Diesel Shortage For Farmers: विश्व स्तर पर गहराते ऊर्जा संकट ने जम्मू के किसानों की नींद उड़ा दी है. फिलहाल जम्मू के खेत भले ही खाली नजर आ रहे हों लेकिन ठीक एक महीने बाद यहां धान की बुवाई का सीजन शुरू होने वाला है. किसानों ने अपनी नर्सरी में चावल के पौधे तैयार करना शुरू कर दिया है जिन्हें एक महीने बाद मुख्य खेतों में शिफ्ट किया जाएगा.
हालांकि इस सुनहरे भविष्य के बीच डीजल की कमी का डर एक बड़े विलेन की तरह खड़ा है. खेतों को तैयार करने के लिए ट्रैक्टरों का बार-बार इस्तेमाल जरूरी है लेकिन ईंधन की उपलब्धता को लेकर बनी अनिश्चितता ने अन्नदाताओं को गहरी चिंता में डाल दिया है. जान लें अभी के हालात.
क्या मिल पाएगा डीजल?
धान की फसल लगाने से पहले खेतों की जुताई का काम सबसे महत्वपूर्ण होता है. किसानों का कहना है कि मिट्टी को बुवाई के लायक बनाने के लिए कई बार ट्रैक्टर चलाने पड़ते हैं. इस पूरी प्रक्रिया का दारोमदार पूरी तरह से डीजल पर टिका है. जिस तरह से वैश्विक स्तर पर ऊर्जा का संकट बढ़ रहा है.
उससे जम्मू के किसानों में इस बात का डर बैठ गया है कि जब बुवाई का पीक समय आएगा तब उन्हें अपनी मशीनों के लिए पर्याप्त डीजल मिल पाएगा या नहीं. अगर समय पर ईंधन नहीं मिला. तो खेतों को तैयार करना नामुमकिन हो जाएगा और पूरी फसल चक्र पर इसका बुरा असर पड़ेगा.
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किसानों के मन में डर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से ईंधन बचत की अपीलों ने किसानों की चिंताओं को और हवा दे दी है. किसानों का तर्क है कि अगर अभी से ही पेट्रोल-डीजल के इस्तेमाल को लेकर इतनी सख्ती और संशय वाली स्थिति है. तो अगले एक महीने में हालात और भी चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं.
किसानों के मन में यह बड़ा सवाल आ रहा है कि क्या संकट की घड़ी में सरकार कृषि कार्यों के लिए डीजल की सप्लाई सुनिश्चित कर पाएगी? बिना डीजल के आधुनिक खेती की कल्पना करना मुश्किल है और ऐसे में बुवाई के सीजन से ठीक पहले का यह समय किसानों के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है.
सरकार से राहत की मांग
जम्मू से लेकर पंजाब तक के किसान अब केंद्र सरकार की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं. किसानों का स्पष्ट रूप से कहना है कि प्रधानमंत्री को इस गंभीर मुद्दे पर दखल देना चाहिए और कृषि क्षेत्र के लिए ईंधन का विशेष कोटा या सुचारू सप्लाई का इंतजाम करना चाहिए. ऊर्जा संकट एक वैश्विक समस्या हो सकती है.
लेकिन इसका सीधा असर देश की खाद्य सुरक्षा और किसानों की आजीविका पर पड़ रहा है. अन्नदाताओं की मांग है कि जम्मू-कश्मीर और पंजाब जैसे कृषि प्रधान राज्यों के लिए ठोस रणनीति बनाई जाए. जिससे डीजल की किल्लत की वजह से एक भी खेत बंजर न रह जाए और बुवाई का काम समय पर पूरा हो सके.
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