Krishna Janmashtami 2026: जन्माष्टमी 4 सितंबर को मनाई जाएगी. द्वापर युग में बाल गोपल के जन्म की कहानी तो आपने कई बार सुनी होगी लेकिन क्या आप कान्हा के नामकरण की रोचक कहानी जानते हैं.
लड्डू गोपाल का नामकरण किसी राजमहल में भव्य आयोजन के साथ नहीं हुआ था ? श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार ये संस्कार बेहद गुप्त तरीके से कराया गया था और इसके पीछे सबसे बड़ा कारण था मथुरा का अत्याचारी राजा कंस.
श्रीकृष्ण के नामकरण से जुड़ा रहस्य
कथा के अनुसार श्रीकृष्ण का जन्म देवकी और वसुदेव के यहां मथुरा की कारागार में हुआ. कंस को आकाशवाणी से पता चल चुका था कि देवकी का आठवां पुत्र उसकी मृत्यु का कारण बनेगा. इसलिए कृष्ण के जन्म के तुरंत बाद वसुदेव उन्हें गोकुल में नंद बाबा के घर पहुंचा आए. श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में वसुदेव के कृष्ण को नंद के घर ले जाने और वहां यशोदा की शय्या पर उन्हें रखने का वर्णन मिलता है.
गोकुल पहुंचने के बाद नंद बाबा ने कृष्ण के जन्म का उत्सव मनाया. भागवत में नंद के घर हुए जन्मोत्सव और वैदिक मंत्रों के साथ जातकर्म संस्कार का भी उल्लेख है. बाद में कृष्ण और बलराम के नामकरण संस्कार की बारी आई.
इसी दौरान यदुवंश के कुलपुरोहित गर्गाचार्य गोकुल पहुंचे. नंद बाबा ने उनसे अपने दोनों बालकों के संस्कार और नामकरण का अनुरोध किया लेकिन गर्गाचार्य ने एक बड़ी चिंता जताई. वे यदुवंश के पुरोहित के रूप में प्रसिद्ध थे. यदि वे खुले तौर पर नंद के घर दोनों बच्चों का संस्कार करते तो कंस को संदेह हो सकता था कि ये बच्चे वास्तव में वसुदेव और देवकी से जुड़े हैं. भागवत में गर्गाचार्य स्पष्ट कहते हैं कि ऐसा होने पर कंस कृष्ण को देवकी-वसुदेव का पुत्र समझकर उन्हें मारने का प्रयास कर सकता है.
इसी कारण नामकरण को गुप्त रखा गया. नंद बाबा ने गर्गाचार्य से कहा कि वे किसी को बताए बिना, उनके घर की गौशाला में वैदिक मंत्रों के साथ संस्कार करें. इसके बाद भागवत के श्लोक 10.8.11 में कहा गया है कि गर्गाचार्य ने दोनों बालकों का नामकरण गूढो रहसि, यानी गुप्त रूप से और एकांत स्थान में किया.
गर्गाचार्य ने रोहिणी के पुत्र का नाम राम बताया और उनके असाधारण बल के कारण उन्हें बल तथा बलदेव कहा. इसके बाद नंद के पुत्र के लिए उन्होंने कृष्ण नाम बताया. उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यह बालक पहले अनेक रूपों और वर्णों में प्रकट हो चुका है और विद्वान इसे वासुदेव नाम से भी जानते हैं. गर्गाचार्य ने नंद को कृष्ण के दिव्य स्वरूप और भविष्य के बारे में संकेत तो दिए, लेकिन सब कुछ सार्वजनिक नहीं किया.
FAQ
क्या गर्गाचार्य ने नामकरण के समय कंस से कृष्ण का सच छिपाया था?
हां, नामकरण को गुप्त रखने की मुख्य वजह यही थी कि कंस को कृष्ण की वास्तविक पहचान का पता न चले. गर्गाचार्य ने नंद को सावधानी बरतने की सलाह दी थी.
गर्गाचार्य ने कृष्ण के नामकरण में कौन-सा बड़ा संकेत दिया था?
उन्होंने बताया कि यह बालक पहले भी अलग-अलग रूपों और वर्णों में प्रकट हो चुका है. इस बार इसका वर्ण श्याम है, इसलिए इसका नाम कृष्ण होगा.
क्या नामकरण के समय ही कृष्ण की दिव्यता का संकेत मिल गया था?
हां. गर्गाचार्य ने नंद को बताया कि कृष्ण साधारण बालक नहीं हैं और उनकी विशेष शक्तियों का संकेत दिया. हालांकि यह बात सार्वजनिक नहीं की गई.
कृष्ण के नामकरण में ‘वासुदेव’ नाम का क्या रहस्य था?
गर्गाचार्य ने कहा कि विद्वान इस बालक को वासुदेव नाम से भी जानते हैं. यह संकेत बेहद महत्वपूर्ण था, क्योंकि कृष्ण वास्तव में वसुदेव के पुत्र थे और उनकी पहचान कंस से छिपाई जा रही थी.
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