अमेरिका-ईरान पीस टॉक को लेकर विदेश मामलों के विशेषज्ञ रोबिंदर सचदेव ने कहा कि दोनों देशों के बीच गंभीर बातचीत चल रही है, लेकिन समृद्ध यूरेनियम और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के बीच मतभेद हैं. सचदेव ने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत काफी गंभीर होती जा रही है, लेकिन इसमें कई चुनौतियां आ रही हैं.
न्यूज एजेंसी ANI से बातचीत में रोबिंदर सचदेव ने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत काफी गंभीर होती जा रही है. हालांकि इस जटिल पहेली को सुलझाने में कई चुनौतियां आ रही हैं. इस पहेली के कुछ हिस्से ऐसे हैं जिन्हें बदला नहीं जा सकता. ईरान का कहना है कि यूरेनियम को देश से बाहर नहीं भेजा जा सकता. डोनाल्ड ट्रंप की मांग है कि तेहरान हवाई अड्डे के रनवे पर यूरेनियम पाउडर से भरे ड्रम रखे हों, जिन्हें अमेरिकी वायु सेना का मालवाहक विमान ले जा सके.
क्या-क्या हैं ईरान की मुख्य मांगें?
उन्होंने बताया कि फिलहाल दोनों स्थितियों में कोई सुलह संभव नहीं है. सचदेव ने इस बात पर भी जोर दिया कि ईरान लेबनान में भी शांति चाहता है और अपने फंड को फ्रीज होने से मुक्त कराना चाहता है. उन्होंने बताया कि यूरेनियम के मुद्दे के अलावा भी कई अन्य मांगें हैं. ईरान लेबनान सहित किसी भी क्षेत्र में स्थायी शांति, प्रतिबंधों में ढील और अपने फ्रीज फंड को रिलीज करने की मांग कर रहा है.
दूसरी ओर अमेरिका मांग कर रहा है कि यूरेनियम को हटाया जाए, एक निश्चित संख्या में सालों तक संवर्धन पर रोक लगाई जाए और ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को कम किया जाए या उस पर प्रतिबंध लगाया जाए. इसके अलावा अमेरिका होर्मुजियन पंजा (Hormuzian Claw) खोलने में अबतक विफल रहा है.
होर्मुज बना सबसे बड़ा मुद्दा
रोबिंदर सचदेव ने बताया कि असल समस्या यह है कि ये सभी मुद्दे पहले भी मौजूद थे, लेकिन अब एक सुपर हथियार सामने आया है- ‘होर्मुज का पंजा’. युद्ध से पहले होर्मुज जलडमरूमध्य का इस्तेमाल हथियार के तौर पर नहीं किया गया था, लेकिन युद्ध के बाद इसका परीक्षण हो चुका है. अमेरिका द्वारा बमों और आर्थिक नाकाबंदी का इस्तेमाल करने के बावजूद न तो अमेरिका और न ही इजरायल इस पंजे को खोल पाए हैं.
उन्होंने बताया कि होर्मुज अब सर्वोपरि मुद्दा बन गया है और ऐसा नहीं लगता कि आने वाले दिनों में भी होर्मुज खुलेगा. सचदेव ने आगे कहा कि भले ही इन सभी मुद्दों का समाधान हो जाए. हालांकि ईरानी बढ़त हासिल करने के प्रयास में इस मुद्दे को अपने सर्वोच्च नेता के पास ले जाएंगे और उन्हें जवाब देने में कुछ दिन लग जाएंगे.
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