Vat Savitri Vrat 2026 Katha: आज वट सावित्री व्रत है. स्त्रियां इस दिन पति की दीर्धायु और सुखी दांपत्य जीवन के लिए व्रत रखकर बरगद यानी वट वृक्ष की पूजा करती हैं. मान्यता है कि इस व्रत के प्रताप से सुहाग पर आने वाले समस्त संकट टल जाते हैं और वैवाहिक जीवन में सुख बना रहता है. वट सावित्री व्रत कथा के बिना अधूरा हैं यहां देखें इसकी संपूर्ण कथा.
वट सावित्री व्रत की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार सनत्कुमार निवेदन करते हैं, हे भगवान शिव यदि कुलीन स्त्रियों को अखण्ड सौभाग्य, महाभाग्य तथा पुत्र-पौत्र आदि का सुख प्रदान करने वाला व्रत हो, तो कृपा करके उसका वर्णन करें? भगवान शिव ने कहा, मद्र देश में अश्वपति नाम का एक राजा था.
अश्वपति अत्यन्त धर्मात्मा, ज्ञानी, वीर तथा वेद-वेदांगों का ज्ञाता था. अति बलशाली और समस्त प्रकार के ऐश्वर्यों से युक्त होते हुये भी राजा के जीवन में सन्तान का अभाव था. सन्तान प्राप्ति के उद्देश्य से राजा अपनी धर्मपत्नी सहित विभिन्न प्रकार से तप, पूजा तथा आराधना करने लगा. राजा अश्वपति देवी सावित्री के मन्त्रों का जप करता था तथा उनके निमित्त भक्तिपूर्व आहुति अर्पित करता था.
राजा अश्वपति को मिला संतान प्राप्ति का वरदान
हे सनत्कुमार! राजा की आराधना से देवी प्रसन्न हुयीं तथा कृपा करके उसे वरदान देने हेतु प्रकट हो गयीं. देवी मां ने कहा, हे राजन् मैं तुम्हारी भक्ति से अति प्रसन्न हूं, तुम इच्छित वर की कामना करो. देवी के श्री मुख से यह वचन सुन राजा हर्षपूर्वक बोला हे देवि मैं निःसन्तान हूं, मेरी कोई सन्तति नहीं है, मैं एक उत्तम पुत्र का वरदान चाहता हूँ. हे जगदम्बा सावित्री! पुत्र के अतिरिक्त मेरी अन्य कोई कामना नहीं है. मुझे पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद दें माँ. देवी सावित्री ने राजा से कहा कि हे राजन् तुम्हारा कोई पुत्र नहीं है किन्तु भविष्य में एक कन्या होगी. वह स्वयं का और अपने पति दोनों के कुल का उद्धार करने वाली होगी. हे राजशार्दूल जो मेरा नाम है उस कन्या का भी वही नाम होगा.
देवी सावित्री का हुआ जन्म
राजा को सन्तान प्राप्ति का वर प्रदान करने के पश्चात देवी वहां से अन्तर्धान हो गयीं. राजा आनन्दमग्न हो गया. कुछ दिवस व्यतीत होने के उपरान्त रानी ने गर्भ धारण कर लिया 9 माह बाद एक कन्या का जन्म हुआ. जिसका नाम सावित्री ही रखा गया. अपनी पुत्री की सुंदरता देखकर राजा चिन्तित हुआ. उसकी पुत्री सावित्री के समान कोई सुन्दर नहीं था, उसके तेज के समक्ष उसे मांगने का कोई साहस ही नहीं करता था. उसका रूप एवं तेज का दर्शन कर सभी राजा स्तम्भित हो गये थे.
एक दिन राजा ने कहा पुत्री तेरे विवाह का समय आ गया है, किन्तु कोई भी तुझसे विवाह करने हेतु प्रस्ताव नहीं ला रहा है. जो भी गुणवान वर मिले और जिसके कुटुम्ब और व्यवहार से तुझे आनन्द प्राप्त हो, उससे तू स्वयं ही विवाह कर ले. यह कहकर वृद्ध मन्त्रियों तथा नाना प्रकार के वस्त्र-अलंकारों के साथ पुत्री को भेज दिया.

सावित्री ने सत्यवान को पति रूप में चुना
राजा क्षण मात्र के लिये बैठा ही था कि, उसी समय वहां देवर्षि नारद का आगमन हुआ. राजा देवर्षि नारद से वार्ता कर ही रहे थे कि, उसी समय आश्रम से कमलनयनी सावित्री उन्हीं वृद्ध मन्त्रियों सहित वहाँ उपस्थित हो गयीं. सावित्री के दर्शन कर देवर्षि नारद बोले, राजन आपकी पुत्री विवाह योग्य है इसके लिए वर क्यों नहीं खोज रहे हैं. राजा ने उत्तर दिया, मैंने सावित्री को इसी कार्य के लिए भेजा था. अभी यह लौट आयी है. इसने अपने पति का चयन स्वयं ही कर लिया है, सावित्री ने उत्तर दिया कि आश्रम में द्युमत्सेन का पुत्र सत्यवान है. मैंने उसका ही अपने पति के रूप में चयन किया है.
सावित्री के मुख से यह सुनते ही देवर्षि नारद ने कहा कि, आपकी पुत्री ने यह अत्यन्त अनुचित कार्य किया है. इसने सत्यवान के विषय में बिना कुछ ज्ञात किये ही उसका वरण कर लिया. यद्यपि वह अत्यन्त सद्गुणी है, लोकप्रिय है तथा उसके माता-पिता भी सत्यवादी हैं. वह स्वयं भी सदैव सत्य ही बोलता है, इसीलिये सत्यवान के नाम से विख्यात है. सत्यवान भी वह समस्त गुणों से सम्पन्न है. किन्तु उसका एक ही दोष उसके समस्त गुणों को न्यून कर देता है कि, एक वर्ष में उसकी आयु क्षीण हो जायेगी तथा वह देह त्याग कर देगा.
अल्पायु थे सत्यवान, फिर भी सावित्री ने किया विवाह
देवर्षि नारद के श्री मुख से यह सुनकर अश्वपति बोल पड़े, सत्यवान के अतिरिक्त तुम किसी अन्य वर से विवाह कर लो. इस पर सावित्री ने कहा कि पिता जी मैं मन से भी किसी को नहीं चाहती, जिसका मैंने वरण किया है, वही मेरा पति होगा. पहले मन से विचारकर उसका शुभ-अशुभ का विचार करना मनुष्य को पीछे करता है. इस कारण मैं मन से भी किसी अन्य पुरुष का वरण नहीं कर सकती. सगुण, निर्गुण, मूर्ख, पण्डित, दीर्घायु तथा अल्पायु आदि कुछ भी हो परन्तु मेरा पति सत्यवान ही होगा. चाहे इन्द्र ही क्यों न प्राप्त हो पर मैं किसी अन्य का वरण नहीं करूंगी. नारद जी ने राजा से कहा आप शीघ्र ही इसका विवाह करके पति के साथ भेज दें.
सावित्री ने सत्यवान का किया वरण
राजा पुत्री सावित्री और अथाह संपत्ति धन लेकर वन में गए. जहां वृद्ध और दृष्टिहीन द्युमत्सेन के पेड़ के नीचे बैठा था. द्युमत्सेन ने राजा से पधारने का कारण पूछा तथा वन के कन्द-मूल फल आदि से स्वागत-सत्कार किया. राजा ने कहा मेरी सावित्री नाम की पुत्री आपके पुत्र से प्रेम करती है. इसने स्वयं ही आपके पुत्र को अपने पति के रूप में वरा है. यह निष्पाप आपके पुत्र को अपना पति स्वीकार कर ले तथा मेरा और आपका सम्बन्ध स्थापित हो यही कामना लेकर मैं यहां उपस्थित हुआ हूं.
द्युमत्सेन ने कहा कि मैं वृद्ध और दृष्टिहीन हूं. मेरा भोजन कन्द-मूल फल आदि है. मेरा राज्य छिन गया है. मेरा पुत्र भी वन्य संसाधनों पर ही निर्वाह करता है. आपकी पुत्री वन्यजीवन के कष्टों को कैसे सहन करेगी? भला इसे इन दुखों का अर्थ कहां ज्ञात होगा. यही कारण है कि मैं इस विवाह प्रस्ताव को स्वीकार नहीं कर सकता. द्युमत्सेन के मन की दुविधा को समझते हुए राजा अश्वपति ने कहा, मेरी पुत्री ने इन सभी तथ्यों को ज्ञात कर ही सत्यवान का वरण किया है. आपके पुत्र का सानिध्य मेरी पुत्री को स्वर्ग के समान प्रतीत होगा. अश्वपति के वचनों को सुन द्युमत्सेन राजर्षि ने सावित्री और सत्यवान के विवाह के लिए समर्थन दे दिया.

पति की मृत्यु का समय निकट आया
सत्यवान भी सावित्री को पत्नी रूप में प्राप्त कर अत्यधिक हर्षित और आनन्दित हो रहा था. सावित्री के मन में अभी भी देवर्षि नारद द्वारा कहे वचन गुंजायमान हो रहे थे, इसीलिये उसने वट सावित्री व्रत करने का संकल्प ग्रहण किया. सावित्री दिन-रात व्रत में ही लीन हो गयी. तीन रात्रि पूर्ण कर पितृ देवताओं का तर्पण किया तथा सास-श्वसुर की चरण वन्दना कर पूजन किया.
सत्यवान एक विशाल कठोर कुठार लेकर वन की ओर प्रस्थान करने लगा. किसी अनहोनी की आशंका से सावित्री भी सत्यवान के साथ वन में चली गई पति की मृत्यु का समय निकट था, अतः सावित्री निरन्तर उसे ही निहार रही थी. महासती सावित्री वट वृक्ष के मूल में बैठी हुयी थी. उसी समय लकड़ी का भार उठाते हुये सत्यवान के मस्तक में तीव्र पीड़ा होने लगी और वह वट वृक्ष के समीप आ गया.
सावित्री सत्यवान की मृत्यु के समय से अवगत थी. उसे यह ज्ञात हो गया था कि, काल का आगमन हो गया है, अतः वह उसी स्थान पर बैठ गयी और सत्यवान भी उसकी गोद में मस्तक रखकर शयन करने लगा. उसी क्षण वहां यमराज उपस्थित हो गए उन्होंने कहा तेरे पति की आयु समाप्त हो गयी है. यमदेव ने सत्यवान के शरीर में पाश बांधकर दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान करने लगे.

यमराज के पीछे-पीछे चल दी सावित्री
अपने पति की मृत्यु से व्याकुल सावित्री भी यम के पीछे-पीछे चल लगी. सावित्री अपने व्रत-नियम आदि से सिद्ध हो चुकी थी और परम पतिव्रता थी, यमराज ने सावित्री से कहा पति के प्रति जो तेरा कर्तव्य था, वह तूने पूर्ण किया, जहांतक जाना सम्भव था वहां तक गयी.” सावित्री ने कहा, “जहाँ मेरे पति को ले जाया जाएगा मैं भी उनके साथ चलूंगी. सावित्री के वचन सुनकर यमराज प्रसन्न होकर बोले, सत्यवान के जीवनदान के अतिरिक्त तुझे जो भी वरदान चाहिय मांग लो मैं अवश्य पूर्ण करूंगा.
सावित्री ने मांगे 3 वरदान
- सावित्री बोली, मेरे श्वसुर राज्यविहीन होकर वनवास कर रहे हैं, वह दृष्टिहीन हो गये हैं, उन्हें नेत्र प्राप्त हो जायें तथा वह सूर्य के समान तेजस्वी एवं बलशाली हों और उनकी छीन हुआ राज्य पुनः उन्हें प्राप्त हो जाये तथा वह धर्म-कर्म कभी न त्यागें. यम ने तथास्तु कहां.
- सावित्री बोली, मेरा दूसरा वरदान यह है कि, मेरे पुत्रहीन पिता को सौ कुलवर्धक औरस पुत्र प्राप्त हों.” यम ने सावित्री की ये इच्छा भी पूरी की और कहा अब लौट जाओ, बहुत दूर आ चुकी हो.
- सावित्री ने तीसरे वरदान में कहा कि मुझे सत्यवान से ही औरस पुत्र हों, हम दोनों का बलशाली, वीर्यशाली सौ पुत्रों से सम्पन्न कुल हो. यम ने कहा, “तथास्तु! तेरा और सत्यवान का सौ पुत्रों से युक्त परिवार होगा.

वरदान मिलते ही सावित्री ने कहा कि प्रभु मैं एक पतिव्रता पत्नी हूं और आपने मुझे पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया है लेकिन आप तो मेरे पति को अपने साथ लेकर जा रहे हैं आपका ये वरदान कैसे पूरा होगा. सावित्री की इस बात से प्रभावित होकर यमराज ने सत्यवान के प्राण लौटा दिए और .लोक चले गए और सावित्री वापस वहीं आ गई जहां सत्यवान का मृत शरीर पड़ा था. यमराज के वरदान अनुसार, सत्यवान फिर जीवित खड़े हो गए.
हे ब्रह्मन्! यह हमने इस वट सावित्री व्रत का उत्तम महत्त्व सुना दिया है. इस व्रत के प्रभाव से आयु क्षीण होने पर भी पति जीवित हो उठता है. समस्त स्त्रियों को इस सौभाग्यदायक व्रत को करना चाहिये.
॥इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण में वर्णित वट सावित्री व्रत कथा सम्पूर्ण होती है॥
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