कि जब भी चीन और अमेरिका के बीच डायलॉग होता है, उस दौरान ये चर्चा तेज हो जाती है कि दोनों देश इस ट्रैप की चपेट में आने से बचने के लिए क्या-क्या कदम उठा रहे हैं.

13 मई 2026 में बीजिंग में ट्रंप-शी जिनपिंग की मुलाकात हुई. शी जिनपिंग ने खुलकर कहा, ‘दुनिया एक नई क्रॉसरोड पर पहुंच गई है. क्या चीन और अमेरिका थ्यूसीडाइड्स ट्रैप को पार कर सकते हैं और बड़े देशों के बीच संबंधों का नया मॉडल बना सकते हैं?’ ट्रंप ने रिश्ते को ‘मजबूत’ बताया, लेकिन दोनों तरफ आर्थिक, तकनीकी और सुरक्षा मुद्दे (ट्रेड, टेक, ताइवान, ईरान) गहरे हैं. एलिसन मानते हैं कि आज भी दोनों देशों के बीच गहरे आर्थिक संबंध (ट्रेड, निवेश) और परमाणु हथियार युद्ध को महंगा बनाते हैं. ये सिर्फ एक टर्म नहीं, बल्कि एक आइना है जो दिखाता है कि दुनिया की बड़ी ताकतों को आज कितनी समझदारी की जरूरत है.



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