Sheetla Saptami 2026: सनातन धर्म में शीतला सातम (बसौड़ा) का पर्व आरोग्य, स्वच्छता और शीतलता का प्रतीक माना जाता है. चैत्र और भाद्रपद दोनों महीनों में पड़ने वाली शीतला सप्तमी पर घरों में चूल्हा जलाने की मनाही होती है. इस दिन मां शीतला को एक दिन पहले बने यानी बासी भोजन (बसौड़ा) का नैवेद्य अर्पित किया जाता है और पूरा परिवार वही प्रसाद ग्रहण करता है.
पंचांग के अनुसार शीतला सातम दो प्रमुख अवसरों पर मनाई जाती है:
बासी भोजन (बसोड़ा) का भोग क्यों लगाया जाता है?
धार्मिक मान्यता: स्कंद पुराण के अनुसार, मां शीतला चेचक, खसरा, फोड़े-फुंसी और दाह (जलन) जैसे संक्रामक रोगों से रक्षा करती हैं. देवी का स्वरूप अत्यंत शीतल है, इसलिए उन्हें गर्म या ताजा पका हुआ भोजन अर्पित करने से उनका प्रकोप बढ़ने की मान्यता है. उन्हें शांत और प्रसन्न रखने के लिए केवल ठंडा व बासी नैवेद्य ही चढ़ाया जाता है.
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: शीतला सातम ऋतु परिवर्तन (सर्दियों के अंत और गर्मियों की शुरुआत) के समय आती है. आयुर्वेद के अनुसार, इस संधिकाल के बाद मौसम गर्म होने लगता है और बासी खाना बैक्टीरिया के कारण खराब होने लगता है. यह पर्व संकेत देता है कि इस दिन के बाद से पूरे ग्रीष्मकाल में बासी भोजन का त्याग कर केवल ताजा व सुपाच्य भोजन ही करना चाहिए.
मां शीतला की सही पूजा विधि
पूर्व तैयारी (षष्ठी की रात): सप्तमी से ठीक एक शाम पहले रसोई की अच्छी तरह सफाई करें. इसके बाद मीठे चावल (ओलिया), बाजरे की रोटी, पूड़ी, गुलगुले, दही और बेसन की पकौड़ी बनाकर रख लें.
सुबह का संकल्प: शीतला सातम के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर ठंडे पानी से स्नान करें.
पूजा सामग्री: थाली में रोली, अक्षत, हल्दी, काजल, मौली, नीम की पत्तियां और एक दिन पहले बना भोग सजाएं.
अर्पण व पूजन: मंदिर या घर पर माता की प्रतिमा के सामने जल अर्पित करें. माता को हल्दी व रोली का तिलक लगाकर बासी पकवानों का भोग लगाएं.
नेत्र व मस्तक स्पर्श: पूजा के बाद लोटे के बचे हुए जल से परिवार के सदस्यों की आंखों और सिर पर छींटें मारें. मान्यता है कि इससे नेत्र रोग और मौसमी ज्वर नहीं होते.
शीतला सातम पूजा के कड़े नियम
क्या करें:
- ठंडे पानी से स्नान: सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सामान्य या ठंडे पानी से ही स्नान करें.
- नीम के पत्तों का प्रयोग: पूजा की थाली और जल के लोटे में नीम की पत्तियां जरूर रखें; नीम शीतलता और कीटाणुरोधक गुण देता है.
- बासी भोजन का सेवन: एक दिन पहले (षष्ठी को) बना ठंडा भोजन ही पूरे परिवार के साथ ग्रहण करें.
- दहलीज और पशुओं को भाग: पूजा के बाद घर की मुख्य चौखट पर जल छिड़कें और पहला भोग गाय, कुत्ते या पक्षियों को अर्पित करें.
- सफाई और शांति: घर में शीतलता, स्वच्छता और शांति का वातावरण बनाए रखें.
क्या न भूलकर भी करें:
- चूल्हा या गैस जलाना: घर की रसोई में गैस, ओवन, हीटर या चूल्हा बिलकुल न जलाएं.
- गर्म या ताजा भोग लगाना: माता शीतला को किसी भी प्रकार का गर्म, ताजा पका हुआ भोजन या गर्म पानी न चढ़ाएं.
- तड़का या छौंक लगाना: रसोई में तेल, घी, हींग या राई का छौंक लगाना पूरी तरह वर्जित है.
- बाल धोना या कटवाना: इस दिन महिलाओं का सिर धोना, बाल कटवाना या नाखून काटना शास्त्रसम्मत नहीं माना जाता.
- सुई-धागे का प्रयोग: सिलाई-कढ़ाई या नुकीली चीजों के इस्तेमाल से बचें.
शीतला सप्तमी की पौराणिक कथा और मां शीतला के सिद्ध मंत्र
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, शीतला सप्तमी के व्रत का फल तभी पूर्ण माना जाता है जब पूजन के बाद इसकी व्रत कथा सुनी जाए और देवी के वैदिक व पौराणिक मंत्रों का जप किया जाए.
शीतला सप्तमी की पौराणिक व्रत कथा
प्राचीन काल में एक गांव में एक बुढ़िया अपनी दो बहुओं के साथ रहती थी. शीतला सप्तमी के दिन दोनों बहुओं के मन में विचार आया कि बासी भोजन खाने से उनके छोटे बच्चे बीमार न पड़ जाएं. इसलिए उन्होंने सास से छुपकर बच्चों के लिए ताजा भोजन पका लिया और माता को बासी भोग लगाने के बजाय घर में चूल्हा जला दिया.
माता का प्रकोप: इस कृत्य से शीतला माता अत्यंत कुपित हुईं. क्रोधवश माता के प्रकोप से दोनों बहुओं के बच्चों की देह में तेज दाह (जलन) उत्पन्न हुआ और वे चेचक की चपेट में आकर प्राणहीन हो गए.
माता की खोज: शोकाकुल बहुओं को जब अपनी भूल का अहसास हुआ, तो वे अपने मृत बालकों को लेकर विलाप करती हुई जंगल की ओर भागीं. रास्ते में उन्हें दो बहनें (ओरी और शीतला) सिर में भीषण खुजली व जलन से पीड़ित मिलीं.
सेवा और प्रायश्चित: बड़ी बहू ने श्रद्धापूर्वक उन दोनों के सिर में ठंडी छाछ डाली और नीम की पत्तियों से हवा की, जिससे उनके सिर की जलन शांत हुई.
वरदान: शीतलता मिलते ही माता अपने वास्तविक दिव्य स्वरूप में प्रकट हुईं. बहुओं ने रोते हुए अपने अपराध की क्षमा मांगी. माता ने प्रसन्न होकर उनके मृत बालकों को पुनः जीवनदान दिया और वरदान दिया कि जो भी चैत्र या भाद्रपद मास में इस दिन ठंडा भोजन करेगा और चूल्हा नहीं जलाएगा, उसके कुल में चेचक, ज्वर और नेत्र विकार नहीं फैलेंगे.
मां शीतला के प्रमुख मंत्र
शीतला ध्यान मंत्र (स्कंद पुराणोक्त) पूजा के आरंभ में माता के स्वरूप का ध्यान करने के लिए इस श्लोक का उच्चारण करें:
वन्देहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम्.
मार्जनीकलशोपेतां शूर्पालंकृतमस्तकाम्॥
अर्थ: मैं गर्दभ (गधे) पर सवार, दिगंबरा, हाथों में झाड़ू व अमृत कलश धारण करने वाली और मस्तक पर सूप (सूपड़ा) सजाए हुए भगवती शीतला की वंदना करता हूं.
मुख्य बीज मंत्र (जप हेतु) किसी भी संक्रामक रोग, त्वचा विकार या मानसिक अशांति से मुक्ति के लिए 108 बार जपें:
ॐ ह्रीं श्रीं शीतलायै नमः॥
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