मूंग जल्दी सुखाने से बिगड़ी मिट्टी की सेहत, हर 5वें सैंपल में पेस्टिसाइड

मूंग जल्दी सुखाने से बिगड़ी मिट्टी की सेहत, हर 5वें सैंपल में पेस्टिसाइड


गर्मी के दिनों में मूंग की खेती किसानों के लिए कम समय में बढ़िया कमाई का सबसे आसान जरिया बन चुकी है. गेहूं कटते ही किसान खाली खेतों में तुरंत मूंग बो देते हैं. जिससे सिर्फ दो महीने में अच्छी उपज और नकद पैसा मिल सके. लेकिन दिक्कत तब शुरू होती है जब इसी मूंग को जल्दी सुखाकर मंडी ले जाने की होड़ मचती है. इस जल्दबाजी में खेतों पर बेहिसाब कीटनाशक छिड़का जा रहा है. जिससे उपजाऊ मिट्टी में जहर घुल रहा है. 

मध्य प्रदेश के सबसे बड़े 6 मूंग उत्पादक जिलों से जब मिट्टी के 800 सैंपल जांचे गए तो हैरान करने वाली सच्चाई सामने आई. करीब 180 सैंपलों में खतरनाक कीटनाशकों के अंश मिले हैं. यानी हर 5वें खेत की मिट्टी केमिकल की मार से बीमार हो चुकी है. मध्य प्रदेश सीहोर, रायसेन, नर्मदापुरम, हरदा, विदिशा और नरसिंहपुर जैसे इलाकों में यह खतरा सबसे ज्यादा है. किसान जल्दबाजी के चक्कर में अपनी ही जमीन की ताकत खत्म कर रहे हैं.

24 घंटे में फसल सुखाने का खतरनाक तरीका

मूंग की फसल तैयार होने में करीब 60 दिन का वक्त लगता है. 15 मार्च के आसपास बोई गई फसल मई और जून की गर्मी तक पकने लगती है. अक्सर फलियां तो पक जाती हैं. लेकिन पौधे हरे रह जाते हैं जिन्हें धूप में कुदरती तौर पर सूखने में कुछ दिन लगते हैं. इसी समय को बचाने और सिर्फ 24 घंटे में फसल सुखाकर कटाई करने के लिए किसान पैराक्वाट जैसी तेज दवा का सहारा ले रहे हैं. 

इसमें सबसे बड़ी फिक्र की बात यह है कि इसका इस्तेमाल तय नियम से बहुत ज्यादा किया जा रहा है. पहले जहां 20 लीटर की टंकी में 100 ग्राम दवा डलती थी. वहीं अब किसान सीधे 200 से 300 ग्राम घोल रहे हैं. कुछ जगहों पर तो सीजन में 8 से 10 बार तक स्प्रे कर दिया जाता है. तेज दवा से हरी फसल एक दिन में सूख तो जाती है. लेकिन उसका सारा जहरीला असर मिट्टी में ही बैठ जाता है.

कैंसर का बढ़ता खतरा

खेती-किसानी के जानकारों का कहना है कि खेतों में जरूरत से ज्यादा दवा डालना बहुत बड़ा खतरा बन चुका है. अगर मिट्टी में यह केमिकल ऐसे ही घुलता रहा. तो आने वाले समय में मध्य प्रदेश गांव भी पंजाब के उन इलाकों जैसे हो जाएंगे जहां घर-घर बीमारियां फैली हैं. यह तेज केमिकल मिट्टी के उन केंचुओं और जरूरी कीड़ों को मार देता है जो जमीन को उपजाऊ बनाए रखते हैं.

और इसमें सबसे डरावनी बात यह है कि मिट्टी से रिसकर यह जहर जमीन के पीने वाले पानी में जा रहा है और मूंग के जरिए आम लोगों की थाली तक पहुंच रहा है. डॉक्टरों और जानकारों के मुताबिक इससे आगे चलकर कैंसर, लिवर और किडनी खराब होने का भारी डर रहता है. अगर जमीन की अपनी ताकत खत्म हो गई तो आगे चलकर खाद-दवा का खर्च बहुत बढ़ जाएगा और खेत धीरे-धीरे बंजर होने लगेंगे.

मूंग जल्दी सुखाने से बिगड़ी मिट्टी की सेहत, हर 5वें सैंपल में पेस्टिसाइड

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किसानों को इससे आर्थिक नुकसान

खेतों में पैराक्वाट जैसी जानलेवा दवाओं का अंधाधुंध इस्तेमाल रोकने के लिए कृषि विभाग ने कई बार किसानों को जागरूक करने की कोशिश की है. अधिकारियों और कृषि वैज्ञानिकों ने गांवों में चौपाल लगाकर समझाया कि इस तरह फसल सुखाना खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है. सरकार ने यह तक कह दिया था कि जिस मूंग में ज्यादा केमिकल मिलेगा उसे सरकारी खरीद केंद्रों पर नहीं तौला जाएगा. 

नकली और बिना रोक-टोक बिकने वाली दवाओं पर पहरा लगाने की बात भी कही गई. लेकिन मिट्टी की जांच रिपोर्ट साफ बता रही है कि  इन बातों काकोई खास असर नहीं हुआ. जल्दी कटाई और थोड़े से मुनाफे के चक्कर में किसान अपनी ही जमीन खराब कर रहे हैं. जिससे आगे चलकर उन्हें और परेशानी का सामना करना पड़ सकता है.

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