Janmashtami 2026: कृष्ण जन्माष्टमी पर बहुत से भक्त दिनभर उपवास रखते हैं. कुछ लोग फलाहार करते हैं तो कुछ रात में कान्हा के जन्म तक अन्न-जल ग्रहण नहीं करते. लेकिन इस बार कई घरों में बुखार, खांसी, गले में दर्द और शरीर टूटने जैसी परेशानियां बनी हुई हैं. ऐसे में सवाल है कि बीमार व्यक्ति जन्माष्टमी का व्रत कैसे रखे? क्या दवा लेने या पानी पीने से व्रत टूट जाएगा?
हाल में एक सर्वे में दिल्ली-NCR के 54 प्रतिशत परिवारों ने बताया कि उनके घर में कम से कम एक सदस्य Flu या viral fever जैसे लक्षणों से परेशान है. सभी मामलों में Flu की चिकित्सकीय पुष्टि नहीं. फिर भी जन्माष्टमी से पहले यह स्थिति स्वास्थ्य को नजरअंदाज न करने की चेतावनी देती है.
व्रत का अर्थ शरीर को बीमार करना नहीं
व्रत का उद्देश्य केवल भूखा-प्यासा रहना नहीं है. इसका संबंध इंद्रियों पर संयम, सात्त्विक आचरण, भगवान का ध्यान और मन की शुद्धि से है. इसलिए व्रत रखते हुए शरीर की क्षमता का ध्यान रखना भी आवश्यक है.
श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय के 16वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं ‘नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः.’ इसका अर्थ है कि बहुत अधिक खाने वाले या बिल्कुल न खाने वाले व्यक्ति के लिए भी योग सिद्ध नहीं होता. भगवान कृष्ण साधना में संतुलन का संदेश देते हैं. शरीर की स्थिति की अनदेखी करके किया गया कठिन उपवास ही भक्ति का एकमात्र रास्ता नहीं है.
बुखार में निर्जला व्रत क्यों पड़ सकता है भारी?
बुखार आने पर शरीर का तापमान बढ़ता है. पसीना आने और पर्याप्त पानी न पीने से शरीर में पानी की कमी हो सकती है. उल्टी या दस्त भी हों तो dehydration का खतरा और बढ़ जाता है.
Flu में अचानक बुखार, ठंड लगना, खांसी, गले में दर्द, सिरदर्द, शरीर में दर्द और थकान जैसे लक्षण हो सकते हैं. हर बुखार Flu नहीं होता. सही कारण जानने के लिए डॉक्टर की सलाह जरूरी हो सकती है.
बीमार व्यक्ति अगर दिनभर पानी भी न पिए तो चक्कर, कमजोरी, मुंह सूखना और पेशाब कम होने जैसी समस्या हो सकती है. Centers for Disease Control and Prevention (CDC) के अनुसार Flu सभी उम्र के लोगों में dehydration पैदा कर सकता है और पहले से मौजूद बीमारी को बिगाड़ सकता है.
बीमारी में जन्माष्टमी का व्रत कैसे रखें?
स्वस्थ व्यक्ति अपनी श्रद्धा और पारिवारिक परंपरा के अनुसार निर्जला या फलाहार व्रत चुन सकता है. लेकिन बुखार, Flu जैसे लक्षण या अत्यधिक कमजोरी हो तो निर्जला रहने का संकल्प न लें.
ऐसी स्थिति में यथाशक्ति व्रत किया जा सकता है. दिनभर अन्न छोड़कर पानी, नारियल पानी, फल या डॉक्टर द्वारा अनुमत हल्का सात्त्विक आहार लिया जा सकता है. यदि दूध या मीठे फल से परेशानी होती है तो केवल धार्मिक सूची देखकर उनका सेवन न करें. अपनी बीमारी और डॉक्टर की सलाह को प्राथमिकता दें.
दवा भोजन के बाद लेने के लिए कही गई है तो खाली पेट दवा न लें. दवा का समय बदलने या dose छोड़ने का फैसला स्वयं न करें. Diabetes, kidney, heart, liver या दूसरी पुरानी बीमारी वाले लोग अपने डॉक्टर से पूछकर ही उपवास का स्वरूप तय करें.
दवा खा ली तो क्या व्रत टूट जाएगा?
धार्मिक परंपराओं में व्रत के नियम परिवार और सम्प्रदाय के अनुसार अलग हो सकते हैं. लेकिन बीमारी में दवा लेना धर्म के विरुद्ध नहीं माना जाना चाहिए. जीवन और स्वास्थ्य की रक्षा सबसे पहले है.
अगर दवा के साथ कुछ खाना जरूरी है तो फलाहार अथवा चिकित्सक द्वारा बताया गया भोजन लिया जा सकता है. इसके बाद भी व्यक्ति कान्हा का नाम-जप, गीता पाठ, भजन और पूजा कर सकता है.
कठोर निर्जला व्रत संभव न हो तो मानसिक संकल्प लें. अन्न और तामसिक भोजन छोड़ें. क्रोध, झूठ और कटु वचन से बचें. ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जप करें. रात में स्वास्थ्य अनुमति दे तो लड्डू गोपाल की पूजा में शामिल हों.
इन लोगों को विशेष सावधानी रखनी चाहिए
छोटे बच्चों से पूरे दिन निर्जला व्रत कराने की जिद न करें. बुजुर्ग, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाएं भी कठोर उपवास से पहले डॉक्टर की सलाह लें.
Diabetes वाले लोगों में खाली पेट रहने से blood sugar घट या बढ़ सकता है. Kidney और heart की बीमारी में पानी की मात्रा भी चिकित्सकीय स्थिति के अनुसार तय होती है. इसलिए सभी लोगों को एक जैसा ‘ज्यादा पानी पीएं’ वाली सलाह देना भी उचित नहीं.
अगर शरीर पहले ही बुखार और संक्रमण से लड़ रहा है तो उसे पर्याप्त आराम चाहिए. रातभर जागरण करने से कमजोरी बढ़ती हो तो पूजा के बाद विश्राम करें. भक्ति को नींद और शरीर को नुकसान पहुंचाने की प्रतियोगिता न बनाएं.
ये लक्षण दिखें तो व्रत छोड़कर मदद लें
सांस लेने में परेशानी, सीने में दर्द, लगातार चक्कर, भ्रम, बेहोशी, पेशाब बहुत कम होना, होंठ नीले पड़ना या बुखार-खांसी ठीक होकर दोबारा बिगड़ना खतरे के संकेत हो सकते हैं. बच्चों में तेजी से सांस चलना, सुस्ती, पानी न पी पाना और आठ घंटे तक पेशाब न होना भी गंभीर संकेत हैं. ऐसी स्थिति में व्रत जारी रखने के बजाय तुरंत चिकित्सा सहायता लें.
कान्हा तक पहुंचती है भक्त की भावना
जन्माष्टमी का व्रत श्रद्धा का विषय है, शरीर को संकट में डालने की परीक्षा नहीं. बीमार व्यक्ति पानी पीकर, दवा लेकर या हल्का सात्त्विक भोजन करके भी कृष्ण जन्मोत्सव में शामिल हो सकता है.
पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डॉक्टर अनीष व्यास बताते हैं कि भगवान के सामने अपनी स्थिति बताकर यथाशक्ति व्रत का संकल्प लें. स्वस्थ होने पर किसी दूसरे दिन सेवा, दान या नाम-जप कर सकते हैं. निर्जला न रह पाने का अपराधबोध न रखें. जन्माष्टमी पर कान्हा तक भूख-प्यास की कठोरता से पहले भक्त की सच्ची भावना पहुंचती है.
FAQ
1. Flu या बुखार में जन्माष्टमी का व्रत रखना चाहिए?
निर्जला व्रत रखने के बजाय डॉक्टर की सलाह से जलाहार, फलाहार या हल्का सात्त्विक भोजन लिया जा सकता है.
2. दवा खाने से जन्माष्टमी का व्रत टूट जाता है?
बीमारी में दवा लेना आवश्यक है. दवा या भोजन का समय स्वयं न बदलें. धार्मिक परंपरा के अनुसार मानसिक अथवा फलाहार व्रत रखा जा सकता है.
3. जन्माष्टमी पर निर्जला व्रत किन लोगों को नहीं रखना चाहिए?
बुखार से पीड़ित, कमजोर, बुजुर्ग, छोटे बच्चे, गर्भवती महिलाएं और chronic illness वाले लोग डॉक्टर से सलाह लिए बिना निर्जला व्रत न रखें.
4. बीमारी में जन्माष्टमी की पूजा कैसे करें?
घर में रहकर नाम-जप, गीता पाठ, भजन और यथाशक्ति लड्डू गोपाल की पूजा की जा सकती है.
Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.






