यौम-ए-अरफा आज या कल कब रहेगा, बकरीद से पहले क्यों खास है अरफा और अराफात

यौम-ए-अरफा आज या कल कब रहेगा, बकरीद से पहले क्यों खास है अरफा और अराफात


Bakrid 2026: इस्लामिक चंद्र कैलेंडर का आखिरी महीना जिलहिज्जा बकरीद और हज यात्री के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है. बकरीद इस्लाम के पवित्र त्योहार है और हज सऊदी अरब की वार्षिक तीर्थयात्रा है, जिसे इस्लाम में हर सक्षम मुसलमानों के लिए अनिवार्य माना जाता है.

इस साल भारत में बकरीद 28 मई और सऊदी में एक दिन पहले यानी 27 मई को मनाई जाएगी. वहीं हज यात्रा की शुरुआत 25 मई से हो चुकी है. हज यात्रा के 5-6 दिनों में अरफा का दिन सबसे अहम माना जाता है. इस दिन दुनियाभर से लाए लाखओं हज तीर्थयात्री अराफात के पास स्थित ऐतिहासिक मैदान और पहाड़ के पास इकट्ठा होते हैं और इबादत-दुआ करते हैं. आइए जानते हैं बकरीद से एक दिन पहले अरफा और अराफात के बारे में.

अरफा और अराफात में अंतर

अरफा और अराफात बकरीद या ईद-उल-अजहा से एक दिन पहले होती है. आमतौर पर लोग इसे एक ही मान लेते हैं, लेकिन यौम-ए-अरफा और अराफात में अंतर होता है. अरफा और अराफात में सबसे बड़ा अंतर यह है कि, अरफा पवित्र दिन है और अराफात पवित्र स्थल.

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यौम-ए-अरफा कब है

अरफा बकरीद से एक दिन पहले होती है. हालांकि समय के अंतर के कारण अलग-अलग देशों में चांद दिखने की तारीख में अंतर के साथ अरफा का दिन भी बदल सकता है. इस साल भारत में 28 मई को बकरीद मनाई जाएगी. इसलिए भारत में 27 मई को अरफा का दिन रहेगा, जबकि सऊदी में आज 26 मई को अरफा का दिन है. अरफा के दिन लोग दुआ और इबादत में समय बिताते हैं और जो मुसलमान हज यात्रा नहीं करते, वे रोजा (यौम-ए-अरफा) भी रखते हैं.

अरफा मुसलमानों के लिए इबादत, चिंतन और अल्लाह से दया पाने का अवसर है. अरफा के दिन की दुआ-ला इलाहा इल-अल्लाहुवदहु ला शारिका लाहलाहुल-मुल्कू वा लाहुल-हम्दुवा हुवा अला कुल्ली शायिन कादिर.

अराफात क्या होता है

अराफात सऊदी के पास मक्का में ग्रैंड मस्जिद से करीब 20 किमी की दूरी पर स्थित वह पवित्र स्थल (Mount Arafat) है, जहां मान्यता है कि, पैगंबर मोहम्मद ने आखिरी उपदेश दिया था. आरफा के दिन इसी पवित्र स्थल पर हज तीर्थयात्री इकट्ठा होकर प्रार्थना करते हैं.

अरफा और आफरात के बाद मनाया जाएगा बकरीद

अरफा और आफरात के बाद जिलहिज्जा की 10वीं तारीख को बकरीद मनाया जाती है. बकरीद का त्योहार हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम की कुर्बानी की याद में मनाया जाता है. इस्लामी मान्यता के अनुसार, अल्लाह के हुक्म पर उन्होंने अपने बेटे की कुर्बानी देने का फैसला किया था. उनकी इसी आज्ञाकारिता से खुश होकर अल्लाह ने बेटे की जगह एक दुम्बा भेज दिया, तब से कुर्बानी की परंपरा चली आ रही है.

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