साल 2026 में दुनिया भर के कई देशों में युवाओं का असंतोष सड़कों पर दिखाई दे रहा है. ‘कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस’ के हालिया आंकड़ों के अनुसार, 2025-2026 के दौरान यूरोप, एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के 20 से अधिक देशों में ‘जेन ज़ेड’ (Gen Z) या युवाओं के नेतृत्व में बड़े सरकार-विरोधी प्रदर्शन देखने को मिले हैं. हाल ही में बांग्लादेश और नेपाल में हुए राजनीतिक परिवर्तनों के बाद, अब भारत के अंडमान-निकोबार द्वीप समूह से महज 150 किलोमीटर दूर स्थित दक्षिण-पूर्व एशियाई देश इंडोनेशिया में ‘जेन ज़ेड’ का बड़ा आंदोलन भड़क उठा है.
20 अक्टूबर को राष्ट्रपति प्राबोवो सुबियांतो के प्रशासन की दूसरी वर्षगांठ के मौके पर राजधानी जकार्ता सहित देश के कई प्रमुख शहरों में हजारों छात्र और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आए. आइए विस्तार से समझते हैं कि यह आंदोलन क्यों शुरू हुआ, प्रदर्शनकारियों की मांगें क्या हैं और जंगलों की आग कैसे एक राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक संकट बन चुकी है.
इंडोनेशिया के ‘जेन ज़ेड’ सड़कों पर क्यों उतरे हैं?
मंगलवार (20 अक्टूबर) को इंडोनेशिया भर में व्यापक विरोध प्रदर्शन दर्ज किए गए. जकार्ता, योग्याकार्टा, बांडुंग, पेकानबारू और मकासर जैसे शहरों में यूनिवर्सिटी छात्रों और नागरिक समाज समूहों ने एकजुट होकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. प्रदर्शनों की व्यापकता को देखते हुए अकेले जकार्ता में सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए 9,000 से अधिक पुलिस अधिकारियों को तैनात करना पड़ा.
युवाओं के इस गुस्से के पीछे तात्कालिक कारणों के साथ-साथ गहरे सामाजिक और आर्थिक असंतोष का हाथ है.
आर्थिक दबाव- देश में बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और जीवन-यापन की ऊंची लागत ने युवाओं का भविष्य अनिश्चित बना दिया है.
सार्वजनिक सेवाओं की बदहाली- छात्र शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले अत्यधिक खर्च से परेशान हैं और मांग कर रहे हैं कि बुनियादी सेवाएं सस्ती और सुलभ बनाई जाएं.
नागरिक स्वतंत्रता पर हमले: प्रदर्शनकारी सरकार पर भ्रष्टाचार, मिलीभगत, भाई-भतीजावाद (KNC) और अभिव्यक्ति की आजादी को दबाने का आरोप लगा रहे हैं.
पर्यावरणीय तबाही- देश के जंगलों में लगी विनाशकारी आग ने आम जनता के जीवन और स्वास्थ्य को खतरे में डाल दिया है.
प्रदर्शनकारियों ने हाथों में बैनर लेकर प्रदर्शन किया, जिन पर लिखा था: “जलवायु संकट पर कार्रवाई करें, जीवन-यापन की लागत कम करें.” पुलिस ने कड़ा रुख अपनाते हुए कई कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया और विरोध स्थलों से बैनर हटा दिए.
प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांगें क्या हैं?
छात्रों और कार्यकर्ताओं का आंदोलन केवल एक मुद्दे तक सीमित नहीं है. उनकी मांगें आर्थिक राहत से लेकर शासन प्रणाली में सुधार और पर्यावरण संरक्षण तक फैली हुई हैं:
आर्थिक राहत: दैनिक जीवन के खर्चों को कम करने के लिए सरकारी हस्तक्षेप और आवश्यक सेवाओं तक जनता की पहुंच को आसान बनाना.
पर्यावरण को राष्ट्रीय आपदा घोषित करना: जंगलों में लगी भीषण आग को ‘राष्ट्रीय आपदा’ घोषित किया जाए और इसके लिए जिम्मेदार कॉर्पोरेट घरानों व कंपनियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए.
भ्रष्टाचार पर लगाम: सरकारी संस्थाओं में जड़ जमा चुके भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद को खत्म किया जाए.
लोकतांत्रिक अधिकारों की सुरक्षा: नागरिकों को अपनी राय व्यक्त करने और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने की पूर्ण स्वतंत्रता दी जाए.
जंगलों की आग: एक पर्यावरणीय आपदा से राजनीतिक संकट तक
इंडोनेशिया वर्तमान में वर्ष 2015 के बाद के सबसे गंभीर जंगल-आग संकट से गुजर रहा है. सुमात्रा, कालीमंतन और पापुआ के जंगलों और ‘पीट-भूमि’ में लगी आग ने पूरे देश को धुएं के आगोश में ले लिया है.
इसके पीछे के मुख्य कारण
जलवायु परिवर्तन और अल नीनो: ‘अल नीनो’ प्रभाव के कारण असामान्य रूप से पड़ा लंबा सूखा इस आग को और भड़का रहा है.
पाम ऑयल कंपनियों की मनमानी: पाम ऑयल (Palm Oil) के बागानों के लिए जमीन साफ करने के उद्देश्य से अक्सर व्यावसायिक स्तर पर अवैध रूप से आग लगाई जाती है. जमीन के इस अनियंत्रित उपयोग ने समस्या को विस्फोटक बना दिया है.
राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय प्रभाव
जंगलों से उठने वाले जहरीले धुएं ने इंडोनेशिया के कई हिस्सों में परिवहन व्यवस्था को पूरी तरह ठप्प कर दिया है और एहतियातन सैकड़ों स्कूलों को बंद करना पड़ा है. सबसे गंभीर बात यह है कि यह धुआं अब अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को पार करके पड़ोसी देशों जैसे सिंगापुर और मलेशिया—तक पहुंच गया है, जिससे यह एक क्षेत्रीय कूटनीतिक और स्वास्थ्य आपातकाल बन गया है.
प्राबोवो सरकार की प्रतिक्रिया और चुनौतियां
आंदोलन के बढ़ते दबाव और अंतरराष्ट्रीय चिंता के बीच, राष्ट्रपति प्राबोवो सुबियांतो ने मेर्डेका पैलेस में एक उच्च स्तरीय आपातकालीन बैठक की अध्यक्षता की.
राष्ट्रपति के चीफ ऑफ स्टाफ लिस्ट्यो सिगित प्राबोवो ने बताया कि सशस्त्र बलों, पुलिस, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (BNPB) और स्थानीय प्रशासनों को एकजुट होकर आग पर काबू पाने के लिए हवाई वाटर-बॉम्बिंग तेज करने के निर्देश दिए गए हैं.
सरकार ने जंगल और जमीन में आग लगाने के मामलों में 98 आपराधिक जांच शुरू की हैं. इसमें कई कॉरपोरेट कंपनियों और विदेशी संस्थाओं की संलिप्तता का भी संदेह है.
इंडोनेशिया भारत के समुद्री पड़ोस में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक और आर्थिक साझेदार है. सुमात्रा में भड़की यह चिंगारी और युवाओं का सड़कों पर उतरना यह दर्शाता है कि यदि प्राबोवो सरकार ने जल्द ही आर्थिक राहत और पर्यावरणीय जवाबदेही तय नहीं की, तो यह असंतोष एक बड़े राजनीतिक तख्तापलट या उथल-पुथल का रूप ले सकता है.





