Sabudana Farming Tips: साबूदाने की खिचड़ी, खीर और टिक्की जैसी कई खाने की चीजें लगभग हर घर में बनाई जाती हैं. खासकर व्रत और त्योहारों के दौरान साबूदाने की मांग कई गुना बढ़ जाती है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि सफेद मोतियों जैसा दिखने वाला साबूदाना किसी पेड़ या पौधे पर सीधे नहीं उगता है. इसके पीछे एक लंबी खेती और प्रोसेसिंग की प्रक्रिया होती है, दरअसल साबूदाना कसावा (टैपिओका रूट) नाम के पौधे से तैयार किया जाता है. इसकी खेती किसानों के लिए कमाई का शानदार जरिया बन सकती है. खासकर गर्म इलाकों में रहने वाले किसान अगर कसावा की खेती के साथ प्रोसेसिंग यूनिट से जुड़ जाएं तो अच्छी कमाई कर सकते हैं और भारत में इसकी डिमांड साल भर बनी रहती है. ऐसे में आइए जानते हैं कि अपने फार्म हाउस पर साबूदाना फार्मिंग कैसे कर सकते हैं.
क्या होता है कसावा, जिससे बनता है साबूदाना?
साबूदाना कसावा नाम के पौधे की जड़ों से तैयार किया जाता है. यह जड़ देखने में शकरकंद जैसी होती है. कसावा में भरपूर मात्रा में स्टार्च पाया जाता है, जिसे कई प्रक्रियाओं के बाद साबूदाने के छोटे-छोटे दानों का रूप तैयार किया जाता है. भारत में इसकी खेती मुख्य रूप से केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में होती है. गर्म जलवायु वाले इलाकों में इसकी पैदावार सबसे बेहतर मानी जाती है.
अपने फार्म हाउस पर साबूदाना फार्मिंग कैसे कर सकते हैं?
अपने फार्म हाउस पर साबूदाना फार्मिंग करने के लिए कसावा की खेती शुरू करनी होगी. कसावा की खेती बीज से नहीं बल्कि तने की कटिंग यानी स्टेम कटिंग से की जाती है. इसके लिए लगभग 15 से 20 सेंटीमीटर लंबी डंडियों को खेत में लगाया जाता है. खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली रेतीली दोमट मिट्टी सबसे सही मानी जाती है. साथ ही इसके खेत में पानी रुकना नहीं चाहिए, क्योंकि ज्यादा नमी फसल को नुकसान पहुंचा सकती है.
गर्म मौसम में होती है शानदार पैदावार
25 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान इसकी पैदावार को बढ़ाने के लिए बेस्ट माना जाता है. यह फसल सूखे को भी काफी हद तक सहन कर लेती है. वहीं शुरुआती दिनों में हल्की सिंचाई की जरूरत पड़ती है, लेकिन बाद में बहुत ज्यादा पानी देने की जरूरत नहीं होती है.
फसल तैयार होने में लगता है इतना समय
कसावा की फसल जल्दी तैयार नहीं होती है. पौधे लगाने के बाद लगभग 8 से 12 महीने तक इंतजार करना पड़ता है. जब जड़ें पूरी तरह विकसित हो जाती हैं, तब उन्हें जमीन से निकाल लिया जाता है. यही मोटी और स्टार्च से भरपूर जड़ें आगे चलकर साबूदाना बनाने के काम आती हैं.
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फैक्ट्री में ऐसे बनता है साबूदाना
कटाई के बाद कसावा की जड़ों को फैक्ट्री में भेजा जाता है. वहां सबसे पहले उन्हें अच्छी तरह धोया और छिला जाता है. इसके बाद जड़ों को मशीनों में पीसकर गाढ़ा पेस्ट तैयार किया जाता है. इस पेस्ट से स्टार्च निकाला जाता है और बाकी रेशेदार हिस्सों को अलग कर दिया जाता है फिर स्टार्च को सुखाया जाता है और विशेष मशीनों की मदद से छोटे-छोटे गोल दानों का साइज दिया जाता है. यही दाने आगे चलकर साबूदाना बन जाते हैं.
ऐसे तैयार होते हैं चमकदार सफेद दाने
स्टार्च के पाउडर को खास मशीनों में डालकर 1 से 7 मिलीमीटर तक के छोटे-छोटे गोल दानों का रूप दिया जाता है. इसके बाद इन दानों को गर्म प्लेटों पर भुना जाता है और फिर सुखाया जाता है. आखिर में इनकी पॉलिशिंग और पैकेजिंग की जाती है, जिसके बाद साबूदाना बाजार में बिक्री के लिए तैयार हो जाता है.
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