चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने गुरुवार (14 मई 2026) को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का बीजिंग स्थित ‘ग्रेट हॉल ऑफ द पीपुल’ में वार्ता के लिए स्वागत किया. उन्होंने कहा कि 2026 चीन-अमेरिका संबंधों के लिए ऐतिहासिक और मील का पत्थर साबित होने वाला साल होगा. व्हाइट हाउस के अनुसार शी जिनपिंग ने बैठक के दैरान स्ट्रोट ऑफ होर्मुज पर चीन की निर्भरता को कम करने के लिए अमेरिका से अधिक तेल खरीदने में दिलचस्पी दिखाई है.
चीन और अमेरिका के बीच तेल व्यापार की स्थिति
एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, बीजिंग के सरकारी मीडिया ने बताया कि बैठक में अमेरिका से तेल खरीदने को लेकर कोई जिक्र नहीं किया गया था. दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक होने के बावजूद चीन, अमेरिका से बहुत कम मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है.चीन साल 2020 में अमेरिका से सबसे ज्यादा रोजाना 3,95,000 बैरल तेल खरीद रहा था, जो उसके कुल आयात का केवल 4 फीसदी था. हालांकि फिर समय के साथ इसमें गिरावट आई. साल 2024 में ट्रंप के दोबारा सत्ता में आने से पहले यह घटकर 1,93,000 बैरल प्रतिदिन रह गया था, जिसकी कुल कीमत लगभग 6 अरब डॉलर थी.
तेल व्यापार पर हुआ यूएस टैरिफ का असर
अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वॉर का असर सबसे ज्यादा तेल के व्यापार पर देखने को मिला. चीन ने मई 2025 से अमेरिका से तेल खरीदना पूरी तरह बंद कर दिया. मौजूदा समय में दोनों देशों के रिश्तों में तल्खियां बढ़ी हुई है. हालांकि शी जिनपिंग ने कहा कि दोनों देशों को प्रतिद्वंद्वी के बजाय साझेदार बनना चाहिए. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि दोनों देशों के संबंध दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण द्विपक्षीय रिश्ते हैं और इन्हें सही रास्ते पर आगे बढ़ाना जरूरी है.
ट्रंप की चीन की तीन दिवसीय यात्रा के दौरान, शी जिनपिंग ने अमेरिकी राष्ट्रपति को चेतावनी दी कि अगर ताइवान के मुद्दे को ठीक से नहीं सुलझाया गया तो दोनों वैश्विक शक्तियां आपस में टकरा सकती हैं. चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने एक्स पर पोस्ट कर बताय कि शी जिनपिंग ने ताइवान को चीन-अमेरिका संबंधों का सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील विषय बताया है. माओ निंग ने कहा, ‘राष्ट्रपति जिनपिंग का मानना है कि यदि इस मुद्दे का हल समझदारी से निकाला गया तो दोनों देशों के बीच स्थिरता बनी रहेगी.’
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