कुंभ में नागा साधुओं से पहले नहाते हैं ये दो भाले, दशहरे से क्या है इनका संबंध?

कुंभ में नागा साधुओं से पहले नहाते हैं ये दो भाले, दशहरे से क्या है इनका संबंध?


Dussehra 2026 Shastra Puja: दशहरे पर जहां देशभर में भगवान राम की विजय का उत्सव मनाया जा रहा है, वहीं हरिद्वार के कनखल स्थित श्री पंचायती महानिर्वाणी अखाड़े में सदियों पुरानी शस्त्र पूजन की परंपरा निभाई गई.

यहां सूर्य प्रकाश और भैरव प्रकाश नाम के दो विशेष भालों की देवता के रूप में पूजा की जाती है. इन भालों का महत्व केवल दशहरे तक सीमित नहीं है. कुंभ मेले में अखाड़े की पेशवाई के दौरान इन्हें विशेष स्थान दिया जाता है और परंपरा के अनुसार नागा संन्यासियों से पहले गंगा स्नान कराया जाता है.

दशहरे पर महानिर्वाणी अखाड़े में शस्त्र पूजन, मंत्रोच्चार के साथ हुई पूजा
हरिद्वार के कनखल स्थित श्री पंचायती महानिर्वाणी अखाड़े में मंगलवार, 20 अक्टूबर को विजयादशमी के अवसर पर विधि-विधान से शस्त्र पूजन किया गया. अखाड़े के रमता पंच नागा संन्यासियों ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच सूर्य प्रकाश और भैरव प्रकाश नामक भालों की पूजा की.

इसके साथ ही अखाड़े में संरक्षित प्राचीन शस्त्रों और आधुनिक हथियारों का भी पूजन किया गया. दशनामी संन्यासी परंपरा में विजयादशमी पर शस्त्र पूजा को विशेष महत्व दिया जाता है. इस परंपरा में शस्त्रों को केवल युद्ध के साधन के रूप में नहीं, बल्कि शक्ति और धर्मरक्षा के प्रतीक के रूप में देखा जाता है.

सूर्य प्रकाश और भैरव प्रकाश कौन हैं, कुंभ में क्यों मिलता है पहला स्नान?
महानिर्वाणी अखाड़े की शस्त्र पूजन परंपरा में सूर्य प्रकाश और भैरव प्रकाश का विशेष स्थान है. ये दो भाले हैं, जिन्हें अखाड़े के नागा संन्यासी देवता के रूप में पूजते हैं.

अखाड़े की मान्यता के अनुसार, कुंभ मेले में जब नागा संन्यासियों की पेशवाई निकलती है तो इन भालों को सबसे आगे रखा जाता है. शाही स्नान के अवसर पर भी इन्हें विशेष सम्मान दिया जाता है.

अखाड़े की परंपरा में पहले इन देवस्वरूप भालों को गंगा स्नान कराया जाता है. इसके बाद आचार्य महामंडलेश्वर, महामंडलेश्वर, श्रीमहंत और नागा संन्यासियों की जमात स्नान करती है.

यही कारण है कि दशहरे पर इन भालों की पूजा अखाड़े के प्रमुख धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल है.

शास्त्र के साथ शस्त्र की परंपरा क्यों निभाते हैं नागा संन्यासी?
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष और श्री पंचायती महानिर्वाणी अखाड़े के सचिव श्रीमहंत रवींद्र पुरी के अनुसार, दशनामी संन्यासी परंपरा में शास्त्र और शस्त्र दोनों का विशेष महत्व रहा है.

उन्होंने बताया कि अखाड़ों की मान्यता के अनुसार आदि जगद्गुरु शंकराचार्य ने धर्म और राष्ट्र की रक्षा के उद्देश्य से संन्यासियों को शास्त्र ज्ञान के साथ शस्त्र विद्या में भी निपुण बनाने की परंपरा को प्रोत्साहित किया था.

रवींद्र पुरी के मुताबिक, विजयादशमी पर अखाड़ों में प्राचीन देवस्वरूप भालों के साथ अन्य शस्त्रों की पूजा भी इसी परंपरा के अंतर्गत की जाती है.

उन्होंने भगवान राम की रावण पर विजय का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय धार्मिक परंपरा में शक्ति पूजन का विशेष स्थान है. देवी-देवताओं के हाथों में धारण किए गए शस्त्र भी इसी धार्मिक प्रतीकवाद का हिस्सा हैं.

नागा संन्यासियों के लिए दशहरा क्यों है विशेष?
दशनामी संन्यासी परंपरा में नागा साधुओं की पहचान केवल तपस्या और साधना तक सीमित नहीं रही है. अखाड़ों के इतिहास में शस्त्र प्रशिक्षण और धार्मिक संस्थाओं की रक्षा से जुड़ी परंपराओं का भी उल्लेख मिलता है.

विजयादशमी पर होने वाला शस्त्र पूजन इसी विरासत की याद दिलाता है. अखाड़े के संत इस दिन अपने पारंपरिक शस्त्रों का पूजन करते हैं और शास्त्र तथा शस्त्र के बीच संबंध को अपनी धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं.

महानिर्वाणी अखाड़े में सूर्य प्रकाश और भैरव प्रकाश की पूजा इस परंपरा का विशेष उदाहरण है. दशहरे पर पूजे जाने वाले यही देवस्वरूप भाले कुंभ मेले में अखाड़े की धार्मिक शोभायात्रा और स्नान परंपरा का हिस्सा बनते हैं.

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